समीक्षक: सुनील कुमार पाठक
समकालीन भोजपुरी कविता में युवा कवियों की धमक अब साफ-साफ सुनाई दे रहल बा। श्री कृष्णा जी पांडेय, अरक-बिचला टोला (बक्सर) के एगो अइसन होनहार कवि बाड़न, जिनकर कविता में लोक के रमणीय बहुविध सौंदर्य, समकालीनता के सम्यक बोध, कथन में खास ताजगी आ मौलिकता तथा शैली में भोजपुरिहा मस्ती से सूनाइल एगो सहज-अक्खड़पन देखे के मिलेला।
कवि के पहिला कविता-संग्रह चिंउटी के मान में कुल 68 कविताएँ शामिल बाड़ीं। पहिल बेर संग्रह खोलके पन्ना पलटत एगो छोटहन कविता ‘बे मरदे’ पर नजर टिक गइल-
“बे मरदे
चास दऽ दोखार दऽ
हर त बड़ले बा
ना होखे त उखाड़ दऽ…”
‘बे मरदे’ एगो अइसन अनगढ़ संबोधन हऽ, जवना के नकार में भी एगो खास किसिम के अपनापन भरल बा। एह लघु कविता में जवना तरह के मारक संवादधर्मिता आ व्यंग्य के नुकीलापन बा, ऊ अपना अभिधात्मकता में भोजपुरिहा माटी-पानी के एगो विशिष्ट बानगी सामने रखेला।
कवि बिना लाग-लपेट के समाज के ओह मनोवृत्ति पर चोट करेलन, जहाँ लोग ‘गझिन-फाँफर’, ‘नीक-जाबून’ आ ‘नाफा-नुकसान’ सोचत-सोचत साँच के आँच से दूर हो जात बा। कविता में व्यंग्य के साथ-साथ भोजपुरिहा समाज के एगो खास खुराफाती स्वभाव पर भी तंज बा-खुद पीछे रहके दोसरा के ललकारे के प्रवृत्ति।
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‘खाली दोसरा के ललकार दऽ’-एह पाँति में उकसावे, जिम्मेदारी से बचला आ दूसरन के आगे धकेले के पूरा मनोविज्ञान समाइल बा। अइसन बेधकता संग्रह के कई कवितन में दिखाई देला आ एहसे एह कविता-संसार में भोजपुरिहा माटी के खास पहचान बनल रहेला।
एही क्रम में कविता ‘पता’ भी विशेष रूप से ध्यान खींचेला-
“जिनिगी
बीतल
ओही ठइयाँ
जहाँ जानत सभे रहे
बाकी चीन्हत
कुछुए लो रहे।”
‘जानत’ आ ‘चीन्हत’—बस दूगो शब्दन के अंतर पर टिकल ई कविता आधुनिक मनुष्य के अजनबीपन के एगो गहिर चित्र खींच देला। केहू के बारे में सुनके ओकरा के ‘जानल’ जा सकेला, बाकिर कवनो मनई, चीज-बतूस भा परिस्थिति के सही मायने में ‘चीन्हल’ आज के समय में कठिन होत जा रहल बा।
कवि के मलाल इहे बा कि आज के मनई के जवना जगह पर पूरा जिनिगी बीत जात बा, ओही जगह के लोग ओकरा के बस एतने भर जानेला कि-‘नाँव त सुनल लागत बा, बाकिर भेंट-मुलाकात ना ह कबो के।’ आधुनिक जीवन में बढ़त ई अजनबीपन मनुष्यता के सामने खड़ा एगो गंभीर संकट हऽ। कविता के खूबसूरती ई बा कि कवि बिना भारी-भरकम शब्दावली के महज कुछ पाँतियन में एगो बड़हन सामाजिक सच्चाई कह देत बाड़न।
चिंउटी के मान के सबसे उल्लेखनीय विशेषता एकर छोट-छोट कवितन में समाइल सहज-स्वाभाविक गँवई अंदाज बा। कवि के भाषा में बनावटीपन नइखे। भोजपुरिहा जीवन के बोलचाल, मुहावरा, व्यंग्य, ठिठोली आ अक्खड़पन मिलके कविता के एगो अलग पहचान देत बा। ई सहजता कविता के कमजोर ना, बल्कि ओकर ताकत बनके सामने आवेला।
कवि के दृष्टि लोक से जुड़ल बा, लेकिन उनका कविता खाली लोक-चित्रण तक सीमित नइखे रहत। समकालीन समाज, मनुष्य के बदलत संबंध, सामाजिक विडंबना आ आज के जीवन के अजनबीपन पर भी कवि लगातार नजर रखले बाड़न। एह अर्थ में चिउँटी के मान लोक आ समकालीनता के बीच एगो सुंदर सेतु बनके उभरत बा।
संग्रह के भूमिका डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी बढ़िया लिखले बाड़न, जे संग्रह के कविता-दृष्टि आ कवि के रचनात्मक जमीन के समझे में मदद करेला।
श्री कृष्णा जी पांडेय भारत सरकार के राजभाषा विभाग से जुड़ल बाड़न आ ‘आखर’ से भी इनकर सक्रिय जुड़ाव रहल बा। व्यापक समझ, धारदार सोच आ भोजपुरी माटी से गहिर जुड़ाव वाला एगो प्रतिभाशाली युवा कवि के रूप में चिंउटी के मान इनकर रचनात्मक संभावना के मजबूत संकेत देत बा।
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समकालीन भोजपुरी कविता के परिदृश्य में ई संग्रह एक अइसन युवा आवाज के परिचय करावेला, जे लोक के भाषा में लोक से आगे के सवाल पूछे के हिम्मत रखेला।
पुस्तक: चिंउटी के मान
कवि: श्री कृष्णा जी पांडेय
प्रकाशक: भोजपुरी प्रकाशन, सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
पृष्ठ: 68 कविताएँ




