समीक्षक: डॉ. संतोष पटेल
सन् 1980 के बाद ‘डायस्पोरा’ (Diaspora) शब्द शिक्षा, साहित्य और सार्वजनिक विमर्श के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में उभरकर सामने आया। आज ‘डायस्पोरा स्टडीज’ यानी प्रवासी अध्ययन विश्वविद्यालयों में साहित्य और समाज अध्ययन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। आखिर डायस्पोरा क्या है?
डायस्पोरा केवल प्रवास नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि से दूर जाकर बसने, बिखराव और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की ऐतिहासिक-सामाजिक प्रक्रिया है। सामान्य अर्थ में जो व्यक्ति अपनी जन्मभूमि से दूर किसी दूसरे देश में जाकर बसता है, उसे प्रवासी कहा जाता है, लेकिन व्यापक अर्थ में डायस्पोरा के अंतर्गत वे समुदाय आते हैं, जो अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में अपने देश से दूर गए। इनमें वे भारतीय भी शामिल हैं, जिन्हें फ्रेंच, ब्रिटिश, डच और पुर्तगाली उपनिवेशों में जहाजों के माध्यम से महीनों की समुद्री यात्रा के बाद कुली, गिरमिटिया या शर्तबद्ध मजदूर के रूप में भेजा गया। इसके अलावा राजनीतिक शरणार्थी, विदेशी श्रमिक और नस्लीय अल्पसंख्यक भी डायस्पोरा की अवधारणा में शामिल हैं।
डॉ. राजेश मांझी भोजपुरी साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। भोजपुरी कविता और गद्य दोनों विधाओं में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। ‘गिरमिटिया भारतवंशी’ उनका एक चर्चित और महत्वपूर्ण नाटक है। इस नाटक की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग दस वर्ष पहले, जब मैं दिल्ली के द्वारका से प्रवासी शक्ति और पूर्वांकुर नामक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से जुड़ा था, तब मांझी जी ने मुझे इस नाटक की विषयवस्तु से परिचित कराया था।
इसके बाद भोजपुरी नाट्य संस्था ‘रंगश्री’ द्वारा इस नाटक का कई बार सफल मंचन किया गया। इस नाटक का हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद भी हो चुका है। किसी कृति की लोकप्रियता और प्रभाव को इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है कि वह मंच पर जीवंत हो और दूसरी भाषाओं के पाठकों तक भी पहुंचे।
राजेश मांझी समकालीन भोजपुरी नाटक के एक सशक्त स्वर हैं। कुछ वर्ष पहले उनका भोजपुरी नाटक संग्रह ‘नुन तेल’ प्रकाशित हुआ, जिसमें ‘गिरमिटिया भारतवंशी’ को पढ़ने का अवसर मिला। इस नाटक को पढ़ने के बाद यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मांझी जी की नाट्य दृष्टि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके नाटक किसी भी भाषा के समकालीन नाटकों की बराबरी करने की क्षमता रखते हैं।
उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके नाटकों को मंच पर प्रस्तुत करना सहज और प्रभावशाली होता है। यही एक सफल नाटककार के शिल्प की पहचान होती है।
कहा जा सकता है कि भोजपुरी साहित्य में ‘डायस्पोरा स्टडीज’ के संदर्भ में ‘गिरमिटिया भारतवंशी’ पहला महत्वपूर्ण नाटकीय प्रयास है। यह नाटक किसी प्रवासी व्यक्ति द्वारा नहीं लिखा गया है, बल्कि लेखक ने उन जहाजी मजदूरों, कुलियों और गिरमिटिया श्रमिकों के अनुभवों को आत्मसात करके लिखा है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि से दूर जाकर अमानवीय परिस्थितियों में जीवन बिताया।
सबाल्टर्न साहित्य और अस्मितावादी साहित्य में स्वानुभूति और सहानुभूति का प्रश्न हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। डॉ. मांझी की विशेषता यह है कि उन्होंने केवल सहानुभूति के स्तर पर नहीं, बल्कि पात्रों की पीड़ा और संघर्ष के भीतर उतरकर इस नाटक की रचना की है। उनके संवादों और दृश्यों में ऐसा लगता है जैसे लेखक ने स्वयं उन पात्रों के जीवन को अनुभव किया हो।
इस नाटक को पढ़ते हुए कई बार महसूस होता है कि गिरमिटिया मजदूरों की पूरी दुनिया आंखों के सामने जीवंत हो उठती है। उनके दर्द, संघर्ष, अपमान और उम्मीदों का चित्रण अत्यंत मार्मिक है।
गिरमिटिया मजदूरों के साथ अरकाटियों (मजदूरों की भर्ती करने वाले दलालों) द्वारा किए गए अत्याचार और अमानवीय व्यवहार का चित्रण इस नाटक की बड़ी ताकत है। इस संदर्भ में मॉरीशस के विद्वान अभिमन्यु अनंत की बात याद आती है—
“भारतीय मजदूरों पर जब कोड़े और बांस पड़ते थे तो उनकी आह और कराह भोजपुरी में निकलती थी। यातना शिविरों में वे एक-दूसरे से अपनी-अपनी राम कहानी भोजपुरी में सुनाते थे, चाहे वे भारत के किसी भी प्रदेश से क्यों न आए हों।”
डॉ. राजेश मांझी एक सशक्त कवि, प्रबुद्ध कथाकार और सजग अनुवादक भी हैं। उनकी यही साहित्यिक विविधता इस नाटक के संवादों और दृश्य-रचना को जीवंत बनाती है। संवाद केवल कहानी को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि उस दौर की सामाजिक पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं को भी सामने रखते हैं।
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भोजपुरी साहित्य में गिरमिटिया लोगों के पलायन, विस्थापन और अपनी मिट्टी से दोबारा जुड़ने की इच्छा पर मृत्युंजय कुमार सिंह का उपन्यास ‘गंगा रतन विदेसी’ भी महत्वपूर्ण कृति है, जिसका प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ से वर्ष 2019 में हुआ। इसका हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है। लेकिन नाटक विधा में देखा जाए तो डॉ. राजेश मांझी का ‘गिरमिटिया भारतवंशी’ भोजपुरी का पहला महत्वपूर्ण डायस्पोरा स्टडीज आधारित नाटक है।
इस नाटक के विभिन्न दृश्यों से गुजरते हुए पाठक उस ऐतिहासिक दौर में पहुंच जाता है, जब वर्ष 1834 से 1920 के बीच औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा भारत से मजदूरों को नाटाल, मॉरीशस, फिजी, ट्रिनिडाड एंड टोबैगो और सूरीनाम जैसे देशों में ले जाया गया।
यह केवल मजदूरों के पलायन की कहानी नहीं है, बल्कि यह विस्थापन, शोषण, संघर्ष, अस्मिता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की मनुष्य की अदम्य इच्छा की कथा है।
‘गिरमिटिया भारतवंशी’ की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और उम्मीद है कि आने वाले समय में इसका प्रभाव और व्यापक होगा। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 26वें अधिवेशन में मोतिहारी में डॉ. राजेश मांझी को युवा नाटककार सम्मान मिलना उनकी रचनात्मक यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
डॉ. राजेश मांझी की यह कृति केवल एक नाटक नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज के प्रवासी इतिहास, पीड़ा और संघर्ष का साहित्यिक दस्तावेज है। इस नाटक ने गिरमिटिया भारतवंशियों के इतिहास को भोजपुरी साहित्य में एक सशक्त आवाज दी है।
डॉ. राजेश मांझी की इस महत्वपूर्ण कृति को और अधिक पाठक मिलें, इसका मंचन देश-विदेश में हो और भोजपुरी डायस्पोरा के इतिहास पर गंभीर साहित्यिक विमर्श आगे बढ़े—इसी शुभकामना के साथ। जय भोजपुरी।
डॉ. संतोष पटेल, अध्यक्ष, भोजपुरी जन जागरण अभियान और सहायक कुलसचिव, दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

