मां कालरात्रि के रौद्र स्वरूप के जरिए नारी शक्ति, आत्मसम्मान और अन्याय के प्रतिकार का संदेश, मधुकर आनंद का संगीत
भोजपुरी24|मनोरंजन डेस्क
नई दिल्ली। नवरात्र की सप्तमी और मां कालरात्रि की आराधना के पावन अवसर पर गीतकार मनोज भावुक का नया भोजपुरी गीत ‘दुर्गा मइया से सीखऽ ना धूल चटावे के’ रिलीज हुआ है। गायिका अक्षरा सिंह की आवाज में सजे इस गीत को उनके आधिकारिक यूट्यूब चैनल ‘अक्षरा सिंह ऑफिसियल’ से जारी किया गया है। गीत को संगीतबद्ध किया है मधुकर आनंद ने।
मां दुर्गा के नौ रूपों में सातवें स्वरूप मां कालरात्रि को उनके रौद्र और दुष्टों का संहार करने वाले रूप के लिए जाना जाता है। नारी के इसी निर्भीक, शक्तिशाली और अन्याय का प्रतिकार करने वाले स्वरूप को मनोज भावुक ने अपने गीत में प्रभावशाली ढंग से उकेरा है। गीत का मूल संदेश है कि नारी केवल ममता, त्याग और धैर्य की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर अन्याय के विरुद्ध चंडी बनकर खड़ी होने वाली शक्ति भी है।
चंडी बनकर अन्याय का जवाब देने का संदेश
गीत में नारी को अपनी शक्ति पहचानने और अन्याय के सामने चुप न रहने का आह्वान किया गया है। मनोज भावुक लिखते हैं-
मर्यादा पर हाथ बढ़ावे केहू त ललकारऽ,
चंडी बन जा, खूब दहाड़ऽ, पटक-पटक के मारऽ।
मत सीखऽ खाली पूजा के थाल सजावे के,
दुर्गा मइया से सीखऽ ना… धूल चटावे के।
गीत के बोल पारंपरिक पूजा और भक्ति के भाव से आगे बढ़कर नारी के आत्मसम्मान, साहस और प्रतिरोध की बात करते हैं। मां कालरात्रि के प्रतीक के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि अन्याय के सामने झुकने के बजाय उसका विरोध करना भी जरूरी है।
अक्षरा सिंह की आवाज, मधुकर आनंद का संगीत
अक्षरा सिंह ने गीत को प्रभावशाली अंदाज में गाया है। नारी शक्ति और आत्मसम्मान का संदेश देता यह गीत उनकी आवाज में ओजपूर्ण रूप लेता है। संगीतकार मधुकर आनंद का संगीत गीत के जोशीले भाव को उभारता है।
गीत के बोल प्रभावशाली हैं, हालांकि बेहतर दृश्य-परिकल्पना और फिल्मांकन से वीडियो को और आकर्षक बनाया जा सकता था।
गीत का लिंक
सामाजिक सरोकार से जुड़ी है मनोज भावुक की लेखनी
समकालीन भोजपुरी गीतकारों में मनोज भावुक की पहचान सामाजिक मुद्दों और संवेदनशील विषयों पर लिखने वाले रचनाकार के रूप में भी है। उनकी लेखनी प्रेम और संवेदना के साथ सामाजिक विसंगतियों पर सवाल उठाती है। उनका चर्चित हिंदी गीत ‘मरे हुए एक रावण को हर साल जलाते हैं हम लोग, जिंदा रावण-कंसों से तो आँख चुराते हैं हम लोग’ सामाजिक पाखंड पर चोट करने वाली उनकी रचनात्मक दृष्टि का उदाहरण है।
हाल ही में मनोज भावुक और अक्षरा सिंह का गीत ‘बाढ़ में बिहार, छठी मइया खेवनहार’ भी चर्चा में रहा। उस गीत में आपदा से जूझते लोगों की पीड़ा, संवेदना और आस्था का स्वर था, जबकि इस नई पेशकश में नारी के आत्मसम्मान, साहस और शक्ति को केंद्र में रखा गया है।
नारी को अपनी शक्ति पहचानने का आह्वान
नवरात्र की सप्तमी पर रिलीज हुआ यह गीत मां कालरात्रि के प्रतीक के माध्यम से महिलाओं के भीतर मौजूद साहस और प्रतिरोध की भावना को सामने लाता है। गीत का संदेश है कि नारी के सम्मान और मर्यादा पर आंच आने पर जरूरत के अनुसार दृढ़ता से खड़ा होना जरूरी है।
मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश देने की कोशिश के रूप में इस गीत को देखा जा सकता है। गीत का प्रभाव श्रोताओं की प्रतिक्रिया से स्पष्ट होगा, लेकिन इसके बोल नारी के आत्मसम्मान और अन्याय के विरोध जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को जरूर उठाते हैं।




