महाकवि विद्यापति की रचनाओं में भोजपुरी के भाषाई तत्वों की पड़ताल, जनभाषाओं के संरक्षण पर जोर

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नेपाल के डॉ. गोपाल ठाकुर के शोधपरक आलेख में ‘कीर्तिलता’ की भाषा, अपभ्रंश और भोजपुरी के ऐतिहासिक संबंधों पर उठाए गए सवाल

भोजपुरी24 डेस्क। भोजपुरी भाषा के इतिहास, उसकी साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए महाकवि विद्यापति की रचनाएं एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकती हैं। डॉ. गोपाल ठाकुर के शोधपरक आलेख ‘वासुदेवशरण अग्रवाल की दृष्टि में विद्यापति’ में विद्यापति की चर्चित कृति ‘कीर्तिलता’ की भाषा और उसमें मौजूद भाषाई विशेषताओं के आधार पर भोजपुरी की ऐतिहासिक भूमिका पर विचार किया गया है।

लेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय भाषाओं के इतिहास को समझने के लिए केवल शास्त्रीय साहित्य ही नहीं, बल्कि लोकभाषाओं, जनपदीय बोलियों और आम लोगों की भाषाई परंपराओं का अध्ययन भी जरूरी है। लेखक का मानना है कि जनभाषाओं को हिंदी की बोलियों तक सीमित करके देखने के बजाय उनके स्वतंत्र भाषाई अस्तित्व और साहित्यिक योगदान को भी गंभीरता से समझना चाहिए।

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विद्यापति ने जनभाषा में रची ‘कीर्तिलता’

महाकवि विद्यापति संस्कृत के विद्वान थे और प्राकृत साहित्य की भी गहरी समझ रखते थे। आलेख के अनुसार, उन्होंने आम लोगों से जुड़ने के लिए अपनी चर्चित रचना ‘कीर्तिलता’ में अवहट्ठ भाषा का प्रयोग किया। लेखक बताते हैं कि विद्यापति ने अपनी रचना में लोकभाषा की सहजता और लोकप्रियता को महत्व दिया। आलेख में विद्यापति की इन पंक्तियों का उल्लेख है-

“देसिल बयना सब जन मिट्ठा।
ते तइसन जम्पउ अवहट्ठा॥”

इन पंक्तियों का आशय है कि देशी भाषा में कही गई बात सबको मधुर लगती है। इसलिए कवि ऐसी ही भाषा में अपनी रचना करना चाहते हैं। यह उदाहरण बताता है कि साहित्य को आम लोगों की भाषा से जोड़ने की परंपरा भारतीय साहित्य में काफी पुरानी रही है।

‘कीर्तिलता’ में भोजपुरी के भाषाई तत्वों पर चर्चा

डॉ. गोपाल ठाकुर अपने आलेख में ‘कीर्तिलता’ की भाषा को लेकर प्रचलित व्याख्याओं से अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। उनका तर्क है कि अवहट्ठ को केवल प्राचीन मैथिली के रूप में देखना उचित नहीं है। उनके अनुसार, इस भाषा में भोजपुरी की कई भाषाई विशेषताएं भी मौजूद हैं।

लेख में ‘दिआ’, ‘पिआ’, ‘भइआ’, ‘मइआ’, ‘बउआ’ और ‘नउआ’ जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया है। लेखक इन उदाहरणों के जरिए अवहट्ठ, भोजपुरी और मैथिली के बीच भाषाई समानताओं की ओर ध्यान दिलाते हैं। वे क्रियाओं के रूपों और शब्द निर्माण की विशेषताओं को भी इस बहस का हिस्सा बनाते हैं।

हालांकि, यह लेखक का भाषाई विश्लेषण और तर्क है। विद्यापति की भाषा को लेकर विभिन्न विद्वानों के मतों तथा भाषावैज्ञानिक शोध के आधार पर इस विषय पर आगे भी अध्ययन की जरूरत है।

वासुदेवशरण अग्रवाल के अध्ययन का महत्व

आलेख में विद्वान वासुदेवशरण अग्रवाल के ‘कीर्तिलता’ संबंधी संपादन और व्याख्या कार्य की सराहना की गई है। लेखक के अनुसार, अग्रवाल ने इस कृति के शब्दों, व्याकरणिक स्वरूप और उसमें प्रयुक्त प्राकृत, अवहट्ठ तथा अरबी-फारसी शब्दावली का विस्तार से अध्ययन किया।

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इससे ‘कीर्तिलता’ को समझने और उसके भाषाई स्वरूप की पड़ताल करने में महत्वपूर्ण मदद मिली। लेख में यह भी कहा गया है कि प्राचीन साहित्य का पुनर्पाठ करते समय पहले के संपादनों और व्याख्याओं की समीक्षा करना जरूरी है, ताकि भाषाओं के ऐतिहासिक स्वरूप को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

भोजपुरी के इतिहास को समझने के लिए जरूरी है नया शोध

डॉ. गोपाल ठाकुर का आलेख केवल विद्यापति की भाषा तक सीमित नहीं है। इसमें जनपदीय भाषाओं की पहचान, उनके ऐतिहासिक विकास और भारतीय भाषाओं के अध्ययन में लोक की भूमिका जैसे व्यापक प्रश्न भी उठाए गए हैं।

लेखक का आग्रह है कि विद्यापति के साथ पंडित दामोदर, ज्योतिरीश्वर, कबीर और तुलसीदास जैसे रचनाकारों की कृतियों का भी उनकी जनभाषाई विशेषताओं के संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

भोजपुरी के लिए यह विमर्श इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भाषा की समृद्धि केवल उसके वर्तमान साहित्य से नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक जड़ों, लोक परंपराओं, शब्द-संपदा और सांस्कृतिक योगदान से भी पहचानी जाती है।

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भोजपुरी की विरासत को सामने लाने के लिए जरूरी है कि प्राचीन ग्रंथों, लोकगीतों, पांडुलिपियों और क्षेत्रीय भाषाई परंपराओं पर अधिक शोध हो। इससे भोजपुरी के इतिहास को प्रमाणों के आधार पर समझने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।

स्रोत: डॉ. गोपाल ठाकुर का शोधपरक आलेख, ‘वासुदेवशरण अग्रवाल की दृष्टि में विद्यापति’, जिसमें विद्यापति की ‘कीर्तिलता’ और अवहट्ठ भाषा के संदर्भ में भोजपुरी के भाषाई तत्वों पर चर्चा की गई है।

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