मुजफ्फरपुर में बच्चों को भोजपुरी, मैथिली, बज्जिका जैसी क्षेत्रीय भाषाओं की कविताएं और गीत सिखाने के लिए ‘बालपन की कविता पहल‘ की शुरुआत की गई है।
पटना: बदलते शिक्षा परिदृश्य में अब बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ने की पहल तेज हो रही है। शिक्षा मंत्रालय के निर्देश पर एससीईआरटी द्वारा ‘बालपन की कविता पहल’ के तहत ऐसी किताब तैयार की जा रही है, जिसमें भोजपुरी, मैथिली, बज्जिका समेत विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं की कविताएं, गीत और लोरियां शामिल होंगी। यह पहल बच्चों को न सिर्फ भाषा से जोड़ने, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।
मातृभाषा में सीखना क्यों है जरूरी
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में सबसे तेजी से सीखते हैं। जब पढ़ाई उसी भाषा में होती है, जो बच्चे घर में बोलते हैं, तो वे विषयों को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं। यह पहल बच्चों की समझ, आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति क्षमता को मजबूत करेगी।
लोकगीत और लोरियां, संस्कृति से जुड़ाव का माध्यम
इस पहल के तहत केवल कविताएं ही नहीं, बल्कि लोकगीत और लोरियां भी शामिल की जा रही हैं। ये वे धरोहरें हैं जो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। किताब के जरिए बच्चों को इन पारंपरिक स्वरूपों से परिचित कराया जाएगा, जिससे वे अपनी संस्कृति को महसूस कर सकें।
बहुभाषी शिक्षा की ओर बढ़ता कदम
हर जिले से स्थानीय भाषाओं की 10-20 रचनाएं मंगाई गई हैं। इनमें से चयनित सामग्री को पुस्तक में शामिल किया जाएगा। इससे बच्चे एक साथ कई भाषाओं से परिचित होंगे और मल्टी-लिंगुअल लर्निंग को बढ़ावा मिलेगा।
स्थानीय कलाकारों को मिलेगा मंच
इस पहल का एक बड़ा फायदा यह भी है कि स्थानीय गीतकारों और कवियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। जो रचनाएं अब तक सीमित दायरे में थीं, वे अब किताब के माध्यम से व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचेंगी।
शिक्षा को बनाएगा अधिक प्रासंगिक
क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री जोड़ने से शिक्षा अधिक जीवन से जुड़ी और रोचक बनेगी। बच्चे किताबों को बोझ नहीं, बल्कि अपनी भाषा और अनुभव से जुड़ा माध्यम समझेंगे। इससे स्कूल में उनकी भागीदारी और रुचि दोनों बढ़ेगी।

