भोजपुरी धुरंधर सीरीज में आप पढ़ें त्रिनिदाद और टोबैगो की सत्ता में फिर लौटी भारतीय मूल की नेता, जिनकी जड़ों में बसता है बिहार और भोजपुरी समाज
अभी भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर त्रिनिदाद यात्रा पर हैं और उन्होंने कमला प्रसाद-बिसेसर के बारे में सोशल मीडिया पर भी साझा किया था।
त्रिनिदाद और टोबैगो की राजनीति में एक बार फिर भारतीय मूल की नेता कमला प्रसाद-बिसेसर का परचम लहराया है। 2025 के आम चुनाव में शानदार जीत के साथ उन्होंने दोबारा प्रधानमंत्री पद पर वापसी की है। लेकिन यह सिर्फ एक राजनीतिक जीत नहीं, बल्कि उस इतिहास की वापसी भी है, जिसकी शुरुआत 136 साल पहले बिहार से गए एक गिरमिटिया मजदूर के जहाज पर चढ़ने से हुई थी।
कमला प्रसाद-बिसेसर आज दुनिया भर के प्रवासी भारतीयों, खासकर भोजपुरी समाज के लिए गर्व का प्रतीक बन चुकी हैं। वह त्रिनिदाद और टोबैगो की पहली महिला प्रधानमंत्री हैं और भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर प्रधानमंत्री बनने वाली भारतीय मूल की पहली महिला भी मानी जाती हैं।
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भोजपुरी समाज खातिर कमला प्रसाद-बिसेसर एगो मिसाल बाड़ी। जे लोग गिरमिटिया मजदूरन के इतिहास के भूला गइल बा, ओकरा खातिर कमला के कहानी एगो जवाब ह। बिहार के माटी से उठल एगो परिवार के बेटी आज दुनिया के राजनीति में झंडा गाड़ रहल बाड़ी।
बिहार की मिट्टी से जुड़ी हैं जड़ें
कमला प्रसाद-बिसेसर के पूर्वज बिहार के बक्सर जिले के भेलूपुर गांव से थे। 1889 में उनके परदादा पंडित राम लखन मिश्रा गिरमिटिया मजदूर के रूप में त्रिनिदाद पहुंचे थे। उस दौर में हजारों भोजपुरी भाषी मजदूरों को ब्रिटिश शासन के दौरान कैरेबियन देशों में गन्ने के खेतों में काम के लिए ले जाया गया था।कमला ने कई मंचों पर अपनी भारतीय और भोजपुरी जड़ों पर गर्व जताया है। हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के त्रिनिदाद दौरे के दौरान उन्होंने कहा कि वहां आज भी भारतीय मूल के लोगों को कुली कहकर पुकारा जाता है, लेकिन उन्हें इस पहचान पर शर्म नहीं, गर्व महसूस होता है। उन्होंने कहा, ‘मुझे गर्व है कि एक छोटी-सी कुली लड़की आज त्रिनिदाद की प्रधानमंत्री है।
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आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह मेरे पूर्वजों की वजह से है। यह मेरे आनुवंशिक ढांचे और डीएनए में है। वे, वास्तव में, पढ़-लिख भी नहीं सकते थे, लेकिन वे अपने समुदाय और भूमि की सर्वोत्कृष्ट संस्कृति और मूल्यों को अपने साथ लेकर आए।
कमला प्रसाद-बिसेसर
संघर्षों के बीच बीता बचपन
73 वर्षीय कमला का जन्म दक्षिण त्रिनिदाद के सिपारिया में एक हिंदू भारतीय परिवार में हुआ। उनके पिता लिलराज प्रसाद एक मुनीम थे, जबकि मां रीता प्रसाद घरेलू कामगार और खेतों में मजदूरी करती थीं। बाद में उन्होंने छोटी-सी रोटी की दुकान शुरू की। कमला का पालन-पोषण संयुक्त परिवार में हुआ, जहां भारतीय परंपराएं और धार्मिक संस्कार गहराई से जुड़े थे। उनकी दादी और परदादी ने कठिन परिस्थितियों में परिवार संभाला। कमला कई इंटरव्यू में कह चुकी हैं कि उनके जीवन में महिलाओं की संघर्षशीलता सबसे बड़ी प्रेरणा रही है।
कठिन समय और कई कठिन, अमूल्य जीवन के अनुभवों ने मुझे सिखाया है कि अपने साथी नागरिकों के लिए कुछ बेहतर बनाने में मदद करने के लिए कभी भी देर नहीं होती। यह एक ऐसा सबक है जो मेरे लंबे राजनीतिक जीवन में हमेशा मेरे साथ रहा है। यह मुझे अभी भी आगे ले जा रहा है।
कमला परसाद-बिसेसर
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शिक्षा ने बदली जिंदगी
कमला पढ़ाई में बेहद तेज थीं। उन्होंने लंदन के नॉरवुड टेक्निकल कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट इंडीज तक शिक्षा हासिल की। बाद में कानून की पढ़ाई की और वकील बनीं। दिलचस्प बात यह है कि कम उम्र में ही वह यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट इंडीज में लेक्चरर बन गई थीं। उन्हें फुलब्राइट स्कॉलरशिप भी मिली। उन्होंने शिक्षा, कानून और बिजनेस मैनेजमेंट तीनों क्षेत्रों में उच्च अध्ययन किया। कमला अक्सर कहती हैं कि शिक्षा ही दुनिया का सबसे बड़ा पासपोर्ट है। शायद यही वजह है कि उन्होंने राजनीति में भी शिक्षा और सामाजिक विकास को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी।
राजनीति में बनाया इतिहास
कमला ने 1987 में स्थानीय राजनीति से अपना सफर शुरू किया। इसके बाद वह सांसद बनीं, अटॉर्नी जनरल बनीं और फिर यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस (UNC) की नेता बनीं। 2010 में उन्होंने इतिहास रचते हुए त्रिनिदाद और टोबैगो की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव हासिल किया। उनके नेतृत्व में बहुजातीय गठबंधन ने बड़ी जीत दर्ज की। टाइम मैगजीन ने उन्हें दुनिया की प्रभावशाली महिला नेताओं में शामिल किया था। 2015 में सत्ता गंवाने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और विपक्ष की मजबूत नेता बनी रहीं। अब 2025 में उनकी वापसी को राजनीतिक पुनर्जागरण माना जा रहा है।
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भोजपुरी समाज के लिए क्यों खास हैं कमला?
कमला प्रसाद-बिसेसर की कहानी सिर्फ राजनीति की कहानी नहीं है। यह गिरमिटिया मजदूरों की पीढ़ियों के संघर्ष, मेहनत और सांस्कृतिक पहचान की कहानी है। भोजपुरी समाज के लिए उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि भाषा और जड़ों से जुड़ाव इंसान को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाता है।आज त्रिनिदाद में दिवाली, फगवा, चौताल और भोजपुरी संस्कृति की जो पहचान दिखाई देती है, उसमें भारतीय मूल के लोगों के संघर्ष का बड़ा योगदान है। कमला उसी विरासत का सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा बन चुकी हैं।



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