शब्दों की जंग और संस्कृति की रंगत है 150 वर्ष पुरानी भोजपुरी दुगोला

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इस खत्म हो रही परम्परा को बचाना है तो आर्केस्ट्रा से दूरी बनानी होगी

पटना/गोरखपुर: भोजपुरी अंचल की लोक संस्कृति में दुगोला एक ऐसी परंपरा है, जहां गीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि संवाद और मुकाबले का माध्यम बन जाते हैं। दो पक्षों के बीच शब्दों और सुरों की यह जंग गांवों की चौपाल से निकलकर आज भी मेलों और आयोजनों में अपनी पहचान बनाए हुए है, हालांकि बदलते दौर में इसके सामने कई चुनौतियां भी खड़ी हैं।

कहां जिंदा है यह परंपरा
भोजपुरी दुगोला आज भी मुख्य रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में जीवित है। बिहार के छपरा, सिवान, भोजपुर (आरा), बक्सर, मुजफ्फरपुर और वैशाली जैसे जिलों में इसके आयोजन देखने को मिलते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, बलिया, कुशीनगर, गाजीपुर, देवरिया, मऊ और वाराणसी के ग्रामीण क्षेत्र भी इसके प्रमुख केंद्र हैं। यह आयोजन आमतौर पर मेलों, हाट-बाजारों, शादी-ब्याह, छठ, होली और सावन जैसे त्योहारों पर होते हैं। पहले जहां हर गांव में यह आम बात थी, अब यह सीमित आयोजनों तक सिमट गया है, लेकिन जहां भी होता है, वहां लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है।

टीमवर्क की अनोखी शैली
दुगोला की प्रस्तुति में आमतौर पर दो टीमें होती हैं, जिनमें हर टीम में चार से आठ कलाकार शामिल होते हैं। एक मुख्य गायक होता है, जो तर्क या प्रश्न के रूप में गीत प्रस्तुत करता है, जबकि अन्य कलाकार कोरस और वाद्य यंत्रों के जरिए उसका साथ देते हैं। ढोलक, हारमोनियम, झांझ और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्र इसका आधार होते हैं। दुगोला की सबसे बड़ी खासियत है तुरंत गीत गढ़ने की क्षमता। गायक मौके पर ही शब्दों को गूंथकर तुकबंदी और अर्थ के साथ पेश करते हैं। इसमें हास्य, व्यंग्य, प्रेम, सामाजिक मुद्दे सब कुछ शामिल होता है। यही कारण है कि यह कला केवल गायन नहीं, बल्कि तेज दिमाग और रचनात्मकता की भी परीक्षा है।
आज भी बिहार और यूपी में सैकड़ों लोक कलाकार इस परंपरा से जुड़े हुए हैं, लेकिन यह संख्या धीरे-धीरे घट रही है। इसका बड़ा कारण यह है कि नई पीढ़ी इसमें कम रुचि ले रही है और आर्थिक स्थिरता के अभाव में कलाकार अन्य पेशों की ओर जा रहे हैं।

चौपाल से मंच तक का सफर
भोजपुरी दुगोला की परंपरा लगभग 100 से 150 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इसकी शुरुआत गांवों की चौपालों में भक्ति गीतों और लोकगीतों के रूप में हुई थी। समय के साथ इसमें तर्क-वितर्क और प्रतिस्पर्धा का तत्व जुड़ गया, जिससे यह “गीतों की बहस” के रूप में विकसित हुआ।
यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि सामाजिक मुद्दों, रिश्तों और राजनीतिक विषयों पर चर्चा का भी माध्यम था। इसने गांवों में संवाद और सामूहिक भागीदारी को बढ़ावा दिया।

चुनौतियां और गिरावट
आधुनिक समय में डीजे संस्कृति और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव ने दुगोला के मंच को सीमित कर दिया है। कई आयोजनों में पारंपरिक कार्यक्रमों की जगह तेज संगीत और आधुनिक शो ने ले ली है। इसके अलावा, कुछ जगहों पर अश्लीलता के प्रवेश ने भी इस कला की गरिमा को प्रभावित किया है। इन कारणों से दुगोला की लोकप्रियता में कमी आई है और यह परंपरा धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही है।

संभावनाएं और पुनर्जीवन की राह
इसके बावजूद, दुगोला के पुनर्जीवन की संभावनाएं अभी भी मजबूत हैं। यदि इसे डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे यूट्यूब और सोशल मीडिया से जोड़ा जाए, स्कूलों और कॉलेजों में लोक कला के रूप में शामिल किया जाए और सरकारी व मीडिया स्तर पर प्रोत्साहन मिले, तो यह फिर से लोकप्रिय हो सकता है। यह कला न केवल मनोरंजन देती है, बल्कि भाषा, संस्कृति और सामूहिक संवाद को भी जीवित रखती है।
भोजपुरी अंचल की लोक परंपराओं में एक अनोखी और रोमांचक कला है दुगोला। यह केवल गायन नहीं, बल्कि शब्दों, बुद्धिमत्ता और तर्क का ऐसा मंच है, जहां दो पक्ष गीतों के माध्यम से आमने-सामने होते हैं। बदलते समय में जहां कई लोक कलाएं लुप्त हो रही हैं, वहीं दुगोला आज भी गांवों की चौपाल और मेलों में जीवंत है।

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