भोजपुरी सिनेमा की सबसे बड़ी समस्या उसकी ‘गंदी इमेज’

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मुंबई/पटना: भोजपुरी सिनेमा कभी अपनी सादगी, लोकजीवन और पारिवारिक मूल्यों के लिए जाना जाता था। गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो (1963) जैसी फिल्मों ने इस इंडस्ट्री को एक मजबूत पहचान दी थी। लेकिन आज वही भोजपुरी सिनेमा अक्सर अश्लीलता, कमजोर कथानक और सीमित दर्शक वर्ग के कारण आलोचनाओं के घेरे में है। सवाल यह है कि आखिर इतनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाली इंडस्ट्री पिछड़ क्यों रही है?

स्वर्णिम दौर से गिरावट तक की कहानी
भोजपुरी सिनेमा का आरंभ 1960 के दशक में हुआ, जब पहली फिल्म गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो ने अपार सफलता हासिल की। इसके बाद बिदेसिया, लागी नहीं छूटे राम जैसी फिल्मों ने सामाजिक मुद्दों, प्रवासी जीवन और पारिवारिक रिश्तों को सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया। इन फिल्मों में लोकगीत, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ का संतुलन था। यही कारण था कि बिहार-पूर्वांचल के अलावा भी इन फिल्मों को सराहा गया।
लेकिन 1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण और सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के पतन के साथ भोजपुरी सिनेमा भी कमजोर होने लगा। 2000 के दशक में जरूर एक पुनर्जागरण हुआ रवि किशन, मनोज तिवारी, निरहुआ जैसे कलाकारों ने इंडस्ट्री को फिर से खड़ा किया। फिर भी यह पुनर्जागरण स्थायी नहीं बन सका, क्योंकि कंटेंट की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आती गई।

कमजोर कंटेंट और अश्लीलता की छवि
आज भोजपुरी सिनेमा की सबसे बड़ी समस्या उसकी इमेज बन चुकी है। बड़ी संख्या में फिल्मों में दोहरे अर्थ वाले संवाद, अनावश्यक आइटम गीत और सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश दिखाई देती है। यह प्रवृत्ति केवल दर्शकों को आकर्षित करने की कोशिश नहीं, बल्कि एक शॉर्टकट मॉडल बन चुकी है कम बजट में जल्दी कमाई। परिणाम यह हुआ कि पारिवारिक दर्शक वर्ग धीरे-धीरे दूर हो गया, शिक्षित और शहरी दर्शक भोजपुरी फिल्मों को देखने से कतराने लगे,इंडस्ट्री की विश्वसनीयता कम हो गई और यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि दक्षिण भारतीय सिनेमा (तमिल, तेलुगु) ने भी व्यावसायिक फिल्मों का रास्ता अपनाया, लेकिन उन्होंने कंटेंट और तकनीक के स्तर को बनाए रखा। भोजपुरी सिनेमा इस संतुलन को नहीं साध पाया।

सीमित बजट, तकनीकी पिछड़ापन और निवेश की कमी
भोजपुरी फिल्मों का औसत बजट आज भी 1 से 5 करोड़ रुपये के बीच रहता है, जबकि अन्य क्षेत्रीय उद्योग (जैसे तेलुगु, कन्नड़) 20-100 करोड़ तक निवेश कर रहे हैं। कम बजट का सीधा असर फिल्म की गुणवत्ता पर पड़ता है-
कमजोर सिनेमेटोग्राफी
सीमित लोकेशन
साधारण VFX और एडिटिंग
नए प्रयोगों की कमी
इसके अलावा, बड़े प्रोडक्शन हाउस और कॉर्पोरेट निवेश भोजपुरी सिनेमा में बहुत कम हैं। OTT प्लेटफॉर्म्स पर भी भोजपुरी कंटेंट को उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती, जितनी अन्य भाषाओं को। तकनीकी रूप से पिछड़ने का मतलब है कि युवा दर्शक, जो अब हाई-क्वालिटी कंटेंट का आदी हो चुका है, वह भोजपुरी फिल्मों से जुड़ नहीं पाता।

दर्शक, बाजार और रणनीति की समस्या
भोजपुरी सिनेमा का मुख्य दर्शक वर्ग आज भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक सीमित है। जबकि सच्चाई यह है कि लगभग 20 करोड़ से अधिक लोग भोजपुरी समझते या बोलते हैंभारत के अलावा नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और खाड़ी देशों में भी। फिर भी इंडस्ट्री इस वैश्विक दर्शक वर्ग तक पहुंचने में असफल रही है। इसके कारण हैं:-
मार्केटिंग और ब्रांडिंग की कमी
सबटाइटल और इंटरनेशनल रिलीज़ का अभाव
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का सीमित उपयोग
इसके उलट, मलयालम और तमिल सिनेमा ने अपने कंटेंट को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया है, जिससे उनकी पहचान और बाजार दोनों बढ़े हैं। भोजपुरी इंडस्ट्री अभी भी लोकल मार्केट तक सीमित सोच में फंसी हुई है।

समाधान क्या है?
भोजपुरी सिनेमा की गिरावट केवल एक कारण से नहीं, बल्कि कई संरचनात्मक समस्याओं का परिणाम है कमजोर कंटेंट, सीमित निवेश, खराब इमेज और रणनीतिक दृष्टि की कमी। लेकिन संभावनाएं आज भी बहुत बड़ी हैं। अगर इंडस्ट्री कुछ ठोस कदम उठाए, तो यह फिर से अपनी पहचान बना सकती है:
कहानी और स्क्रिप्ट पर ध्यान, लोकजीवन और आधुनिक मुद्दों का संतुलन, तकनीकी निवेश बढ़ाना, बेहतर कैमरा, एडिटिंग और VFX के साथ OTT और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का उपयोग, अश्लीलता से दूरी और पारिवारिक कंटेंट की वापसी, ग्लोबल ऑडियंस को टारगेट करना आदि है
भोजपुरी अंदाज में कहें तो भोजपुरी सिनेमा के असली ताकत ओकर माटी में बा, बस जरूरत बा कि हम ओह ताकत के सही दिशा में ले जाईं।

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