बाबा भोजपुरिया
भोजपुरी के नाम पर सतही मनोरंजन और अश्लील छवि गढ़ने की कोशिश पर तीखा सवाल। भोजपुरी बवाल के आयोजकों के आग्रह है कि इस ‘बवाल’ के आगे से भोजपुरी शब्द हटाना जाना चाहिए।
भोजपुरी बवाल’ का कंटेंट देखें तो विवादों की पूरी श्रृंखला सामने आती है। काजल राघवानी ने पवन सिंह पर कथित रूप से जबरन किसिंग सीन करवाने का आरोप लगाया। उन्होंने निरहुआ और आम्रपाली दुबे पर भी फिल्म तथा गानों में उन्हें दरकिनार करने के आरोप लगाए। निरहुआ और आम्रपाली ने इन दावों पर अपना पक्ष रखा, जबकि ‘आशिक आवारा’ से जुड़े एक आरोप की पड़ताल के लिए निर्माता को शो में बुलाया गया और आरोप की सत्यता पर सवाल उठे। इसी क्रम में निरहुआ और आम्रपाली के निजी रिश्ते को लेकर भी सवाल उछाले गए। ग्रैंड फिनाले के बाद तेज प्रताप यादव ने पवन सिंह पर शराब पीने का आरोप लगाया और उन्हें लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की।
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यह तो कुछ अपेक्षाकृत सभ्य उदाहरण हैं, लेकिन इस ‘बवाल’ में इससे कहीं अधिक गंभीर और आपत्तिजनक चारित्रिक आरोप भी सामने आए हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तरह की सामग्री को ‘भोजपुरी’ के नाम से जोड़ना उचित है? यदि किसी कार्यक्रम में भोजपुरी भाषा, साहित्य और लोक-संस्कृति के बजाय निजी विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और सनसनी ही प्रमुखता पाए, तो इसके नाम से ‘भोजपुरी’ शब्द हटा दिया जाना चाहिए।
भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं है। यह करोड़ों लोगों की स्मृति, संस्कृति, लोकगाथा, श्रम, विरह, प्रेम, हास्य, संघर्ष और सामाजिक चेतना की जीवंत धरोहर है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस भाषा की अपनी समृद्ध लोकपरंपरा रही है, उसी के नाम पर आज ऐसे मनोरंजन कार्यक्रम परोसे जा रहे हैं, जिनमें भोजपुरी की वास्तविक आत्मा लगभग अनुपस्थित दिखाई देती है। ‘भोजपुरी बवाल’ जैसे शो पर सवाल इसलिए उठना चाहिए कि क्या भोजपुरी के नाम पर महज हल्की-फुल्की, सतही और उत्तेजक सामग्री परोस देना ही भोजपुरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व है?
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अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो भोजपुरी भाषी समाज को ऐसे कार्यक्रमों के प्रति अपनी असहमति दर्ज करनी चाहिए और सबसे प्रभावी असहमति है उसे न देखना।
भोजपुरी का नाम, भोजपुरी कहाँ?
किसी भाषा के नाम का इस्तेमाल कर लेना और उस भाषा की संस्कृति को प्रस्तुत करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। भोजपुरी के नाम पर यदि कार्यक्रम में भाषा की साहित्यिक परंपरा, लोकगीत, लोकनाट्य, बिदेसिया, कजरी, चैता, सोहर, निर्गुण, बिरहा, लोककथाएं, प्रवासी जीवन और सामाजिक संघर्ष के लिए कोई गंभीर स्थान नहीं है, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कार्यक्रम भोजपुरी का है या भोजपुरी के बाजार का?
भोजपुरी को लेकर पहले से ही एक दुर्भाग्यपूर्ण धारणा बनाई जाती रही है कि यह अश्लीलता और फूहड़ मनोरंजन की भाषा है। यह धारणा भोजपुरी की वास्तविक सांस्कृतिक संपदा के साथ घोर अन्याय है। लेकिन जब भोजपुरी के अपने ही मनोरंजन उद्योग से जुड़े लोग बार-बार भाषा को देह प्रदर्शन, द्विअर्थी संवाद, भद्दे हास्य और सस्ते मनोरंजन के फ्रेम में कैद करते हैं, तो बाहरी आलोचकों को बैठे-बिठाए वही हथियार मिल जाता है, जिससे वे पूरी भोजपुरी संस्कृति को कठघरे में खड़ा कर सकें। यह सिर्फ खराब मनोरंजन का सवाल नहीं है; यह सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व का सवाल है।
भोजपुरी को ‘कंटेंट’ नहीं, संस्कृति समझिए
बाजार का अपना तर्क होता है-जो बिकेगा, वही दिखेगा। लेकिन क्या हर बिकने वाली चीज संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने लगती है?यदि किसी कार्यक्रम का उद्देश्य केवल दर्शकों को उत्तेजित करना, हंसाना या सनसनी पैदा करना है, तो उसे मनोरंजन कार्यक्रम कहिए। लेकिन उसके आगे ‘भोजपुरी’ शब्द लगाकर उसे भोजपुरी संस्कृति का आईना बताना आपत्तिजनक है।
भोजपुरी की असली ताकत उन आवाजों में है, जिन्हें बाजार अक्सर नजरअंदाज कर देता है। वह आवाज किसान की है, मजदूर की है, परदेस गए बेटे की मां की है, बिरहा गाने वाले लोकगायक की है, खेत में काम करती स्त्री की है, बिदेसिया के विरह की है और उन कवियों की है जिन्होंने भाषा को सामाजिक चेतना दी।
शैलेंद्र के गीतों से लेकर भिखारी ठाकुर की लोकनाट्य परंपरा तक भोजपुरी की सांस्कृतिक जमीन कितनी व्यापक है, यह किसी भी गंभीर अध्येता से छिपा नहीं है। ऐसे में भोजपुरी को केवल हास्य और उत्तेजना के दो-चार आसान फार्मूलों में समेट देना सांस्कृतिक आलस्य और रचनात्मक दिवालियापन से कम नहीं लगता।
‘नचनिया संस्कृति’ बनाम भोजपुरी संस्कृति
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। सवाल किसी कलाकार के नाचने या मनोरंजन करने से नहीं है। लोकसंस्कृति में नृत्य और संगीत की अपनी महत्वपूर्ण जगह है। समस्या तब पैदा होती है जब कलाकार की लोकप्रियता को भाषा की सांस्कृतिक प्रामाणिकता का प्रमाणपत्र बना दिया जाता है।
भोजपुरी सिनेमा के कुछ लोकप्रिय चेहरों ने अपनी मेहनत से पहचान बनाई है, लेकिन लोकप्रियता और सांस्कृतिक योगदान एक ही चीज नहीं हैं। कोई व्यक्ति करोड़ों दर्शक जुटा सकता है, फिर भी उसकी सामग्री भोजपुरी साहित्य और संस्कृति का प्रतिनिधित्व न करती हो। इसलिए व्यक्तियों के बजाय प्रवृत्ति पर सवाल होना चाहिए।
जब भोजपुरी मनोरंजन का बड़ा हिस्सा बार-बार शरीर, भद्दे संवाद, दोअर्थी शब्दों और सस्ते हास्य को केंद्र में रखता है, तब यह पूछना जरूरी हो जाता है कि रचनात्मकता की इतनी बड़ी विरासत के बावजूद हम इतने गरीब विचारों तक क्यों सिमट गए हैं?
दर्शक भी जिम्मेदार है
सबसे कठिन सवाल कलाकारों से नहीं, दर्शकों से पूछा जाना चाहिए। जिस सामग्री को हम देखते हैं, जिस पर क्लिक करते हैं, जिसे साझा करते हैं और जिसे लोकप्रिय बनाते हैं, बाजार उसी को और अधिक पैदा करता है। इसलिए यदि भोजपुरी भाषी समाज सचमुच इस प्रवृत्ति से परेशान है, तो उसे केवल सोशल मीडिया पर गाली देने से आगे बढ़ना होगा। देखना बंद कीजिए। साझा करना बंद कीजिए। टीआरपी और व्यूज मत दीजिए। किसी भी कार्यक्रम का सबसे बड़ा विरोध उसके खिलाफ नारा नहीं, बल्कि दर्शक का उससे मुंह मोड़ लेना है।
भोजपुरी को बचाने के लिए ‘बवाल’ नहीं, बौद्धिकता चाहिए
आज भोजपुरी को किसी और भाषा से खतरा नहीं है। सबसे बड़ा खतरा उस आत्महीनता से है, जिसमें हम अपनी ही भाषा को उसके सबसे कमजोर और विकृत रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। हमें ऐसा भोजपुरी मनोरंजन चाहिए जो हंसाए, लेकिन फूहड़ न हो; जो मनोरंजन करे, लेकिन भाषा को अपमानित न करे; जो आधुनिक हो, लेकिन अपनी जड़ों से कटा हुआ न हो; जो लोकप्रिय हो, लेकिन लोकप्रियता के लिए अपनी सांस्कृतिक गरिमा गिरवी न रखे।
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‘भोजपुरी बवाल’ जैसे कार्यक्रमों पर आलोचना इसलिए जरूरी है कि भोजपुरी समाज को यह तय करना होगा कि वह अपनी भाषा को सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखना चाहता है या केवल बाजारू मनोरंजन की पैकेजिंग के रूप में।
भोजपुरी को अश्लील कहने वालों को जवाब केवल भाषणों से नहीं दिया जा सकता। जवाब ऐसी रचनाओं से देना होगा, जिनमें भाषा की गरिमा, लोकजीवन की सुगंध और समाज की चेतना हो। भोजपुरी को बवाल नहीं चाहिए। भोजपुरी को अपनी असली आवाज चाहिए। और जब तक मनोरंजन के नाम पर भोजपुरी की छवि को हल्का, सतही और फूहड़ बनाने वाली प्रवृत्तियां बदलती नहीं हैं, तब तक भोजपुरी भाषी दर्शकों का यह अधिकार ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दायित्व भी है कि वे तय करें-क्या देखना है, क्या नहीं देखना है और अपनी भाषा को किस रूप में दुनिया के सामने रखना है।

