पटना/गोरखपुर: कल्पना कीजिए, 19वीं सदी का बिहार का कोई जिला या पूर्वांचल हो। सरकारी दफ्तरों में, अदालतों में, किसानों के खेत-खलिहान के रिकॉर्ड में, महिलाओं के पत्रों में और लोकगीतों की पांडुलिपियों में एक ही लिपि चल रही है कैथी। न कोई भारी-भरकम शिरोरेखा, न जटिल संयुक्ताक्षर, बस एक सरल, घुमावदार और तेज लिखावट जो कायस्थ लेखकों की उंगलियों से निकलकर आम जन तक पहुंच जाती थी। भोजपुरी, मगही, मैथिली और अवधी जैसी भाषाओं की यह ‘जन-लिपि’ आज लगभग लुप्त हो चुकी है। लेकिन एक समय यह बिहार से लेकर नेपाल तक की प्रशासनिक और सांस्कृतिक पहचान थी।
गुप्त काल में शुरू हुई थी कैथी
कैथी लिपि (कायथी या कायस्थी भी कहते हैं) ब्राह्मी लिपि की शाखा है, जिसका विकास गुप्त काल (लगभग 6वीं-7वीं शताब्दी) के बाद हुआ। 16वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी के मध्य तक यह उत्तरी और पूर्वी भारत (बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और नेपाल के तराई) में सबसे लोकप्रिय थी। इसका नाम ‘कायस्थ’ समुदाय से पड़ा, जो लेखन-कार्य और प्रशासनिक रिकॉर्ड रखने वाले थे। कायस्थों ने इसे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए विकसित किया सरल, तेज और कम मेहनत वाला।
कैथी लिपि की उत्पत्ति और ऐतिहासिक यात्रा
विद्वान जॉर्ज अब्राहम ग्रीअरसन (Linguistic Survey of India के लेखक) ने अपनी 1899 की पुस्तक A Handbook to the Kaithi Character में लिखा कि देवनागरी ‘सामान्य कामों के लिए बहुत भारी और कम घुमावदार’ थी, जबकि कैथी ‘एक ही स्ट्रोक में शब्द लिखने’ की सुविधा देती थी। ग्रीअरसन ने इसे बिहार की अदालतों में आधिकारिक लिपि बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मुगल काल में कैथी ने खूब फल-फूला। भूमि रिकॉर्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, निजी पत्र, लोकगीत, सोहर, कजरी, बिरहा और यहां तक कि बाइबिल के अनुवाद भी कैथी में छपते थे। ब्रिटिश काल में 1880 के दशक में बिहार की अदालतों में इसे आधिकारिक रूप से अपनाया गया। 1854 में बिहार के स्कूलों में 77,368 कैथी प्राइमर (पहली किताबें) छपी थीं, जबकि देवनागरी बहुत कम। 1874 के जनगणना फॉर्म भी कैथी में छपे थे।
भोजपुरी क्षेत्र में भोजपुरी कैथी सबसे पढ़ने योग्य शैली मानी जाती थी। भिखारी ठाकुर के नाटक बिदेसिया की मूल पांडुलिपियां कैथी में थीं। गुप्त साम्राज्य के बाद से विकसित इस लिपि के तीन मुख्य रूप थे भोजपुरी (सबसे सुपाठ्य), मगही और तिरहुती (सबसे सुंदर)।
कैथी लिपि कैसी दिखती थी? देवनागरी से मुख्य अंतर
कैथी और देवनागरी दोनों ही ब्राह्मी परिवार की लिपियाँ हैं, लेकिन इनके स्वरूप, उपयोग और लिखावट के तरीके में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। देवनागरी जहाँ औपचारिक, संरचित और ‘ऊपर से जुड़ी हुई’ लिपि है, वहीं कैथी अधिक घुमावदार (cursive), सरल और व्यावहारिक थी यानी आम लोगों के रोजमर्रा के उपयोग के लिए बनी।
शिरोरेखा (Top Line) का अंतर
देवनागरी की सबसे बड़ी पहचान उसकी सीधी शिरोरेखा (माथे की लाइन) है, जो पूरे शब्द को एक साथ जोड़ देती है। इसके विपरीत, कैथी में शिरोरेखा या तो बहुत पतली, टूटी हुई होती थी या कई बार बिल्कुल नहीं होती थी। इससे लिखने में कलम बार-बार उठानी नहीं पड़ती थी, इसलिए गति तेज रहती थी।

लिखावट की गति और शैली
देवनागरी में एक अक्षर बनाने के लिए कई स्ट्रोक लगाने पड़ते हैं। कैथी में अक्षर अक्सर एक ही स्ट्रोक में, बहते हुए अंदाज में लिखे जाते थे। यही कारण है कि प्रसिद्ध भाषाविद् जॉर्ज ग्रियर्सन ने इसे ‘practical script’ कहा।
अक्षरों का आकार और बनावट
कैथी के अक्षर सरल, गोल और कम जटिल होते थे जैसे ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ में ज्यादा घुमाव और कम सीधी रेखाएँ। देवनागरी में वही अक्षर अधिक ऊर्ध्वाधर (vertical) और संरचित दिखते हैं। संयुक्ताक्षर (जैसे ‘क्ष’, ‘त्र’) भी कैथी में कम जटिल और ज्यादा सरल रूप में लिखे जाते थे।
मात्राएं (Vowel Signs)
देवनागरी में मात्राएँ अक्षरों के ऊपर, नीचे और आसपास स्पष्ट रूप से लगाई जाती हैं। कैथी में मात्राओं का उपयोग अपेक्षाकृत कम और सरल होता था, जिससे लिखावट और तेज हो जाती थी।
शब्दों के बीच अंतर (Spacing)
कैथी में अक्सर शब्दों के बीच बहुत कम जगह होती थी, कभी-कभी तो बिल्कुल नहीं। पाठक को अपने अनुभव से शब्दों को पहचानकर पढ़ना पड़ता था। हालांकि, सरकारी या कानूनी दस्तावेजों में थोड़ी स्पष्टता रखी जाती थी।
उपयोगिता और सामाजिक भूमिका
देवनागरी मुख्यतः संस्कृत और औपचारिक हिंदी के लिए विकसित हुई यानी विद्वानों और शिक्षित वर्ग की लिपि। कैथी इसके विपरीत जनसामान्य की लिपि थी जैसे किसान, मजदूर, व्यापारी, महिलाएँ और लोक कलाकार की. कैथी में ही पत्र-लेखन, जमीन के कागजात, लोकगीतों का संकलन किये जाते थे.
उदाहरण से समझें
‘नमस्ते’ (देवनागरी): शिरोरेखा से जुड़ा हुआ, साफ-सुथरा और संरचित है लेकिन कैथी में ‘नमस्ते’ बिना पूरी शिरोरेखा के, घुमावदार और बहती हुई लिखावट में होती थी. भोजपुरी वाक्य ‘हमार देश’ कैथी में इसे अक्सर एक ही फ्लो में, लगभग एक लाइन में लिखा जाता था.
भोजपुरी भाषा और कैथी का गहरा संबंध
भोजपुरी की मूल लिपि कैथी ही थी। भोजपुरी क्षेत्र (पूर्वांचल, पश्चिमी बिहार) में यह सबसे लोकप्रिय थी। भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिसिर और अन्य लोक रचनाकारों की रचनाएं कैथी में संरक्षित हुईं। गिरमिटिया मजदूरों ने कैथी में पत्र लिखकर घर भेजे। आज भी मॉरीशस, फिजी और ट्रिनिडाड के भोजपुरी समुदाय में पुरानी पांडुलिपियां कैथी में मिलती हैं।
ब्रिटिश नीति और स्वतंत्र भारत की ‘देवनागरी क्रांति’
ब्रिटिश ने बिहार को छोड़कर अन्य जगहों पर कैथी को हतोत्साहित किया। 1893 में नागरी प्रचारिणी सभा ने देवनागरी को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए देवनागरी को एकमात्र लिपि घोषित किया गया। 1950 के दशक तक स्कूलों और अदालतों से कैथी गायब हो गई। 1951 की जनगणना में कैथी को साक्षरता के लिए मान्यता नहीं दी गई और लाखों लोग ‘अनपढ़’ हो गए।
आज की स्थिति और संरक्षण की जरूरत
आज कैथी लगभग लुप्त है। ग्रामीण इलाकों में कुछ बुजुर्ग अभी भी लिखते हैं। बिहार सरकार ने 2022 में कैथी को बढ़ावा देने की घोषणा की। यूनिकोड में कैथी को सपोर्ट मिल चुका है। कुछ शोधकर्ता (जैसे भैरवलाल दास) और संस्थाएं पांडुलिपियां डिजिटाइज कर रही हैं। सही कहें तो कैथी लिपि सिर्फ एक लिखावट नहीं थी यह आम जन की भाषा की स्वतंत्रता थी। देवनागरी से अलग, यह सरल, तेज और समावेशी थी। भोजपुरी की पहचान को मजबूत करने के लिए कैथी को फिर से जीवित करने की जरूरत है। जब तक हम अपनी लिपियों को याद रखेंगे, हमारी भाषाएं और संस्कृति भी जिंदा रहेंगी।

