‘रंगमहल’ से ‘दीवाने जौहर’ तक, भोजपुरी ग़ज़ल की नई उड़ान

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गिरीश पंकज

केंद्र में पुस्तक : ‘दीवाने जौहर बनाम रंगमहल’

भोजपुरी इस देश की सबसे मीठी ज़ुबानों में एक है। एक दौर रहा, जब भोजपुरी में सैकड़ों रचनाकारों ने इस भाषा में अपना प्रदेय देकर इसे समृद्ध किया। तेग अली तेग बनारसी- बेढब बनारसी से आज तक, उन सबके नाम लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि सब जानते हैं।

मैं वर्तमान परिदृश्य की बात करूंगा। पिछले कुछ वर्षों में भोजपुरी ग़ज़लों की दुनिया में एक इकलौता नाम जो तेजी के साथ चर्चित हुआ, वह है डॉ. जौहर शफियाबादी का। यह मुँहदेखी बात नहीं, देखीभाली बात है। इनके रचनात्मक कौशल से मैं ही नहीं, अनेक विद्वान वाकिफ हैं। डॉ. विवेकी राय और डॉ. नामवर सिंह जैसे अनेक दिग्गजों ने डॉ. जौहर की गजलों को सराहा।

वर्षों पहले इनका भोजपुरी दीवान रंगमहल मुझे हस्तगत हुआ था। उसको मैं निरंतर पढ़ता रहा। खुशी की बात है कि अब इसका नया संशोधित, संवर्धित संस्करण दीवाने जौहर बनाम रंगमहल के रूप में सामने आया है। इसमें अनेक नई गजलों का समावेश हुआ है। इसमें सिर्फ ठेठ ग़ज़ल ही नहीं है। भजन-सूफी ग़ज़ल, दोहा ग़ज़ल, सोरठा ग़ज़ल, मुसलसल ग़ज़ल, भोजपुरी नज़्म के भी कुछ सुंदर नमूने देखने को मिलेंगे।

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इन्होंने एक और सुंदर प्रयोग किया है, जिसे मैंने सिर्फ उर्दु साहित्य में ग़ालिब, मीरतक़ी मीर के यहाँ देखा है। इन्होंने देवनागरी के स्वर और व्यंजन को क्रमवार रदीफ़ बनाया है। जैसे रदीफ़ क है, तो अंतिम अक्षर क होगा। ख रदीफ़ है तो अंतिम अक्षर ख ही आएगा। ‘क’ और ‘ख’ के दो उदाहरण देखें जो दीवान लेखन की आत्मा है।

दुख सुख साइत साँचे चाक
रोज समय के नाचे चाक

सिरसे ऊ का टाले दुख
जे बिन कारण पाले दुख।

इस तरह यह एक प्रयोगधर्मी दीवान है, जिसमें सृजन के बहुरंग नजर आएंगे। इसका मतलब यह नहीं कि सिर्फ प्रयोग है। हर ग़ज़ल में, उसके हर शे’र में जीवन-दर्शन है। सिर्फ कहने के लिए गजल नहीं कही गई। हर रचना सोद्देश्य है। वजनदार है। सोचने के लिए विवश करने वाली है।

फेसबुक के माध्यम से भी जौहर जी की भोजपुरी ग़ज़लें देश-दुनिया में मशहूर हो रही हैं। जिस सहज-सरल तरीके से जौहर जी अपना जौहर दिखाते हैं, वह कमाल का है। इसलिए अगर उनके चाहने वाले इन्हें भोजपुरी का कबीर कहते हैं, तो गलत नहीं कहते। इनकी शायरी का जो सूफियानापन है, वह इन्हें कबीरी तेवर से भी आगे संत परम्परा से जोड़ देता है।

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जौहर जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे हदों को तोड़कर आगे बढते हैं। संकुचित विचारवाले तालाब में सिमटकर रह जाते हैं लेकिन जो विचारों की नदी की तरह बहते हैं, वे हरदम निर्मल बने रहते हैं। यही कारण है कि जौहरजी का लेखन निर्मल नीर की तरह प्रवहमान रहता है और समाज की प्यास को शांत करता चलता है।

इसके पहले भी मैंने जौहर जी के लेखन पर कलम चलाने का सौभाग्य प्राप्त किया था। खासकर उनके गद्य व्यंग्य को मैंने बहुत बारीकी के साथ देखा था और उसके बाद उनके रंगमहल को भी देखा।

इन दिनों साहित्य में सूफी परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है। इस समय जो नया साहित्य लिखा जा रहा है, वह नयेपन के चक्कर में अपनी परंपरा और संस्कृति से कट चुका है। अब जो साहित्य लिखा जा रहा है, उसको समझ पाना बेहद कठिन है। क्योंकि उसका शिल्प इतना जटिल है कि उसे सिर्फ आलोचक ही समझ सकता है। आम पाठक नहीं। यह रचना की कमजोरी है कि वह पाठकों के पल्ले ही न पड़े। नई कविता की त्रासदी यही है। लेकिन गजल आज भी लोगों को समझ में आती है।

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भारतीय भाषाओं में इस वक्त कुछ लोग गजल कह रहे हैं। बहुत सी गजलों को मैंने पढ़ा है, लेकिन जो डॉ. जौहर के कहन का अंदाज सबसे जुदा है। क्योंकि उनमें जीवन-दर्शन है। जैसे एक संत लोक कल्याण के लिए प्रवचन करता है, उसी तरह जौहरजी अपनी भोजपुरी गजलों के माध्यम से एक तरह से प्रवचन ही करते हैं। समाज की जड़ता को तोड़ने के लिए व्याकुल होते हैं। इसलिए गजल के माध्यम से दुनिया को प्यार लुटाना चाहते हैं। उनकी ग़ज़ल पारंपरिक प्यार मोहब्बत से ऊपर उठकर मनुष्य के आपसी प्रेम-व्यवहार की बात कहती है। तभी तो ग़ज़ल की परिभाषा देते हुए वे कहते हैं,

सच्चा सच्चा प्यार ग़ज़ल ह।
मन-गंगा के धार ग़ज़ल ह।
मन भाये ल, दिल छू-छू जाये।
रचना के सिंगार गजल ह।
दुख के अंधीयारी कोठरी में,
आशा के उजियार का गजल ह।

गजल हमें सिर्फ और रूमानी दुनिया की सैर कराती रहे। हुस्न और इश्क की घेरेबंदी में कैद रखे, तो मुझे लगता है यह अपने समय के साथ विश्वासघात करना होगा। यह समय मजनू बन कर घूमने का नहीं है। यह समय एक रचनाकार के लिए कबीर की तरह जागकर दिशा दिखाने का समय है। और मैंने देखा है कि यह काम जौहरजी पूरी निष्ठा के साथ कर रहे हैं। और अब तो वह सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोक जागरण की दिशा में काम कर रहे हैं।

उनका केवल हुलिया ही सूफियाना नहीं है, उनका जीवन दर्शन और उनकी रचनाएं भी सूफियाना-संस्कृति को गति प्रदान करने वाली हैं।

डॉ. जौहर मंगलाचरण से ही अपनी रचनात्मकता का संकेत दे देते हैं, जब वे भजन में हम्द में फरमाते हैं,

बनल बार मंदिर मस्जिद के सोभा
सुरतिया में तू हीं मुरतिया में तू हीं
कवन जात हउव धरम का ह बोला
गगरिया में तू हीं अंचरिया में तू हीं।

‘आपन बात’ में भी गजल कहकर जौहरजी अपनी सोच को दर्शाते हैं,

असरदार बहुते ह, नाजुक विधा ई
जमाना के सुर एकरा, तेवर में भर दीं।
अंचरिया में लयदार मोती बिछा के
बहर, काफिया के नगीना अस जड़ दीं।

गजल को अनेक लोगों ने बहुत आसान विधा समझ ली है। कुछ लोगों ने सोचा कि रदीफ़, श काफिया मिल जाय तो ग़ज़ल हो जाती है। अगर प्रेमी-प्रेमिका की मोहब्बत की बातें हो जाएं तो ग़ज़ल हो जाती है। लेकिन क्या सिर्फ इतना हो जाने से कोई बड़ी ग़ज़ल हो जाती है? मेरे ख्याल से नहीं।

इसी भावना की तस्दीक करते हुए डॉ. जौहर ने गजल की अपनी एक परिभाषा दी है, जो काबिलेगौर है। वे फरमाते हैं,

सच्चा सच्चा प्यार ग़ज़ल ह
मन-गंगा के धार ग़ज़ल ह
दुख के अधिकारी कोठारी में
आशा के उजियार ग़ज़ल ह
जौहर ह इतिहास समय के
जिनगी के व्यापार ग़ज़ल ह।

हमारे समय के गांव की हालत किसी से छिपी नहीं है। शहर चमकदार होते जा रहे हैं, और गांव दिनोंदिन बदरंग। गांव का मुखिया खुशहाल होता जा रहा है और गांव का रहवासी बदहाल। इस सत्य को पीड़ा के साथ व्यक्त करते हैं डॉ. जोहर शफियाबादी। यही इनकी मूल पहचान है। वे दो टूक कहते हैं। देखिए, गजल के दो शेर,

बुढ़वा बरगद का छँहरी में भूखा-नंगा गाँव के लोग।
आनहीं-बूनी, जाड़ा-ठाढ़ा, ओला-बरखा छांव के लोग।
रउवो एक दिन रंगमहल से झांक के देखीं जिनगी के
भूख से केल्हवा काटत लइका, माड़ के झगड़ा ठाँव के लोग

भोजपुरी ग़ज़ल में एक तरह से जनवादी मूल्यों का तड़का लगाने वाले इस सूफी शायर की हर गजल हमें सोचने पर विवश करती है। और मैं समझता हूं किसी भी रचना की यही सार्थकता है कि वह पाठक को चिंतन मनन के लिए बाध्य कर दे। अगर ग़ज़ल हमें सिर्फ ख्यालों की दुनिया में भटकाती रहे और यथार्थ से उसका सरोकार कट जाए, तो कम-से-कम मेरा अपना मानना है कि ऐसा लेखन बेमानी है।

आखिर हम साहित्य या शायरी में कब तक कलाबाज़ी की गठरी लादकर चलते रहेंगे? अब हमें यथार्थ की पगडंडियों से गुजर कर लोकमंगल के लक्ष्य तक का सफर तय करना है। डॉ. जौहर शफियाबादी यही कर रहे हैं।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि रचनाकार ने अपने आप को संवेदनहीन बना लिया है। उसके भीतर भी प्रेम के, अनुराग के चटक रंग हैं और वह लोगों को अपनी कुछेक रचनाओं के माध्यम से जीवन में रंग भरना चाहता है। इसीलिए वे अपनी एक ग़ज़ल में मनुष्य के अंतर्मन की रंगीली दुनिया को आबाद रखने के लिए भी कुछ शेर कहते हैं। उनके दो शेर यहां मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। इस ग़ज़ल की खासियत यह है कि इसमें उन्होंने दोहा छंद का सफल निर्वाह किया है। यानी तेरह-ग्यारह मात्राएं। देखें,

बदलल- बदलल आज बा, हरजाई के रंग।
फागुन लेकर आ गइल, बौराई के रंग।
जौहर तीता छोड़ के बोलीं मीठा बोल।
दुनिया भर में बाँट दीं, अच्छाई के रंग।

शायरी में छोटी बहर में भी कमाल की बातें की जा सकती हैं। कम शब्दों में बड़ी बात कहना यानी गागर में सागर भरना। रंगमहल में कुछ गजलें ही बड़ी बहर में है, लेकिन अधिकांश छोटी बहर वाली हैं। वैसे दोनों तरह की गजलों का अपना रंग है लेकिन छोटी बहर का अपना एक अलग आनंद है। जैसे ये शेर देखें,

प्यार कब बा यार में
का बचल संसार में
खास दंगा के खबर
आज बा अखबार में
अब ना लागत बा इहां
आदमी सरकार में
के बचाई आ केअब
नाव बा मझधार में

जोहर जी के शायरी के अनेक रंग है। हर शेर का यहां का उदाहरण देना उचित नहीं है क्योंकि कुछ पन्नों के बाद सुधी पाठक डॉ. जौहर की रचनात्मक प्रतिभा से भली भांति परिचित हो जाएंगे। इसलिए हर शेर या कलाम की व्याख्या करना जरूरी नहीं समझता।

अंत में मुसलसल गजलें भी कही हैं। मुसलसल ग़ज़ल में किसी एक विषय को लेकर शायर अपनी बात करता है। अपनी एक मुसलसल गजल में वे गंगा यमुना और पानी बचाने की बात करते हैं। और नज़्म में वे केवल गंगा यमुना की बात करते हैं और मुसलसल गजल और नज़्म के अंतर को समझाते हैं।

समापन करते हुए अंततः बस इतना ही कहना चाहूंगा कि भोजपुरी कविता को ग़ज़ल रूप में प्रस्तुत करके जौहर जी ने अद्भुत कार्य किया है। मुझे लगता है कि उन्होंने एक ऐसी परंपरा की शुरुआत की है जिसे देख कर आने वाली पीढ़ी भी इसका अनुकरण करेगी। और भोजपुरी भाषा में भी ग़ज़ल की एक और समृद्ध परंपरा पुष्पित पल्लवित होगी। इसका पूरा श्रेय डॉ. जौहर शफियाबादी को जाएगा, इसलिए हम कह सकते हैं कि भोजपुरी ग़ज़ल साहित्य में डॉ. शफियाबादी एक नये रचनात्मक अवतार के रूप में प्रस्तुत हुए हैं।

(हिन्दी साहित्य के ख्यातिलब्ध, वरिष्ठ साहित्यकार, ग़ज़लकार, व्यंग्यकार।) संपादक, साहित्य दर्पण, रायपुर, छत्तीसगढ़

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