पटना: आज भोजपुरी-बिहारी समाज के लिए दोहरी खुशी का दिन है। एक तरफ आज विश्व परिवार दिवस मनाया जा रहा है, जो हमें परिवार की ताकत, संस्कार और एकजुटता का संदेश देता है। दूसरी तरफ बिहार के महज 15 वर्षीय क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी का भारत की सीनियर ए टीम में चयन होने की घोषणा ने पूरे भोजपुरी समाज का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। वैभव अब भारत की ओर से श्रीलंका सीरीज में खेलते नजर आएंगे।
यह सिर्फ एक खिलाड़ी के चयन की कहानी नहीं है, बल्कि उस परिवार की मेहनत, त्याग और संस्कारों की कहानी है जिसने एक बच्चे को सपनों से निकालकर भारतीय क्रिकेट के दरवाजे तक पहुंचा दिया।

परिवार के संस्कारों की पिच पर वैभव
सुनो बेटा, तुम्हारे जन्म से पहले ही हमने तुम्हारे अंदर अच्छे संस्कार डालने शुरू कर दिए थे…यह शब्द हैं वैभव सूर्यवंशी के नाना दीपक कुमार सिंह के, जो आज अपने नाती की उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहे हैं।
दीपक कुमार बताते हैं कि जब उनकी बेटी मां बनने वाली थीं, तभी से उन्हें विश्वास था कि परिवार में आने वाला बच्चा एक दिन बड़ा नाम करेगा। वैभव जब यह बातें सुनते हैं तो मुस्कुराकर कहते हैं कि नाना, मां और भगवान के आशीर्वाद का ही असर है।
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नाना कहते हैं कि बच्चे की असली ताकत केवल प्रतिभा नहीं होती, बल्कि उसके संस्कार होते हैं। क्रिकेट की दुनिया में भले ही खिलाड़ी अकेले मैदान पर उतरता दिखाई देता हो, लेकिन उसकी सफलता के पीछे पूरा परिवार खड़ा होता है।
जन्म से पहले ही शुरू हो गई थी तैयारी
वैभव के नाना बताते हैं कि परिवार ने उसके जन्म से पहले ही उसके भविष्य को लेकर सकारात्मक सोच और संस्कारों का माहौल बना दिया था। जन्म के बाद वैभव ने गांव की मिट्टी में खेलते हुए बचपन बिताया। यही मिट्टी और संघर्ष उसकी सबसे बड़ी ताकत बने।
वैभव के पिता संजीव सूर्यवंशी खुद भी क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन आर्थिक परिस्थितियों ने उनके सपनों को अधूरा छोड़ दिया। मगर उन्होंने अपने टूटे सपनों को बेटे की आंखों में फिर से जिंदा कर दिया।
एक सामान्य किसान परिवार से आने वाले संजीव सूर्यवंशी ने कभी बेटे की ट्रेनिंग और पढ़ाई में कमी नहीं आने दी। परिवार के लोगों के अनुसार, कई बार उन्होंने अपनी जरूरतों को पीछे रखकर बेटे के क्रिकेट करियर को प्राथमिकता दी।

मां की प्रार्थनाओं ने गढ़ा संघर्षशील खिलाड़ी
वैभव की सफलता में उनकी मां की भूमिका भी बेहद खास रही है। परिवार के लोग बताते हैं कि उनकी मां हर सुबह बेटे के बेहतर भविष्य के लिए पूजा करती थीं। वैभव की फिटनेस, खानपान और अनुशासन पर आज भी उनकी मां का पूरा नियंत्रण है।

स्कूल से लौटने के बाद अभ्यास, सही भोजन और समय पर आराम आदि यह सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। मां की इसी अनुशासित परवरिश ने वैभव के अंदर संघर्ष करने की ताकत पैदा की।
परिवार का कहना है कि वैभव की सफलता के पीछे नानी मुन्नी देवी और मामा रितेश कुमार का भी बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने हमेशा वैभव को सकारात्मक माहौल और मानसिक मजबूती दी।
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500 रुपए का आशीर्वाद और जमीन से जुड़ाव
नाना दीपक कुमार सिंह बताते हैं कि जब भी वैभव अपने ननिहाल आते हैं, वह उन्हें आशीर्वाद के रूप में 500 रुपए जरूर देते हैं। यह रकम भले छोटी हो, लेकिन इसके पीछे परिवार का प्यार और आशीर्वाद जुड़ा होता है।
उन्होंने कहा कि वैभव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि सफलता मिलने के बाद भी वह जमीन से जुड़े हुए हैं। बड़ी उपलब्धियों के बाद भी वह सबसे पहले परिवार के बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते।
भोजपुरी समाज के लिए प्रेरणा बने वैभव
आज वैभव सूर्यवंशी केवल बिहार या अपने परिवार का नाम रोशन नहीं कर रहे, बल्कि पूरे भोजपुरी समाज के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं। उनकी कहानी बताती है कि अगर परिवार का साथ, संस्कार और मेहनत हो तो गांव की मिट्टी से निकलकर भी दुनिया के बड़े मंच तक पहुंचा जा सकता है।
विश्व परिवार दिवस पर वैभव सूर्यवंशी की यह सफलता एक संदेश भी देती है कि मजबूत परिवार ही बच्चों के सपनों की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। भोजपुरी समाज के लिए यह गर्व का क्षण है कि एक बिहारी बेटा अब भारतीय क्रिकेट में नई पहचान बनाने जा रहा है।
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