पटना: भोजपुरी गीत-गवाई भोजपुरी भाषा की सबसे जीवंत और भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। यह केवल गीत नहीं, बल्कि एक पूरा अनुष्ठान है जिसमें गीत, संगीत, नृत्य, प्रार्थना और सामुदायिक बंधन एक साथ जुड़ते हैं। मुख्य रूप से मॉरीशस में प्रचलित यह परंपरा 19वीं शताब्दी के गिरमिटिया मजदूरों के साथ भारत से मॉरीशस पहुंची और वहां विकसित होकर विश्व स्तर पर पहचानी गई। यूनेस्को ने 2016 में ‘भोजपुरी लोकगीत: गीत-गवाई’ को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। यह परंपरा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के भोजपुरी अंचल की स्त्री-केंद्रित लोक संस्कृति का जीवंत साक्षी है, जो प्रवास की पीड़ा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करती है। आज यह मॉरीशस की राष्ट्रीय धरोहर बन चुकी है और भारत में भी इसके उत्सव मनाए जाते हैं।
उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजपुरी गीत-गवाई की जड़ें प्राचीन भोजपुरी लोकजीवन में हैं। भोजपुरी भाषा हिंदुस्तानी की पूर्वी शाखा है, जो गंगा के मैदानी इलाकों (बिहार, पूर्वांचल) में बोली जाती है। यहां स्त्रियां सदियों से जीवन के हर संस्कार जन्म, विवाह, ऋतु परिवर्तन पर गीत गाती आई हैं। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय जैसे लोकसाहित्यकारों ने ‘भोजपुरी लोकगीत’ और ‘भोजपुरी लोकसंगीत’ में इनकी विस्तृत चर्चा की है। ये गीत मौखिक परंपरा से संचरित होते थे, जहां महिलाएं समूह में गाकर भावनाओं को व्यक्त करती थीं। वैदिक मंत्रों के साथ ये लोकगीत विवाह या जन्म को मधुर बनाते थे।
19वीं शताब्दी में ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था ने लाखों भोजपुरी बोलने वाले मजदूरों को ‘गिरमिटिया’ के रूप में कैरेबियन, फिजी, मॉरीशस और अफ्रीका भेजा। 1834 से 1920 के बीच मॉरीशस में करीब पांच लाख भारतीय पहुंचे, जिनमें महिलाएं भी थीं। इन महिलाओं ने अपनी लोक परंपरा को साथ लिया। मॉरीशस में अलग-थलग पड़े समुदाय ने इन गीतों को संरक्षित रखा और उन्हें नए रूप दिया। यहां गीत-गवाई विवाह पूर्व अनुष्ठान बन गया, जो परिवार और पड़ोस की महिलाओं द्वारा किया जाता था। प्रवास की पीड़ा, परिवार से बिछोह, कठिन श्रम, सांस्कृतिक अलगाव इन गीतों में झलकती है। बिदेसिया, बारहमासा और सोहर जैसे गीत प्रवासी जीवन की कहानी बन गए। मॉरीशस में यह परंपरा ‘गीत-गवाई’ नाम से प्रसिद्ध हुई, जहां गीतों में स्थानीय क्रिओल प्रभाव भी मिला, लेकिन मूल भोजपुरी लय और भाव बरकरार रहा।
भारत में भोजपुरी लोकगीतों के प्रकार
गीत-गवाई की नींव भारत के भोजपुरी लोकगीतों पर टिकी है। इनका वर्गीकरण जीवन-चक्र और ऋतु के आधार पर होता है:
सोहर: पुत्र जन्म पर गाए जाते हैं। जच्चा के घर महिलाएं दरवाजे पर बैठकर गाती हैं। इसमें गर्भ की वेदना, सास का मंगल और शिशु के जन्म की खुशी का वर्णन होता है।
खेलवना: सोहर का उत्तरार्ध, जिसमें शिशु का रोना, माता-पिता का आनंद और सास का हर्ष प्रमुख है।
विवाह गीत: सबसे समृद्ध श्रेणी। वररक्षा, तिलक, परीछन, गुरथी पर अलग-अलग गीत। वैवाहिक परिहास (हास्य) और गवना (दुल्हन का ससुराल जाना) के गीत बिछोह की करुणा से भरे होते हैं।
बारहमासा: पति के परदेश जाने पर 12 महीनों की व्यथा। सावन के झूला गीत प्रसिद्ध हैं।
जात (जाँतसारी): जाँत पीसते समय गाए जाते हैं। वियोग की भावना प्रमुख।
झूमर (झूमर): द्रुत लय में खड़े होकर झूम-झूमकर गाए जाते हैं। मॉरीशस में यह गीत-गवाई का मुख्य हिस्सा है।
चैता और बिरहा: वसंत और वीर रस के गीत। पुरुष भी गाते हैं।
कजरी, सोहनी, छठी माता, शीतला गीत: ऋतु, कृषि और देवी पूजा से जुड़े। ये गीत पिंगल छंद से मुक्त होते हैं, लय प्राकृतिक और भाव हृदयस्पर्शी। महिलाएं मुख्य गायिकाएं होती हैं, जो सामाजिक कुरीतियों (दहेज, पितृसत्ता) पर भी व्यंग्य करती हैं।
मॉरीशस में गीत-गवाई की अनुष्ठानिक प्रक्रिया
मॉरीशस में गीत-गवाई विवाह पूर्व समारोह है। वर या वधू के घर पर आयोजित होता है। पांच विवाहित महिलाएं हल्दी, चावल, घास और पैसे को कपड़े में रखकर छांटती हैं। अन्य महिलाएं देवी-देवताओं (शिव, पार्वती, गणेश) की स्तुति गाती हैं। जगह पवित्र होने के बाद मां और ढोलक वादक वाद्यों का पूजन करते हैं। फिर उत्साहपूर्ण गीत शुरू होते हैं झूमर, सोहर, चौता आदि। सब नाचते हैं। शुरू में केवल महिलाओं का समूह था, अब पुरुष भी शामिल होते हैं और सार्वजनिक प्रदर्शन होते हैं।
वाद्ययंत्र सरल हैं: ढोलक मुख्य, मंजीरा, झांझ और कभी-कभी हारमोनियम। लय कहरवा ताल पर आधारित। गीत भोजपुरी में होते हैं, लेकिन क्रिओल मिश्रण भी। विषय प्रवास की याद, परिवार बिछोह, सांस्कृतिक गौरव और समसामयिक मुद्दे (जलवायु परिवर्तन, सामाजिक न्याय)।
सांस्कृतिक महत्व और सामाजिक भूमिका
गीत-गवाई सामुदायिक पहचान का प्रतीक है। यह जाति-वर्ग की दीवारें तोड़ता है, सामूहिक स्मृति बनाए रखता है। महिलाओं को अभिव्यक्ति का माध्यम देता है, वे अपनी पीड़ा, प्रतिरोध और खुशी गाती हैं। प्रवासी इतिहास को जीवित रखता है: गिरमिटिया काल की कठिनाइयां, लेकिन सांस्कृतिक निरंतरता। मॉरीशस में यह राष्ट्रीय एकता का साधन है। भारत में भी यह लोक जीवन का आईना—ग्रामीण संघर्ष, स्त्री शक्ति और सामाजिक चेतना का। भिखारी ठाकुर जैसे लोक कवियों ने इन गीतों को नाटकों में भी इस्तेमाल किया।
यूनेस्को मान्यता और संरक्षण प्रयास
1 दिसंबर 2016 को यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया। इससे वैश्विक पहचान मिली। मॉरीशस में भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन ‘गीत-गवाई स्कूल’ चलाता है। परिवार, समुदाय केंद्र और अकादमियां पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान हस्तांतरित करती हैं। भारत में भी शारदा सिन्हा, कल्पना पटवारी, चंदन तिवारी जैसे कलाकार इसे जीवित रखते हैं। गीत-गवाई उत्सव (जैसे 2020 का जलवायु परिवर्तन थीम वाला) समसामयिक मुद्दों को जोड़ते हैं।
वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियां
आज गीत-गवाई पारंपरिक और आधुनिक का मिश्रण है। युवा पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए समसामयिक गीत लिखे जा रहे हैं। मॉरीशस और भारत में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर इसका प्रसार बढ़ा। फिर भी शहरीकरण, पलायन और युवाओं की अनभिज्ञता चुनौती है। संरक्षण के लिए स्कूल, रिकॉर्डिंग और उत्सव जरूरी हैं। यह परंपरा लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय जैसे लक्ष्यों से जुड़ी है। भोजपुरी गीत-गवाई सिर्फ गीत नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुल है, भारत से मॉरीशस तक, अतीत से वर्तमान तक। यह हमें याद दिलाता है कि लोक संस्कृति कितनी शक्तिशाली होती है। यह प्रवास की पीड़ा को गीत में बदलकर अमर बना देती है। आज जब विश्वीकरण संस्कृतियों को मिटा रहा है, गीत-गवाई जैसी परंपराएं हमें जड़ों से जोड़े रखती हैं। भोजपुरी गीत-गवाई न केवल भोजपुरिया पहचान का प्रतीक है, बल्कि समग्र भारतीय लोक धरोहर का गौरव है।

