भोजपुरी की विदेशों तक की यात्रा, गिरमिटिया से गल्फ तक की अमर कहानी

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पटना/गोरखपुर: कलकत्ता पोर्ट से 1838 में पहली जहाज़ ‘अटलांटिक’ रवाना हुई। उस पर सैकड़ों भोजपुरी बोलने वाले मजदूर सवार थे पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के गांवों से। वे नहीं जानते थे कि उनकी भाषा, गीत और संस्कृति एक दिन फिजी के जंगलों, मॉरीशस के गन्ने के खेतों, ट्रिनिडाड के कैरिबियन द्वीपों और सूरिनाम की नदियों तक फैल जाएगी। आज भोजपुरी सिर्फ भारत-नेपाल की सीमा तक सीमित नहीं है। यह दुनिया भर में 20 करोड़ से ज्यादा लोगों की पहचान है। यह कहानी गरीबी, शोषण, संघर्ष और सांस्कृतिक जीवंतता की है।

गिरमिटिया प्रवास की शुरुआत
1833 में ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी खत्म हुई। लेकिन गन्ने, चाय और कपास के बागानों में सस्ते मजदूरों की जरूरत बनी रही। ब्रिटिश सरकार ने ‘इंडेंटर्ड लेबर सिस्टम’ शुरू किया यानी 5 साल का अनुबंध (गिरमिट)। 1834 से 1917 तक 16 लाख से ज्यादा भारतीय भेजे गए। इनमें सबसे ज्यादा संख्या भोजपुरी भाषी क्षेत्र (पूर्वांचल, बिहार) से थी।

मॉरीशस: 4,53,063 भारतीय पहुंचे। ज्यादातर भोजपुरी बोलने वाले। यहां भोजपुरी मॉरिशियन भोजपुरी में विकसित हुई। आज यह देश की प्रमुख भाषाओं में से एक है।
फिजी: 1879-1916 के बीच 60,000 से ज्यादा। फिजी हिंदी का आधार भोजपुरी है। आज इंडो-फिजियन आबादी में यह आधिकारिक भाषा है।
ट्रिनिडाड एंड टोबैगो: 1.4 लाख से ज्यादा। ज्यादातर भोजपुरी और अवधी बोलने वाले ‘गिरमिटिया’। यहां भोजपुरी लोकगीत चटनी म्यूजिक में बदल गए।
गुयाना (ब्रिटिश गयाना): हजारों भोजपुरी बोलने वाले। कैरेबियन हिंदुस्तानी का आधार भोजपुरी।
सूरीनाम (डच कॉलोनी): सरनामी भाषा भोजपुरी-आधारित है। इंडो-सूरीनामी समुदाय आज भी इसे बोलता है।
दक्षिण अफ्रीका (नेटाल): वहां आज भी भोजपुरी का प्रभाव है। कुछ परिवार तो पुरानी भोजपुरी ही बोलते हैं।

ये मजदूर कलकत्ता से जहाजों पर चढ़े। यात्रा में भुखमरी, बीमारी और मौत का खतरा था। लेकिन वे अपने साथ सत्तू, लिट्टी-चोखा, छठ गीत, कजरी और बिदेसिया गीत ले गए। भिखारी ठाकुर का ‘बिदेसिया’ नाटक इसी पीड़ा को अमर कर गया ‘बिदेसिया बाबा, हमार देश छोड़ के कहां चले…?’

गल्फ का नया प्रवास
1960-70 के दशक में खाड़ी देशों में तेल बूम आया। यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, ओमान, कतर और बहरीन में निर्माण, तेल और सेवा क्षेत्रों में लाखों भोजपुरी बोलने वाले मजदूर पहुंचे। आज GCC देशों में करीब 85-90 लाख भारतीय हैं, जिनमें बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश और बिहार से है।
संख्या: सऊदी अरब में 25-27 लाख, यूएई में 34 लाख से ज्यादा भारतीय। इनमें भोजपुरी बोलने वाले मजदूरों की संख्या लाखों में है।
आधुनिक चुनौतियां: कफाला सिस्टम, कम वेतन, गर्मी और अलगाव। फिर भी वे भोजपुरी गाने, छठ पूजा और होली मनाते हैं।
पश्चिमी देश: अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में छोटे-छोटे समुदाय। यहां कुशल प्रवासन (आईटी, डॉक्टर, छात्र) बढ़ा है।

भाषा से लेकर संगीत तक, भोजपुरी ने विदेशों में नई पहचान बनाई:

भाषा का विकास: फिजी हिंदी, कैरेबियन हिंदुस्तानी और सरनामी भोजपुरी से निकली। मॉरीशस में भोजपुरी क्रिओल के साथ मिश्रित हुई।
संगीत: कैरेबियन में चटनी म्यूजिक, भोजपुरी लोक + कैरेबियन बीट। ट्रिनिडाड में हर साल चटनी म्यूजिक फेस्टिवल होता है।
त्योहार: छठ, होली, दिवाली, फागवा आज भी फिजी, मॉरीशस, ट्रिनिडाड में धूमधाम से मनाए जाते हैं। मॉरीशस में ‘भोजपुरी महोत्सव’ सरकारी स्तर पर आयोजित होता है।
सिनेमा और मीडिया: भोजपुरी फिल्में और गाने (निरहुआ, खेसारी लाल) यूट्यूब पर गल्फ और कैरेबियन में करोड़ों व्यूज पाते हैं।

वर्तमान स्थिति और आंकड़े
कुल बोलने वाले: भारत में 5 करोड़ से ज्यादा (2011 सेंसस)। विदेशों में मॉरीशस (66,000), फिजी (लाखों में फिजी हिंदी), सूरिनाम, ट्रिनिडाड आदि में कुल मिलाकर कई लाख।
संरक्षण: मॉरीशस और फिजी में भोजपुरी स्कूलों में पढ़ाई जाती है। भारत सरकार और स्थानीय संगठन लोकगीत संरक्षण पर काम कर रहे हैं।

चुनौतियां और भविष्य
नई पीढ़ी अंग्रेजी और स्थानीय भाषाओं की ओर जा रही है। फिर भी सोशल मीडिया और यूट्यूब ने भोजपुरी को नई जान दी है। बिदेसिया गीत आज भी गल्फ के मजदूर कैंपों में गूंजते हैं। भोजपुरी की विदेश यात्रा सिर्फ भाषा की नहीं, बल्कि मानवीय संघर्ष की कहानी है। गिरमिटिया मजदूरों ने जो बीज बोए, वे आज पूरे विश्व में फल-फूल रहे हैं। यह हमारी जड़ों की याद दिलाती है कि चाहे कितनी भी दूर चले जाएं, हमारी भाषा हमें जोड़े रखती है।

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