डॉ. आशा कुमारी, प्राध्यापक (हिंदी), मगध महिला महाविद्यालय, पटना, बिहार
भोजपुरी साहित्य में प्रबंध एवं खंड-काव्यों की समृद्ध परंपरा रही है। इसी ऐतिहासिक धारा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ ने ‘एकलव्य’ नामक खंड-काव्य की रचना की है। यह ग्रंथ कुल नौ सर्गों में विभाजित है:
- उद्देश्य (पृष्ठ 17)
- द्वापर महिमा (पृष्ठ 26)
- एकलव्य के परिचय (पृष्ठ 33)
- द्रोण (पृष्ठ 44)
- गुरु दर्शन (पृष्ठ 53)
- वन भ्रमण (पृष्ठ 65)
- अउँठा दान (पृष्ठ 74)
- उपसंहार (पृष्ठ 83)
- निहोरा (पृष्ठ 90)
प्रस्तुत काव्य केवल पौराणिक कथा का पुनराख्यान नहीं है, बल्कि आधुनिक संदर्भों, शिक्षा प्रणाली की कमियों तथा गुरु-शिष्य संबंधों के पुनर्पाठ पर आधारित एक संदेशमूलक रचना है।
कथावस्तु एवं सर्गवार विस्तृत विश्लेषण
सर्ग 1: उद्देश्य (पृष्ठ 17–25)
प्रथम सर्ग में कवि ने इस खंड-काव्य की रचना का मूल ध्येय स्पष्ट किया है। कवि समाज में नैतिकता के ह्रास, शिक्षा व्यवस्था के व्यापार बन जाने और शिष्यों में समर्पण भाव की कमी पर चिंता व्यक्त करते हैं। गुरु-शिष्य संबंध की पवित्रता और शिष्य की सफलता में गुरु के गौरव की प्रतिष्ठा यहाँ मुख्य विषय है।
उदाहरण:
“चेला जब जग में नाम करे / कवनो जब अजगुत काम करे
तऽ गुरू के हियवा हरसेला / आशीष नयन से बरसेला।” (पृष्ठ 23)
सर्ग 2: द्वापर महिमा (पृष्ठ 26–32)
इस सर्ग में द्वापर युग की विशेषताओं का चित्रण है। इसमें आरुणि की गुरुभक्ति, कृष्ण-सुदामा की मित्रता, कौरव-पांडव संघर्ष और द्रौपदी चीरहरण जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए युगधर्म तथा पाप-पुण्य के संतुलन को रेखांकित किया गया है।
उदाहरण:
“आठ लाख चउसठ हजार के बरस हवे। / हऽ कठोर कबहीं तऽ कबहीं सरस हवे।” (पृष्ठ 26)
सर्ग 3: एकलव्य के परिचय (पृष्ठ 33–43)
इस सर्ग में हस्तिनापुर के वनों में निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य के रूप, सौंदर्य, सादगी और धनुर्विद्या के प्रति उनके अगाध अनुराग का विशद वर्णन है। एकलव्य के मन में गुरु द्रोण से शिक्षा प्राप्त करने की उत्कट लालसा उत्पन्न होती है।
उदाहरण:
“करिया कुच-कुच उनके देहिया / सबका से राखस उ नेहिया
उँचगर लिलार अँखिया लमहर / घुंघराला बाल रहे घनहर।” (पृष्ठ 34)
सर्ग 4: द्रोण (पृष्ठ 44–52)
इस सर्ग में महर्षि भारद्वाज के आश्रम से लेकर गुरु द्रोणाचार्य के जीवन के संघर्षों, परशुराम से विद्या प्राप्ति, द्रुपद द्वारा किए गए अनादर तथा हस्तिनापुर में राजकुमारों के आचार्य बनने की गाथा वर्णित है।
उदाहरण:
“इहे ‘द्रोण’ एकलव्य कहानी के कारण / साँच कहीं त भीलपुत्र के जगतारन
रहते ना से द्रोण त कइसे जग जानित / भीलपुत्र एकलव्य जगत में के बाड़न?” (पृष्ठ 52)
सर्ग 5: गुरु दर्शन (पृष्ठ 53–64)
इस सर्ग में एकलव्य शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा लेकर गुरु द्रोण के समीप पहुँचते हैं। राजसत्ता के दबाव और सामाजिक मर्यादाओं (द्विजेतर को शिक्षा न देने की विवशता) के कारण द्रोण उन्हें प्रत्यक्ष शिष्य के रूप में स्वीकार करने में असमर्थता जताते हैं। एकलव्य निराश होकर वन में गुरु की मिट्टी की प्रतिमा बनाते हैं और अनवरत अभ्यास करके अद्वितीय धनुर्धर बन जाते हैं।
उदाहरण:
“बानर भालू बाघ सिंह सब उनकर कला निहारस / जंगलवा के फूल-पात उनके आरती उतारस
गुरु मूरत में सरधा से ऊ अइसन गुन पा गइलें / कुछे दिन में भीलपुत्र जी महाधनुर्धर भइलें।” (पृष्ठ 63)
सर्ग 6: वन भ्रमण (पृष्ठ 65–73)
गुरु द्रोण कौरव-पांडव राजकुमारों के साथ वन भ्रमण पर निकलते हैं। वहाँ एक भौंकते हुए कुत्ते का मुँह बाणों से बिना रक्त बहाए बंद करने की अद्भुत कला देखकर अर्जुन और द्रोण आश्चर्यचकित रह जाते हैं। खोज करने पर उनकी भेंट एकलव्य से होती है।
उदाहरण:
“देखले कि उ तीर धनुष के करत रहे अभ्यास / अजगुत कला धनुष के देखी होखे न विश्वास” (पृष्ठ 69)
सर्ग 7: अउँठा दान (पृष्ठ 74–82)
यह कथा का सर्वाधिक मार्मिक और महत्वपूर्ण सर्ग है। कवि यहाँ स्थापित धारणाओं से हटकर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, द्रोण ने एकलव्य को इतिहास में अमरता दिलाने तथा उनके त्याग को सर्वोपरि स्थान देने के उद्देश्य से दक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा माँगा, जिसे एकलव्य ने सहर्ष समर्पित कर दिया।
उदाहरण:
“गुरुवर द्रोण के संकल्पो में रहे ना घर-परिवार / उनका त बस रहे करे के, आज दलित-उद्धार
एके भाव रहे कि कइसे चेला पाई नाम / भले हमीं ए दुनिया में होई चाहे बदनाम।” (पृष्ठ 76)
सर्ग 8: उपसंहार (पृष्ठ 83–89)
इस सर्ग में वर्तमान व्यावसायिक शिक्षा पद्धति और कोचिंग-ट्यूशन संस्कृति की आलोचना करते हुए पारंपरिक गुरुकुल परंपरा की पुनर्स्थापना पर बल दिया गया है।
उदाहरण:
“कोचिंग आ ट्यूसन में बाड़े गुरुवर आज बन्हाइल / गुरुकुल शबद कहीं कोना में बाटे आज लुकाइल।” (पृष्ठ 85)
सर्ग 9: निहोरा (पृष्ठ 90–92)
अंतिम सर्ग कवि की विनम्र प्रार्थना और निवेदन है। कवि समाज में पूर्वाग्रहों को दूर करके गुरु-शिष्य के पावन भाव, त्याग और भ्रातृभाव को पुनः जीवित करने का आग्रह करते हैं।
उदाहरण:
“इहे तऽ जनावेला, मनावेला कि गुरुप्रेम / त्याग आ समर्पण अमर बनावेला,
जेकरा में सेवाभाव गुरु के निमित होला / ओकरे बड़ाई जुग जुग इहाँ गावेला।” (पृष्ठ 91)
तुलनात्मक दृष्टि एवं नव-मूल्यांकन
इस खंड-काव्य की सबसे बड़ी विशेषता इसका तुलनात्मक एवं पुनर्विमर्शपरक दृष्टिकोण है।
पारंपरिक बनाम ‘मस्ताना’ जी का दृष्टिकोण
पारंपरिक आख्यान: महाभारत और उत्तरवर्ती साहित्य में द्रोणाचार्य को प्रायः पक्षपाती, अर्जुन-केंद्रित और एकलव्य के साथ अन्याय करने वाले निष्ठुर गुरु के रूप में चित्रित किया गया है।
कवि का नव-दृष्टिकोण: डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ द्रोण की विवशताओं (राजसत्ता के प्रति दायित्व एवं आर्थिक परतंत्रता) को उजागर करते हैं। कवि की स्थापना है कि यदि द्रोण अंगूठा नहीं माँगते, तो जंगल का यह भील पुत्र इतिहास के पन्नों में लुप्त हो जाता। गुरु द्रोण ने स्वयं बदनामी का विष पीकर अपने शिष्य को सर्वकालिक अमरता प्रदान की।
मैथिलीशरण गुप्त की परंपरा से तुलना
जिस प्रकार राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘साकेत’ में उर्मिला और कैकेयी (‘धन्य लाल की माई’) जैसे उपेक्षित पात्रों का पुनर्मूल्यांकन करके उन्हें गौरव प्रदान किया, ठीक उसी परंपरा में डॉ. ‘मस्ताना’ ने गुरु द्रोण पर लगे ऐतिहासिक कलंक को धोकर उनकी गुरुता और त्याग को स्थापित किया है।
प्राचीन गुरुकुल बनाम आधुनिक शिक्षा व्यवस्था
काव्य में प्राचीन युग की गुरुभक्ति, त्याग और सेवाभाव की तुलना आज की बाज़ारवादी कोचिंग-ट्यूशन संस्कृति से की गई है। जहाँ आज शिक्षा एक व्यापार बन चुकी है, वहीं यह काव्य प्राचीन आत्मीयता और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की प्रेरणा देता है।
शिल्प पक्ष एवं भाषा-शैली
भाषा: खाँटी भोजपुरी के साथ तत्सम और देशज शब्दावली का सुंदर समन्वय है।
रस एवं अलंकार: शांत, करुण एवं वीर रस का सहज प्रवाह है। अनुप्रास, रूपक और मानवीकरण अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग दिखाई देता है।
गेयता एवं छंद: छंदबद्धता और लयात्मकता रचना को पठनीय एवं कर्णप्रिय बनाती है।
निष्कर्ष
डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ कृत ‘एकलव्य’ भोजपुरी साहित्य का एक उल्लेखनीय खंड-काव्य है। यह केवल इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि दलित विमर्श, सामाजिक समरसता और गुरु-शिष्य संबंधों का एक नया मानवीय परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है।




