1728 की ‘बारह मासी’ से शुरू हुई थी भोजपुरी साहित्य की शुरुआती लिखित परंपरा

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पटना/गोरखपुर: भोजपुरी भाषा का साहित्यिक इतिहास अत्यंत समृद्ध और पुराना माना जाता है, लेकिन इसका लिखित रूप लंबे समय तक लोकगीतों, मौखिक परंपराओं और जनजीवन की स्मृतियों में ही जीवित रहा। आधुनिक शोध और साहित्यिक स्रोतों के अनुसार, भोजपुरी में पहली आधुनिक लिखित पुस्तक का उल्लेख 1728 ईस्वी की ‘बारह मासी’ के रूप में मिलता है, जिसे लखन सेन द्वारा रचा गया माना जाता है। यह कृति भोजपुरी साहित्य की उस यात्रा का प्रारंभिक प्रमाण है, जब भाषा पहली बार लिखित साहित्य के रूप में संगठित होने लगी। इसके प्रकाशक शिवराज सिंह कायस्थ थे. (कुछ स्रोतों में उल्लेख)

इतिहासकारों के अनुसार यह कृति कैथी लिपि (Kaithi Script) में लिखी गई थी, जो उस समय उत्तर भारत के बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में प्रशासनिक और साहित्यिक लेखन के लिए व्यापक रूप से उपयोग होती थी। कैथी लिपि को विशेष रूप से कायस्थ समुदाय के लेखन कार्यों से जोड़ा जाता है और यह 16वीं से लेकर 20वीं शताब्दी तक प्रचलित रही।

‘बारह मासी’ क्या थी? लोकगीत से साहित्य तक का पहला कदम

बारह मासी मूल रूप से एक गीतात्मक परंपरा (folk lyrical tradition) है, जिसमें वर्ष के बारह महीनों के अनुसार स्त्री जीवन, विरह, प्रेम और सामाजिक अनुभवों का वर्णन किया जाता है। भोजपुरी और अवधी लोक परंपरा में यह शैली अत्यंत लोकप्रिय रही है। लखन सेन द्वारा रचित इस पुस्तक को इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह केवल लोकगीत नहीं थी, बल्कि इसे लिखित रूप में संरक्षित कर पुस्तक का स्वरूप दिया गया। यही इसे भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एक प्रारंभिक आधुनिक दस्तावेज बनाता है।

कैथी लिपि और भोजपुरी की शुरुआती लेखन परंपरा

भोजपुरी भाषा पहले मुख्यतः कैथी और बाद में देवनागरी लिपि में लिखी जाती रही। कैथी लिपि का उपयोग प्रशासनिक रिकॉर्ड, पत्राचार और साहित्यिक लेखन में होता था।

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1728 के समय में कैथी लिपि का उपयोग यह दर्शाता है कि भोजपुरी केवल बोली नहीं थी, बल्कि धीरे-धीरे एक लिखित साहित्यिक भाषा के रूप में भी विकसित हो रही थी।

यह भी माना जाता है कि उस समय की कई रचनाएँ हस्तलिखित थीं और उनका व्यापक प्रकाशन नहीं हो पाया, जिसके कारण कई ऐतिहासिक दस्तावेज आज उपलब्ध नहीं हैं।

भोजपुरी साहित्य लोक से लिखित रूप तक

भोजपुरी साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोक परंपरा रही है। गीत, बिरहा, कजरी, सोहर और बारहमासा जैसे रूप सदियों से लोगों के जीवन का हिस्सा रहे हैं। बारह मासी जैसी रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भोजपुरी में भावनात्मक साहित्य पहले से मौजूद था, लोककथाओं को लिखित रूप देने का प्रयास हुआ और भाषा धीरे-धीरे औपचारिक साहित्यिक संरचना की ओर बढ़ी। इस प्रक्रिया ने आगे चलकर 19वीं और 20वीं शताब्दी में भोजपुरी उपन्यास, कहानी और आधुनिक साहित्य की नींव रखी।

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1728 का संदर्भ और आधुनिक शोध दृष्टिकोण

कुछ आधुनिक साहित्यिक शोध और क्षेत्रीय इतिहासकारों के अनुसार, बारह मासी को भोजपुरी की सबसे प्रारंभिक लिखित कृतियों में से एक माना जाता है। यह उल्लेख विभिन्न लोक-साहित्य अध्ययन और क्षेत्रीय अभिलेखों में मिलता है, हालांकि इसकी मूल पांडुलिपि व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद, यह तथ्य भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बन चुका है, क्योंकि यह दिखाता है कि 18वीं शताब्दी तक भोजपुरी में लिखित साहित्य की शुरुआत हो चुकी थी।

भोजपुरी साहित्य की आगे की यात्रा

बारह मासी के बाद भोजपुरी साहित्य की यात्रा धीरे-धीरे आगे बढ़ी और 19वीं शताब्दी तक आते-आते इसमें लोकगीत संग्रह, धार्मिक रचनाएँ, प्रशासनिक लेखन
और आधुनिक साहित्यिक कृतियाँ शामिल होने लगीं। 20वीं शताब्दी में भोजपुरी साहित्य ने उपन्यास और कहानी के रूप में एक नया स्वरूप लिया, जिसमें रामनाथ पांडेय जैसे लेखकों ने इसे साहित्यिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

ऐतिहासिक संदर्भ

18वीं शताब्दी की शुरुआत मुगल साम्राज्य के पतन और क्षेत्रीय शक्तियों के उदय का समय था। अवधी और भोजपुरी जैसी बोलियां लोक साहित्य में समृद्ध थीं, लेकिन देवनागरी या फारसी लिपि के बजाय कैथी (कायस्थों द्वारा प्रयुक्त लिपि) का इस्तेमाल आम था। कैथी लिपि सरल, व्यावहारिक और व्यापार-लेखा के लिए उपयुक्त थी, जिसने भोजपुरी जैसे लोकभाषाओं को लिखित रूप देने में मदद की। लखन सेन का कार्य इस संक्रमण काल का प्रतीक है, जब मौखिक परंपरा से लिखित साहित्य की ओर बढ़ाव हो रहा था।
भोजपुरी साहित्य की जड़ें बहुत पुरानी हैं। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन और लोक नाट्यों (जैसे नौटंकी, बिदेसिया) ने इसे पोषित किया। भिखारी ठाकुर (19वीं शताब्दी) जैसे बाद के रचनाकारों ने इसे और समृद्ध किया, लेकिन लखन सेन को आधुनिक युग का प्रारंभिक स्तंभ माना जाता है। विकिपीडिया और भोजपुरी साहित्य के इतिहासकारों के अनुसार, 1956 में रामनाथ पांडे का उपन्यास बिंदिया पहला भोजपुरी उपन्यास था, लेकिन गद्य-गीत संग्रह के रूप में बारह मासी पहले से मौजूद था।

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