पांच साल की उम्र में मां को खोया, सात साल तक रिजेक्शन झेला, आज भोजपुरी-मिथिला की आवाज बन गईं प्रिया मल्लिक

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Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज जन्मदिन के अवसर पर मिलिए मिथिला की गौरवशाली बेटी और लोकप्रिय गायिका प्रिया मल्लिक से। संघर्ष, साधना और सुरों के दम पर उन्होंने भोजपुरी, मैथिली और भारतीय भाषाओं को वैश्विक मंच तक पहुंचाया है। उनकी प्रेरक यात्रा बताती है कि सपनों के साथ हौसला हो तो कोई मंजिल दूर नहीं होती।

पटना/मुंबई: कभी एक छोटी बच्ची अपनी ‘छोटी मां’ के इंतजार में दरवाजे पर बैठी रहती थी। उसे लगता था कि जो भगवान के पास गया है, वह एक दिन लौटकर जरूर आएगा। लेकिन वह इंतजार कभी खत्म नहीं हुआ। वह बच्ची थी प्रिया मल्लिक। आज वही प्रिया मल्लिक देश-दुनिया में भोजपुरी, मैथिली और भारतीय लोकसंगीत की पहचान बन चुकी हैं। लाखों लोग सोशल मीडिया पर उनकी आवाज़ के दीवाने हैं। बड़े-बड़े मंचों पर उनकी प्रस्तुतियां होती हैं। बॉलीवुड तक उनकी आवाज पहुंच चुकी है। लेकिन इस सफलता के पीछे एक ऐसा संघर्ष छिपा है, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं।

पांच साल की उम्र में मिला जिंदगी का पहला बड़ा दुख

पटना में जन्मी प्रिया मल्लिक जब मात्र पांच वर्ष की थीं, तभी उनकी चाची, जिन्हें वे मां कहकर पुकारती थीं, अचानक इस दुनिया को छोड़ गईं। छोटी मां ही उन्हें स्कूल भेजती थीं, खाना खिलाती थीं, कहानियां सुनाती थीं और दिनभर उनका ख्याल रखती थीं। जब चाची की मृत्यु हुई तो किसी ने प्रिया को सच नहीं बताया। कहा गया कि वह मायके गई हैं। लेकिन जब कई दिनों तक वह नहीं लौटीं तो प्रिया की दुनिया बदल गई। उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया, स्कूल जाना बंद कर दिया और धीरे-धीरे गहरे सदमे में चली गईं। आज प्रिया कहती हैं कि शायद वह उनका पहला डिप्रेशन था, हालांकि उस उम्र में उन्हें इसका अर्थ भी नहीं पता था।  ये भी पढ़ें-मां की दीवारों से शुरू हुआ सपना, जिसने भोजपुरी लोककला ‘पिड़िया’ को दिलाई वैश्विक पहचान मुंबई ने लौटाई मुस्कान

बेटी की हालत देखकर परिवार चिंतित हो गया। उन्हें मुंबई में अपनी बुआ के पास भेजा गया। वहां का माहौल, बुआ का प्यार और नए अनुभवों ने धीरे-धीरे उनकी जिंदगी में रंग भरना शुरू किया। मुंबई की ऊंची-ऊंची इमारतें, मॉल, एस्केलेटर और जुहू बीच उनके लिए किसी दूसरी दुनिया की तरह थे। फूफा उन्हें हंसाने के लिए कहते थे कि जुहू बीच उन्हीं का है और उसका पानी पटना से लाकर भरा गया है। कई साल तक प्रिया सचमुच मानती रहीं कि जुहू बीच उनका अपना तालाब है। लेकिन इसी दौरान एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। बुआ ने उन्हें डांस क्लास में भेज दिया। यहीं से कला और संगीत के साथ उनका रिश्ता गहराता गया।

बचपन में ही बन गईं जिम्मेदार

दो साल बाद जब वह पटना लौटीं तो जिंदगी ने फिर नई जिम्मेदारी दे दी। अपने से पांच साल छोटे भाई की देखभाल का बड़ा हिस्सा उनके कंधों पर आ गया। भाई को दूध पिलाना, खिलाना, नहलाना और उसकी देखभाल करना उनकी दिनचर्या बन गया। एक ओर पढ़ाई, दूसरी ओर कथक की शिक्षा और तीसरी ओर पारिवारिक जिम्मेदारियां। शायद यही वजह थी कि प्रिया बहुत जल्दी परिपक्व हो गईं। वह खुद कहती हैं कि ‘मैं उन बच्चों में से हूं, जिन्होंने बचपन कम और जिम्मेदारियां ज्यादा देखीं।’

हार पर हार, लेकिन हिम्मत नहीं हारी

संगीत की दुनिया में उनका सफर भी आसान नहीं था। एक दिन कथक क्लास के बाहर उन्होंने एक गायन प्रतियोगिता का पोस्टर देखा और उसमें भाग लेने की जिद कर बैठीं। जिला स्तर तक जीत गईं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हार गईं। यहीं उनकी मुलाकात जयपुर घराने के संगीत गुरु विजय सिंह से हुई। इसके बाद उन्होंने बाकायदा शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया। लेकिन सफलता अभी दूर थी। 2009 से 2016 तक उन्होंने लगातार ऑडिशन दिए और लगातार रिजेक्शन झेले। कभी ‘लिटिल चैंप्स’ में, कभी दूसरे रियलिटी शो में। कई बार 10-12 घंटे लाइन में खड़ी रहीं। कई बार अंतिम राउंड तक पहुंचकर बाहर हो गईं। उनकी मां पार्लर बंद कर उनके साथ ऑडिशन में जाती थीं और पिता अपना काम छोड़कर साथ खड़े रहते थे। आर्थिक स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन परिवार ने कभी उनका हौसला टूटने नहीं दिया। ये भी पढ़ें- मैं वायरल नहीं, यादगार बनना चाहता हूँ: मनोज भावुक

‘ओम शांति ओम’ ने बदल दी जिंदगी

जिस तालकटोरा स्टेडियम में वह एक प्रतियोगिता हारकर रोई थीं, वहीं वर्षों बाद एक सिंगिंग प्रतियोगिता जीतकर लौटीं। उन्होंने फिल्म रॉकेट सिंह का गीत ‘बादल पर पांव है…’ गाया और विजेता बनीं। मंच पर चार लाख रुपये का चेक मिला। प्रसिद्ध गायक शान ने उन्हें गले लगाया। प्रिया कहती हैं कि उस दिन उन्हें लगा कि वर्षों का संघर्ष आखिरकार रंग लाने लगा है।

साल 2017 में स्टार भारत के लोकप्रिय सिंगिंग रियलिटी शो ‘ओम शांति ओम’ में उनका चयन हुआ। बाबा रामदेव सहित कई बड़े नाम इस शो से जुड़े थे। प्रिया इस शो में प्रथम रनर-अप रहीं और यहीं से उनकी पहचान पूरे देश में बननी शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

भोजपुरी-मिथिला की संस्कृति को दिया नया मंच

प्रिया मल्लिक ने केवल बॉलीवुड की राह नहीं चुनी, बल्कि अपनी मिट्टी को भी साथ रखा। उन्होंने भोजपुरी और मैथिली लोकसंगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया। उनके गीत ‘आजु मिथिला नगरिया निहाल सखिया’, ‘ए पहुना यही मिथिले में रहू ना’, ‘सोहर’, ‘अरजि अरजि भोला केकरा के देई छी’ और कई भक्ति गीत देश-दुनिया में लोकप्रिय हैं। आज वह भोजपुरी, मैथिली, हिंदी, पंजाबी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और अंग्रेजी समेत कई भाषाओं में गा चुकी हैं।

संस्कार और स्वैग की मिसाल

फिल्म ‘भुज’ में शंकर महादेवन के साथ गाया गया उनका गीत खूब चर्चित हुआ। देश के बड़े नेताओं और संगीत प्रेमियों ने इसकी सराहना की। आज वह देश और विदेश के मंचों पर भोजपुरी, मैथिली और भारतीय संस्कृति की प्रतिनिधि बनकर खड़ी होती हैं। प्रिया मल्लिक को लेकर अक्सर कहा जाता है कि उनमें संस्कार भी हैं और स्वैग भी। वह आधुनिक हैं, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी हैं। सोशल मीडिया की स्टार हैं, लेकिन लोकगीतों की आत्मा को समझती हैं। यही वजह है कि लाखों युवाओं के लिए वह सिर्फ गायिका नहीं, बल्कि प्रेरणा हैं।

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संघर्ष से निकला संदेश

प्रिया मल्लिक की कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी चाहे कितने भी दुख दे, सपनों का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। पांच साल की उम्र में मां का साया खोने वाली बच्ची, जिसने डिप्रेशन, जिम्मेदारियां, आर्थिक संघर्ष और सात साल तक लगातार रिजेक्शन झेला, आज भोजपुरी और मिथिला की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।

भारतीय भाषाओं की सशक्त प्रतिनिधि हैं प्रिया मल्लिक

प्रिया मल्लिक के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह भारतीय भाषाओं और लोकसंस्कृतियों को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने का निरंतर प्रयास कर रही हैं। पिछले वर्ष लंदन में ब्रिटिश एम्बेसी द्वारा आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में उन्होंने भोजपुरी और मैथिली भाषा का प्रतिनिधित्व किया। भारतीय भाषाओं और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें स्कॉटलैंड की संसद में भी सम्मानित किया गया।

प्रिया देश की 22 अनुसूचित भाषाओं में एक ही मंच से प्रस्तुति देने वाली चुनिंदा कलाकारों में शामिल हैं। भोजपुरी24 से बातचीत में प्रिया ने कहा कि भारत की भाषाई विविधता ही उसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति है। इसी सोच के साथ वह सितंबर से एक विशेष अभियान के तहत देश के 22 राज्यों और 22 भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की श्रृंखला शुरू करने जा रही हैं। इस पहल का उद्देश्य संगीत के माध्यम से भाषाई एकता, सांस्कृतिक समन्वय और भारतीयता की भावना को मजबूत करना है।

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बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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