डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
गीत भारतीय काव्य-परंपरा की सर्वाधिक प्राचीन और लोकप्रिय विधाओं में से एक है। मनुष्य के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, प्रेम-विरह, आशा-निराशा और लोक की सबसे सहज अभिव्यक्ति गीत में ही प्रस्तुत होती है। गीत की मूल शक्ति उसकी गेयता, लयात्मकता और भाव-सघनता में निहित है। निश्चय ही भारतीय काव्यधारा में समय-समय पर गीत के अपने रूप, भाषा और कथ्य में परिवर्तन होते गए हैं, परंतु उसकी मूल संवेदना में कभी कमी नहीं आई।
भक्तिकाल के ‘पद’ से विकसित होते हुए ‘गीत’ अब ‘नवगीत’ तक पहुँच चुका है। वस्तुतः नवगीत, गीत से अलग कोई स्वतंत्र विधा नहीं है, बल्कि वह भी नई कविता की तरह बदलते समय, परिवर्तित सामाजिक यथार्थ और आधुनिक मनुष्य के जटिल अनुभवों के अनुरूप गीत का ही विकसित रूप है। जैसे कविता विभिन्न प्रयोगों से गुजरते हुए नई कविता के नवीन रूप तक आ पहुँची है, वैसे ही गीत भी नवगीत का नवीन रूप धारण करने में पीछे नहीं रहे।
नवगीत ने गीत की रागात्मकता, लय और संक्षिप्त अभिव्यक्ति को अपने भीतर सुरक्षित रखते हुए उसमें युगबोध, सामाजिक चेतना, लोकजीवन, विसंगतियों की पहचान तथा जीवन-संघर्ष की नई संवेदनाओं का समावेश किया। इस प्रकार, नवगीत ने गीत की परंपरा का निषेध नहीं किया, बल्कि उसे जीवन के नवीन अनुभवों से समृद्ध करते हुए और विस्तार दिया।
नवगीत की सशक्त उपस्थिति हिंदी के साथ-साथ हिंदी क्षेत्र की क्षेत्रीय भाषाओं में भी देखी जा सकती है। विशेषतः भोजपुरी भाषा के नवगीतों में लोक-संवेदना, ग्रामीण जीवन, श्रम-संस्कृति और बदलते सामाजिक संबंधों के साथ ही समकालीन यथार्थ को सहज ही देखा जा सकता है।
भगवती प्रसाद द्विवेदी का नाम उन गीतकारों में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है, जिन्होंने हिंदी और भोजपुरी—दोनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ सृजन किया है। कथा-साहित्य और बाल-साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाने के साथ-साथ उनका गीतकार रूप भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। गीत, नवगीत, ग़ज़ल तथा मुक्तछंद-मुक्तक काव्य की लगभग सभी विधाओं में उन्होंने सशक्त लेखन किया है।
हिंदी के साथ-साथ भोजपुरी में भी उन्होंने उल्लेखनीय गीतों और नवगीतों की रचना की है। हिंदी में उनका प्रतिनिधि संग्रह ‘रोशनियों के मोती’ तथा भोजपुरी में ‘जौ-जौ आगर’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

द्विवेदी जी के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भाषा बदलने पर भी उनकी रचनात्मक दृष्टि नहीं बदलती। हिंदी और भोजपुरी—दोनों भाषाओं के गीतों में कवि समान रूप से आम आदमी की पीड़ा, राजनीतिक विडंबनाओं, बाजारवाद, लोक-संस्कृति और मानवता का हिमायती है।
समकालीन जीवन और सामाजिक यथार्थ
भगवती प्रसाद द्विवेदी के गीतों में यथार्थ का केवल चित्रण ही नहीं मिलता, बल्कि उसके भीतर की पीड़ा, विडंबना और संघर्ष भी साफ-साफ दिखाई पड़ता है। उनके यहाँ सामाजिक यथार्थ किसी वैचारिक घोषणा का परिणाम नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से उपजा हुआ सत्य है। यही कारण है कि उनके गीतों में सामान्य मनुष्य, उसकी असुरक्षा, उसकी विवशता और उसके संघर्ष अत्यंत विश्वसनीय रूप में उपस्थित होते हैं।
गीतकार उस व्यक्ति की त्रासदी को पहचानता है, जो पूरी व्यवस्था का भार उठाता है, किंतु स्वयं सम्मानजनक जीवन से वंचित रहता है। ‘संजैया’ गीत में एक चपरासी का जीवन केवल कार्यालय तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि उसकी पूरी मानसिक दुनिया पर अधिकारी का वर्चस्व स्थापित हो जाता है—
घर में घरनी से
साहब की
ही बातें करता,
सपनों में
साहब को जीता
रोज-रोज मरता,
खूँटे में
साहब के
बँधी हुई जैसे गैया!
यहाँ ‘गैया’ के बिंब में दासता के साथ ही मनुष्य की आत्महीनता का भी अनुभव किया जा सकता है।
इसी प्रकार ‘गाँव-गीत’ में आधुनिक विकास के नाम पर गाँवों की आत्मा के नष्ट होने का गहरा दर्द देखा जा सकता है-
कहाँ गई, कहाँ खो गया अपना गाँव?
माटी की सारी पहचानों को निगल गए
बेजान पक्के मकान।
अपने हैं लोग,
मगर अपनापन शेष नहीं,
रिसते हैं रिश्तों के घाव।
यह यथार्थ केवल भौतिक परिवर्तन का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विघटन का भी दस्तावेज है।
भोजपुरी गीतों में यह सामाजिक यथार्थ और अधिक तीखे तथा लोकानुभव से जुड़े रूप में सामने आता है। यहाँ कवि गाँव के साधारण मनुष्य की पीड़ा, शोषण और संघर्ष को उसी की भाषा में व्यक्त करता है। ‘जुलुमी बेयरिया’, ‘जोत ना बुताई’ आदि गीतों में विपन्न जीवन की यातना के साथ-साथ अदम्य जिजीविषा के भी दर्शन होते हैं।
‘सिरिजन के गीत’ में कवि प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी सृजन और जीवन के पक्ष में अपनी अटूट आस्था व्यक्त करता है—
सउँसे जमीन बंजर करबऽ
तबहूँ बीया अँखुआत रही
सिरिजन के गीत लिखात रही।
यहाँ ‘बीया अँखुआत रही’ केवल कृषि का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य की अजेय जीवन-शक्ति का प्रतीक है।
इसी प्रकार ‘बाबूजी कहवाँ जइहन’ में पारिवारिक आत्मीयता के टूटते संसार का अत्यंत मार्मिक चित्र उपस्थित हुआ है।
राजनीतिक यथार्थ बनाम विद्रूपता
समकालीन राजनीति और शासन-व्यवस्था का निर्भीक उद्घाटन भगवती प्रसाद द्विवेदी के गीतों का एक अत्यंत सशक्त पक्ष है। उनके यहाँ सत्ता-विरोध किसी दल-विशेष का विरोध नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों का विरोध है, जिनके कारण न्याय, नैतिकता और जनविश्वास आज संकट में है।
गीतकार ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर पनप रही राजनीतिक विकृतियों और प्रशासनिक दोहरेपन पर अत्यंत तीखा व्यंग्य किया है। सत्ता का अपराधियों से गठजोड़, ईमानदार व्यक्ति की उपेक्षा तथा नैतिक मूल्यों का ह्रास उनकी चिंता का प्रमुख विषय है। ‘हँसी आपकी’ गीत में नेताओं की बनावटी मुस्कान के पीछे छिपे क्रूर चरित्र का अत्यंत प्रभावशाली चित्र देखते ही बनता है-
हर मुजरिम को पदक दिलाते
सच को सूली पर लटकाते
शातिर मुस्कानों से सहमा-
सहमा महानगर लगता है।
यहाँ ‘शातिर मुस्कान’ केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरी राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक है, जिसमें अपराध सम्मानित और सत्य दंडित होता है।
इसी प्रकार ‘साहब जी’ गीत में प्रशासनिक व्यवस्था की सामंती मानसिकता का मार्मिक चित्रण मिलता है-
उनके आने से
आँखों में
चुभता सन्नाटा,
बोलें तो
लगता जैसे
कुत्ते ने हो काटा,
लोकतंत्र में जहाँ प्रशासन जनसेवा का माध्यम होना चाहिए, वहीं वह आम नागरिक के लिए आतंक का कारण बन गया है। कवि इस विडंबना को अत्यंत संयत किंतु तीक्ष्ण व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त करता है।
यही राजनीतिक चेतना भोजपुरी गीतों में और अधिक लोकधर्मी तथा व्यंग्यात्मक रूप धारण कर लेती है। भोजपुरी की सहज, मारक और मुहावरेदार भाषा कवि को ऐसी अभिव्यक्ति देती है, जो सीधे जनमानस तक पहुँचती है।
‘धिरकान-गान’ में राजनीति के अपराधीकरण पर तीखा प्रहार करते हुए कवि लिखता है-
कर में कट्टा, मुख में राम-
जै सियराम! जै सियराम!!
एक ही पंक्ति में धर्म और हिंसा के पाखंडी गठजोड़ का जितना प्रभावशाली उद्घाटन हुआ है, वह समकालीन राजनीति की पूरी विडंबना को उद्घाटित कर देता है।
आगे वही गीत सफेदपोश नेताओं के चरित्र को बेनकाब करता है-
अनगिन कतलन के आरोपी,
धप्-धप् काया, उज्जर टोपी।
कर्त्ता करिया करतूतन के,
क्राइम के फाइल का तोपी।
बड़मुँहवन से दुआ-सलाम,
जै सियराम! जै सियराम!!
लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण और गांधीवादी आदर्शों की उपेक्षा पर कवि का आक्रोश ‘बापू के बानर’ में मुखर हो उठता है-
कान खात रहलन फरियादी,
कान काटि लिहलस।
हाँफि रहल इंसाफ,
फँफेली ओकर धइलस ऊ!
और अंततः वह स्पष्ट घोषणा करता है-
लोकतंत्र में, बापू!
अइसन बानर ना चाहीं।
ई त जनते के मारत बा,
ढाही-पर-ढाही;
बाँचे ना दी आदमियत के,
गाँधी-दर्शन के…
यहाँ ‘बापू के बानर’ को गांधीजी के उन प्रतीकों का विडंबनात्मक पुनर्पाठ कहा जा सकता है, जिन्हें आधुनिक राजनीति ने अपने स्वार्थ के लिए विकृत कर दिया है।
बाज़ारवाद, आर्थिक उदारीकरण और मानवीय मूल्यों का संकट
आज बाजार धीरे-धीरे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है। परिणामस्वरूप मनुष्य स्वयं एक उपभोक्ता अथवा वस्तु में बदलता जा रहा है और आत्मीय संबंध उपयोगितावादी मानसिकता के शिकार हो रहे हैं। भगवती प्रसाद द्विवेदी इस परिवर्तन को केवल आर्थिक परिघटना के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे मानवीय मूल्यों के संकट के रूप में रेखांकित करते हैं।
‘स्वागत-गान’ में विदेशी निवेश के नाम पर राष्ट्रीय अस्मिता और जनहित की उपेक्षा पर उनकी गहरी चिंता का अनुभव किया जा सकता है-
देश हमारा दासों का,
आम का नहीं, खासों का।
मिले विदेशी अर्थ तो हम दें,
टीप गला विश्वासों का।
‘टीप गला विश्वासों का’ जैसी अभिव्यक्ति बताती है कि आर्थिक लाभ की लालसा में समाज अपने नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का गला स्वयं घोंट रहा है। इसी प्रकार उनके अनेक गीतों में आधुनिक उपभोक्तावादी जीवन के कारण मनुष्यों के बीच बढ़ती दूरियों और संबंधों की कृत्रिमता का मार्मिक चित्रण मिलता है।
भोजपुरी गीतों में यही संकट अधिक मूर्त और लोकजीवन से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। गाँव, परिवार और आत्मीयता के बीच जब बाज़ार प्रवेश करता है तो उसका सबसे पहला आघात संबंधों पर पड़ता है। ‘घर में बाजार’ गीत में कवि अत्यंत मार्मिक ढंग से लिखता है-
पइसल बा घर में बाजार,
देखऽ तेल, तेल के धार!
नाता-नेह रसातल में,
परल अफदरा पाँतर में।
लोकजीवन, ग्राम्य चेतना और सांस्कृतिक स्मृति
भगवती प्रसाद द्विवेदी के लिए गाँव केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि मनुष्य की स्मृतियों, संस्कारों, पारिवारिक आत्मीयता और सामुदायिक जीवन का आधार है। आधुनिकता, नगरीकरण और बाज़ारवादी संस्कृति के दबाव में जब यह लोक-संसार धीरे-धीरे विघटित होता है, तब कवि की संवेदना सहज ही व्यथित हो उठती है।
गीतकार अपने गीतों में बार-बार गाँव की ओर लौटता है। यह लौटना किसी प्रकार का अतीतमोह नहीं, बल्कि उस जीवन-मूल्य की खोज है, जो आधुनिक सभ्यता की आपाधापी में छूटता जा रहा है। ‘गाँव-गीत’ में कवि का प्रश्न केवल एक गाँव के लुप्त होने का नहीं, बल्कि भारतीय लोक-संस्कृति के विघटन का प्रश्न है-
कहाँ खो गया अपना गाँव?
कहाँ गयी
कान्हा और गोपियों की छेड़छाड़,
कहाँ गयी वंशी की तान?
माटी की
सारी पहचानों को निगल गये
बेजान पक्के मकान।
यहाँ ‘कान्हा’, ‘गोपियाँ’ और ‘वंशी’ पौराणिक प्रतीकों के साथ ही भारतीय लोक-संस्कृति की जीवंत परंपरा के प्रतिनिधि हैं। इसी प्रकार ‘माटी की पहचान’ का लोप केवल प्राकृतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विस्मृति का संकेत है।
हिंदी गीतों में अभिव्यक्त लोक का स्मृति-बोध भोजपुरी गीतों में अपने पूरे जीवन-स्पंदन के साथ उपस्थित है। यहाँ लोक बाहर से देखा हुआ विषय नहीं, बल्कि कवि का अपना अनुभव-संसार है। ‘भोजपुरी माटी’ गीत में कवि अपनी जन्मभूमि के प्रति गर्व व्यक्त करते हुए उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और नैतिक गरिमा का स्मरण करता है। भोजपुरी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति है।
लाग-लपेट बिना, खाँटी
इहवाँ के परिपाटी हऽ।
सोन्ह-मीठ गुड़वा जइसन
ई भोजपुरी माटी हऽ।
इसी प्रकार उनके गीतों में चौपाल, कउड़ा (अलाव), खोंता (घोंसला), चइता, फगुआ, बंसी की तान, खेत-खलिहान और ऋतु-परिवर्तन के अनेक बिंब स्वाभाविक रूप से आते हैं। ये बिंब किसी कृत्रिम लोक-रंग के लिए नहीं, बल्कि लोकजीवन की वास्तविक संरचना को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
संघर्ष और जिजीविषा
भगवती प्रसाद द्विवेदी केवल युगीन विसंगतियों का चित्रण करके नहीं रुकते, बल्कि उन परिस्थितियों में भी मनुष्य की अदम्य जिजीविषा, संघर्षशीलता और भविष्य के प्रति आस्था को प्रतिष्ठित करते हैं। गीतकार संघर्ष को जीवन का स्वाभाविक धर्म मानता है। वह पलायन का नहीं, बल्कि परिस्थितियों का सामना करने का आह्वान करता है। ‘जंग आर-पार की’ इसी संघर्षशील चेतना का घोष है-
ज़िन्दगी क्यों जल रही,
रेत-सी फिसल रही,
चोट कर लुहार की,
जंग आर-पार की।
भोजपुरी गीतों में यही जीवनधर्मिता और भी अधिक आत्मीय तथा लोकानुभव से जुड़ी हुई दिखाई देती है। किसान, मजदूर, गरीब और अभावग्रस्त मनुष्य कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन का दामन नहीं छोड़ता।
‘सिरिजन के गीत’ में कवि की समूची जीवन-दृष्टि व्यक्त हो जाती है-
तूँ कतनो हाथ कलम करबऽ,
जिनिगी में काँट-कूस भरबऽ।
सउँसे जमीन बंजर करबऽ,
तबहूँ बीया अँखुआत रही।
सिरिजन के गीत लिखात रही।
बाकिर अँखिया सपनात रही,
सिरिजन के गीत लिखात रही।
प्रतिकूल परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठोर हों, सृजन की प्रक्रिया रुकती नहीं। बीज का अंकुरित होना मनुष्य की अजेय जीवन-शक्ति का रूपक बन जाता है।
मानवीय संवेदना और आत्मीय संबंधों की ऊष्मा
भगवती प्रसाद द्विवेदी के गीतों का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है—गहन मानवीय संवेदना। उनके गीतों में भले ही सामाजिक विसंगतियाँ, राजनीतिक विडंबनाएँ और आर्थिक असमानताएँ प्रमुखता से उपस्थित हैं, फिर भी वहाँ मनुष्य के भीतर बची हुई करुणा, आत्मीयता और प्रेम के साथ ही पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा को भी समान महत्त्व प्राप्त होता है।
उनके गीतों में प्रेम केवल प्रणय का विषय नहीं है, बल्कि जीवन की सृजनात्मक ऊर्जा का आधार है। वर्तमान में, जब सामाजिक जीवन में संवेदनहीनता बढ़ने लगी है, गीतकार प्रेम को मनुष्य की मूल प्रकृति के रूप में प्रतिष्ठित करता है। ‘भीतर बहती नदी’ और ‘स्पंदन’ में प्रेम की रागात्मकता अत्यंत कलात्मक ढंग से व्यक्त हुई है-
झुकी डाल-सी
पुष्पलदी हो तुम।
चंदन की वीणा है
देह यह तुम्हारी।
अंग-अंग खिलते कचनार,
इसी प्रकार ‘ब्याही बिटिया की पाती’ में एक निर्धन पिता की करुणा, विवशता और बेटी के प्रति उसके अथाह स्नेह की मार्मिक अभिव्यक्ति दर्शनीय है-
पोसा था
बछिया को
बड़े जतन से औ’ मन से,
राजकुमार
खरीदा था
खुद भिखमंगा बन के,
भभक रही
दियना-बाती
जलते ही सँझवाती।
भोजपुरी गीतों में मानवीय संवेदना और भी अधिक आत्मीय तथा लोकजीवन से जुड़ी हुई दिखाई देती है। यहाँ परिवार, स्मृति और अपनापन जीवन के मूल मूल्य हैं। इन संबंधों के टूटने की पीड़ा कवि को बार-बार व्यथित करती है। ‘बाबूजी कहवाँ जइहन’ गीत में पिता की अनुपस्थिति को कवि किसी विलाप के रूप में नहीं, बल्कि घर के सूने पड़ जाने की अनुभूति के रूप में व्यक्त करता है-
खूँटी पर कुरता-धोती,
चश्मा, कलम, छड़ी, पोथी।
उन्हुके पसन सभे जगहा,
हंस चुगे जइसे मोती।
चिरई उड़ल, चहक बाकी,
फूल लोढ़ात, महक बाकी।
भाषा, शिल्प और अभिव्यक्ति-कौशल
भगवती प्रसाद द्विवेदी के गीतों की प्रभावशीलता का आधार केवल उनका कथ्य नहीं है, बल्कि उतना ही उनका भाषा-विधान और शिल्प-सौष्ठव भी है। वे उन विरल गीतकारों में हैं, जिनके यहाँ भाषा भावों की अनुगामिनी न होकर उनकी सह-रचयिता बन जाती है। हिंदी और भोजपुरी दोनों भाषाओं पर वे समान अधिकार रखते हैं। दोनों ही भाषाओं में उनकी अभिव्यक्ति स्वाभाविक, सजीव और संप्रेषणीय बन पड़ी है। भाषा, छंद, लय, बिंब, प्रतीक और लोक-प्रयोग—इन सभी स्तरों पर उनका गीत-संसार अपनी एक विशिष्ट पहचान तैयार करता है।
द्विवेदी जी के हिंदी गीतों की भाषा खड़ी बोली की मानक अभिव्यक्ति होते हुए भी कृत्रिम नहीं है। उसमें लोकभाषाओं, विशेषतः भोजपुरी की सहज ऊष्मा और मुहावरेदारी का सुंदर समावेश है। साहित्यिक गरिमा के साथ ही उनकी भाषा सामान्य पाठक के अनुभव-जगत से भी सीधा संवाद स्थापित करती है। उनके गीतों में छोटे-छोटे पदबंध, संक्षिप्त वाक्य-रचना तथा लयात्मक पुनरावृत्ति कथ्य को अत्यंत प्रभावशाली बना देती है। उदाहरण के लिए, ‘जंग आर-पार की’ गीत का एक अंश दर्शनीय है-
चोट सौ सुनार की,
एक बस लुहार की
*
चोट कर लुहार की
जंग आर-पार की।
यहाँ ध्वन्यात्मकता, लय और पुनरावृत्ति गीत के संघर्षशील भाव को और अधिक तीव्र बना देती है। इसी प्रकार ‘कौड़ी का तीन’ जैसे गीतों में लोकजीवन से जुड़े मुहावरों के सहज प्रयोग देखे जा सकते हैं-
गाँव-शहर में है कौड़ी का तीन हुआ होरी।
अबरा की जोरू, धनिया है सबकी भौजाई।
यहाँ ‘होरी’ और ‘धनिया’ जैसे पात्र प्रेमचंद के गोदान से निकलकर भारतीय ग्रामीण समाज के प्रतिनिधि बन गए हैं।
यदि द्विवेदी जी के हिंदी गीतों की भाषा में साहित्यिक संतुलन है, तो भोजपुरी गीतों की भाषा में लोकजीवन की धड़कन सुनाई देती है। द्विवेदी जी भोजपुरी की उस स्वाभाविक, प्रांजल और मुहावरेदार भाषा का प्रयोग करते हैं, जो गाँवों की चौपाल, खेत-खलिहानों और सामान्य जन-जीवन में बोली जाती है। वे कृत्रिम साहित्यिक भोजपुरी का सहारा नहीं लेते, बल्कि लोक की जीवित भाषा को ही काव्य की भाषा बना देते हैं।
उनके गीतों में ‘बुतरू’, ‘खोंता’, ‘कउड़ा’, ‘रँगबाजन’, ‘धोबियापाट’, ‘अनसाई’, ‘सुबहित’, ‘चिरकुटन’, ‘अकसरुवा’ जैसे शब्द केवल शब्द नहीं हैं; वे पूरे लोक-संसार को अपने साथ लेकर आते हैं। इन शब्दों के प्रयोग से गीतों में माटी की सोंधी गंध और लोकजीवन की आत्मीयता स्वतः उपस्थित हो जाती है।
भोजपुरी गीतों का शिल्प भी अत्यंत सधा हुआ है। लोकगीतों की लय, टेक की पुनरावृत्ति, संक्षिप्त पद-रचना तथा सशक्त प्रतीकों का प्रयोग उन्हें विशिष्ट बनाता है। इसी प्रकार ‘कर में कट्टा, मुख में राम’ अथवा ‘उज्जर टोपी, करिया करतूत’ जैसे पदबंध भोजपुरी की व्यंग्यात्मक शक्ति के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। बहुत कम शब्दों में इतनी तीखी सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी करना द्विवेदी जी की विशिष्ट अभिव्यक्ति-कौशल का परिचायक है।
बिंब, प्रतीक और व्यंग्य
द्विवेदी जी की दोनों भाषाओं के गीतों में बिंब और प्रतीक कथ्य के अनुकूल स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं। ‘बेजान पक्के मकान’, ‘भीतर बहती नदी’, ‘बीया अँखुआत रही’, ‘बापू के बानर’, ‘शातिर मुस्कान’, ‘घर में बाजार’ और ‘उज्जर टोपी’ जैसे अनेक बिंब और प्रतीक उनके गीतों को अर्थगर्भित बनाते हैं। उनके गीतों में अभिव्यक्त व्यंग्य कभी आरोपित न होकर संवेदना से उपजता है। इसलिए उसमें कटुता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा स्पष्ट दिखती है।
रचनात्मक वैशिष्ट्य
भगवती प्रसाद द्विवेदी समकालीन यथार्थ के सजग कवि हैं। उन्होंने राजनीति, प्रशासन, बाजारवाद, वैश्वीकरण, टूटते पारिवारिक संबंध, ग्रामीण जीवन का विघटन तथा सामाजिक विषमता जैसे प्रश्नों को दोनों भाषाओं में समान निर्भीकता से उठाया है। उनके गीत युग की विसंगतियों का केवल विवरण नहीं देते, बल्कि उनके कारणों की पहचान करते हुए पाठक को सोचने के लिए विवश करते हैं।
उनके हिंदी गीतों में लोक की संस्कृति स्मृति, प्रतीक और सांस्कृतिक बोध के रूप में उपस्थित होती है, जबकि भोजपुरी गीतों में वही लोक अपने संपूर्ण जीवन-स्पंदन के साथ बोलता है। इस प्रकार दोनों भाषाएँ मिलकर उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को व्यापक भारतीय लोक-संस्कृति से जोड़ देती हैं। वे जहाँ अन्याय पर तीखा व्यंग्य करते हैं, वहीं प्रेम, आत्मीयता, परिवार और मानवीय संबंधों की गरिमा को भी बराबर प्रतिष्ठित करते हैं। यही संतुलन उनके गीतों को केवल वैचारिक कविता बनने से बचाता है।
विपरीत परिस्थितियों में भी उनका कवि निराश नहीं होता। वह संघर्ष को जीवन का स्वाभाविक धर्म मानता है। ‘जंग आर-पार की’ और ‘सिरिजन के गीत’ जैसी रचनाएँ इसी अटूट जीवन-विश्वास की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। एक ओर वे संघर्ष का आह्वान करती हैं, तो दूसरी ओर नवसृजन की संभावनाओं को भी जीवित रखती हैं।
भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी द्विवेदी जी अत्यंत सिद्धहस्त गीतकार हैं। हिंदी में उनकी भाषा साहित्यिक गरिमा, प्रतीकात्मकता और व्यंजना से समृद्ध है, जबकि भोजपुरी में वही भाषा लोकजीवन की सहजता, मुहावरेदारी और जीवंतता से आलोकित हो उठती है। दोनों भाषाओं में छंद, लय, गेयता, बिंब, प्रतीक और व्यंग्य का अत्यंत संतुलित तथा प्रभावपूर्ण प्रयोग उनके गीतों को विशिष्ट बनाता है।
इस प्रकार भगवती प्रसाद द्विवेदी उन विरल रचनाकारों में हैं, जिन्होंने हिंदी और भोजपुरी—दोनों भाषाओं की गीत-परंपरा को समान रूप से समृद्ध किया है। उनके यहाँ भाषा का परिवर्तन केवल अभिव्यक्ति का परिवर्तन है; मूल संवेदना, दृष्टि और मानवीय सरोकार दोनों भाषाओं में समान रूप से गतिमान हैं।
समग्रतः, यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि भगवती प्रसाद द्विवेदी हिंदी और भोजपुरी गीतों की समकालीन भारतीय नवगीत परंपरा के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उन्होंने दोनों भाषाओं में गीत को केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम न बनाकर सामाजिक चेतना, लोकजीवन, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक अस्मिता का सशक्त दस्तावेज़ बनाया है।
उनके गीतों में एक ओर राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियों के प्रति तीखा प्रतिरोध है, तो दूसरी ओर मनुष्य की अदम्य जिजीविषा, प्रेम, करुणा और भविष्य के प्रति अटूट विश्वास भी विद्यमान है। हिंदी और भोजपुरी—दोनों भाषाओं में उनकी रचनात्मक दृष्टि मूलतः एक ही है। दोनों में सामान्य मनुष्य उनकी काव्य-संवेदना का केंद्र है।
हिंदी में उनका स्वर अपेक्षाकृत व्यापक, प्रतीकात्मक और विश्लेषणात्मक बनकर उभरता है, जबकि भोजपुरी में वही स्वर अधिक आत्मीय, लोकधर्मी और अनुभवसिद्ध हो जाता है। इस प्रकार दोनों भाषाओं के गीत एक-दूसरे के पूरक प्रतीत होते हैं।

