स्वतंत्रता संग्राम में भोजपुरी का ऐतिहासिक योगदान: डॉ. सुधाकर तिवारी

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लोक विधाओं के माध्यम से राष्ट्रवाद की अलख जगाने की गौरवगाथा लिखने का काम भोजपुरी ने किया। भोजपुरी भाषा देश के स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों की जड़ों को हिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुकी है। अंग्रेजी हुकूमत को अपनी भाषा और अपनी बोली के बल पर अलग-अलग भोजपुरी विधाओं ने इतना परेशान किया कि झुंझलाए फिरंगियों ने भारत से दूरी बनाना ही बेहतर समझा। आइए जानते हैं, देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भोजपुरी का क्या योगदान था और किस तरह भोजपुरी की अलग-अलग विधाओं ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव को हिलाने का काम किया।

आजादी की लड़ाई में भोजपुरी सिर्फ भाषा नहीं थी, बल्कि यह पूर्वांचल और बिहार के क्रांतिकारियों के आंदोलन की आवाज थी। 1857 से 1942 तक भोजपुरी के लोकगीत, नाटक, कविता और गायकी ने गांव-गांव में अंग्रेजों के खिलाफ चेतना जगाई। भोजपुरी में बिरहा, कजरी, चैती आदि के जरिए लोकगायकों ने अंग्रेजों के जुल्म, टैक्स और सिपाहियों की भर्ती को गीतों के जरिये पेश किया। इस प्रयास ने अनपढ़ किसानों और बड़े क्रांतिकारियों को जोड़ा और लोगों ने गाते-गाते देशभक्ति को जीना सीख लिया। इसके अलावा नौटंकी और नाटकों के माध्यम से फिरंगी राज के खिलाफ खुले मंच पर व्यंग्य प्रस्तुत किए गए, जिससे अंग्रेज परेशान होने लगे।

स्वतंत्रता संग्राम में भोजपुरी का ऐतिहासिक योगदान

बड़े नाम, जिन्होंने भोजपुरी से अंग्रेजों को परेशान किया

भिखारी ठाकुर: भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के नाटक ‘बेटी-बेचवा’ और ‘विदेसिया’ में सामाजिक सरोकारों के साथ तत्कालीन परिस्थितियों की झलक मिलती है। ‘सिपाही न बन भैया’ जैसे गीत भी चर्चित हुए।

राजेश्वर मणि त्रिपाठी: उन्होंने राष्ट्रीय कजरी लिखी और 1942 के आंदोलन में भूमिगत रहकर गीत छपवाए। ‘मनोरंजन’, ‘लिया के कवि’ और ‘लहू से लिख देंगे’ जैसी कविताओं से युवाओं में जोश भरने का काम किया।

महेंद्र मिसिर: बिरहा और भोजपुरी कविताओं एवं गीतों के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ जनचेतना जगाने का काम किया। उनके क्रांति गीतों ने अंग्रेजी हुकूमत को परेशान कर दिया।

राजदेव यादव: उन्होंने ‘करो या मरो’ के संदेश को भोजपुरी धुन में गाकर गांव-गांव घूमकर लोगों को जगाने का काम किया।

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बलिया, बैरकपुर और 1857 की पहली चिंगारी

1857 के विद्रोह की पहली चिंगारी और उसके विस्तार में भोजपुरी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बैरकपुर से लेकर बलिया तक क्रांतिकारी चेतना का प्रभाव दिखाई दिया।

चिट्टू पांडेय: 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बलिया को स्वतंत्र जिला घोषित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके भाषणों में भोजपुरी की सहजता और जनभाषा का प्रभाव दिखाई देता था।

राजेंद्र लाहिड़ी और रामकृष्ण खत्री: काकोरी कांड के बाद जेल में भी भोजपुरी गीतों के माध्यम से साथियों का हौसला बढ़ाने का उल्लेख मिलता है।

क्यों खास था स्वतंत्रता आंदोलन में भोजपुरी का किरदार?

भोजपुरी जन-जन की भाषा थी। अंग्रेजी और मानक हिन्दी नहीं समझने वाले किसानों और ग्रामीणों तक भी भोजपुरी सहजता से पहुंचती थी।

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अंग्रेज पुलिस कई बार भोजपुरी गीतों और लोकभाषा में छिपे संदेशों का अर्थ नहीं समझ पाती थी। ‘विदेसिया’ और ‘फिरंगी’ जैसे शब्दों के माध्यम से अंग्रेजी शासन पर व्यंग्य और विरोध व्यक्त किया जाता था।

बिरहा, सोहर, चैता, बारहमासा, पूरबी, नाटक, नौटंकी, लोकगीत, लोकोक्तियां, साहित्य, उपन्यास और गीतों के माध्यम से स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद की चेतना लोगों तक पहुंचाई गई।

बड़े नाम, जिन्होंने भोजपुरी का सम्मान बढ़ाया

भोजपुरी का सम्मान बढ़ाने और भोजपुरी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करने वाले प्रमुख नामों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, शिवपूजन सहाय और पांडेय चंद्रशेखर शास्त्री आदि शामिल हैं।

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दरअसल, गांधी जी और उनके नेतृत्व में संचालित स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन का प्रभाव भोजपुरी क्षेत्र में देश के अन्य भागों की अपेक्षा काफी अधिक देखा गया। यूं कहा जा सकता है कि भोजपुरी बेल्ट में गांधी जी का प्रभाव व्यापक था।

1917 में चंपारण से शुरू हुआ महात्मा गांधी का आंदोलन और 1942 में बलिया में अंग्रेजी शासन के खिलाफ उठी निर्णायक आवाज—इन दोनों पड़ावों के बीच लगभग 25 वर्षों की संघर्षगाथा अनेक घटनाओं और अनुभवों को समेटे हुए है। इस पूरी यात्रा में भोजपुरी समाज और उसकी लोकभाषा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लोकगीतों ने स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला को दी धार

लोकगीतों ने स्वतंत्रता संग्राम की अग्नि में घी डालने का काम किया। पहली बात तो यह समझना जरूरी है कि जो लोग भोजपुरी को केवल मनोरंजन का साधन या फिल्मी दुनिया में अश्लील गीतों की भाषा मानते हैं, यह उनकी गलतफहमी है।

भोजपुरी हमारी उस मजबूत सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसने स्वाधीनता आंदोलन को वह धार दी, जो बिना तलवार, कृपाण और चाकू के अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को हिलाने का काम कर गई।

भोजपुरी लोकगीतों से कांप उठे थे अंग्रेज

भोजपुरी रचनाओं से आजादी के आंदोलन को गति मिली। असहयोग आंदोलन में भी 1920 में इसी क्षेत्र के 11 छात्रों ने भाग लेकर अपनी पढ़ाई छोड़ते हुए आंदोलन को सहयोग दिया। देवरिया के रामचंद्र विद्यार्थी का नाम इनमें अग्रणी रहा।

भोजपुरी क्षेत्र के प्रमुख क्रांतिकारी बाबू रघुवीर नारायण सिंह ने ‘बटोहिया’ गीत की रचना करके संपूर्ण उत्तर भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंकने का काम किया। इस गीत में भारत दर्शन के साथ-साथ उसके प्रमुख व्यक्तियों, सिद्धांतों, देश की नदियों, वनस्पतियों और पशु-पक्षियों का जीवंत वर्णन किया गया।

इसी तरह आचार्य मनोरंजन प्रसाद सिंह ने ‘फिरंगिया’ नामक गीत की रचना कर अंग्रेजों के शासनकाल में भारत की बिगड़ती आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक स्थिति का उल्लेख करते हुए देशवासियों का आह्वान किया कि हर हाल में देश की रक्षा के लिए अंग्रेजों को भगाना होगा।

उन्होंने लिखा-

‘सुंदर सुघर भूमि भारत के रहे रामा,
आज इहे भइल मसान रे फिरंगिया।
अन्न, धन, जन, बल, बुद्धि सब नास भइल,
कवनो के ना रहल निसान रे फिरंगिया।’

लोक विधाओं से राष्ट्रवाद की अलख जगाने की गौरवगाथा

स्वाधीनता संग्राम में भोजपुरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस संघर्ष में ऐसे बहुत से नाम हैं, जिन्होंने भोजपुरी के माध्यम से जनचेतना जगाने का काम किया।

सरदार हरिशंकर सिंह, जो बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बने, ने देश की आजादी के संघर्ष, असहयोग आंदोलन, नमक आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन सहित हिंद फौज की गतिविधियों को अपने गीतों में स्वर दिया। उन्होंने—

‘चलु भैया आजु सभे जन हिलिमिली,
सुतल जे भारत के भाई जगाईं जा’

जैसे गीतों के माध्यम से लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जागृत करने का काम किया।

उस समय जनभावना को लोकगीतों में इस प्रकार व्यक्त किया गया—

‘गांधी कहै, गांधी कहै, मन चित्त लाइके,
गंगा सरजू चाहे कूपा पर नहाइ के,
लिहले अवतार एही देशवा में आइ के,
चक्र के बदला में चरखा चलाइ के,
गांधी कहै।’

लखीमपुर खीरी के अवधी कवि बंशीधर शुक्ल ने भोजपुरी में लिखा—

‘मोरा चरखा के टूटे ना तार,
चरखवा चालू रहे।’

इस आंदोलन में गोपाल शास्त्री, जो बिहार के सारण जिले के संस्कृत के विद्वान थे, की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे 1932 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। असहयोग आंदोलन के वे अगुआ थे। शास्त्री जी के रचित राष्ट्रीय लोकगीत न केवल बहुत लोकप्रिय हुए, बल्कि उनका व्यापक प्रचार भी हुआ। अंग्रेजों की नजर में आने के बाद उनका सारा साहित्य जब्त कर लिया गया था।

स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना का केंद्र रहा बिहार और पूर्वांचल

गांधी जी के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र बिहार और पूर्वांचल रहा। स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित होकर गीत और साहित्य रचने वाले साहित्यकारों में बाबू रघुवीर नारायण सिंह का नाम प्रमुख है। राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय चेतना के संदर्भ में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनका ‘बटोहिया’ गीत उस समय खूब लोकप्रिय हुआ।

आचार्य मनोरंजन प्रसाद सिंह, मोती बीए, महेंद्र मिसिर और चंद्रशेखर मिसिर ऐसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में न सिर्फ भाग लिया, बल्कि आंदोलन से जुड़कर भोजपुरी संस्कृति और भोजपुरी माटी को समृद्ध किया।

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भोजपुरी में ऐसे अनेक गीत हैं, जो जनसंस्कृति का हिस्सा बने। भोजपुरी अपने लोकगीतों और लोककलाओं के लिए जानी जाती है। कजरी, चैती और फगुआ के माध्यम से भी स्वतंत्रता आंदोलन के संदेश वाले गीत गाए गए। गांधी जी का चरखा, जो उनके स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख प्रतीक था, उस पर भी अनेक गीत रचे गए।

भोजपुरी सिर्फ मनोरंजन की भाषा नहीं

भोजपुरी सिर्फ मनोरंजन की भाषा नहीं है। यह संस्कृति और स्वाधीनता आंदोलन की भाषा भी रही है। 1857 का महासंग्राम जिस व्यापक भूभाग में लड़ा गया, उसमें भोजपुरी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका थी। भोजपुरी क्षेत्र में बाबू कुंवर सिंह से लेकर मंगल पांडेय तक अनेक वीरों ने क्रांति की ज्योति को प्रज्वलित किया।

विश्वनाथ पांडेय ‘राहगीर’ ने अपनी कविताओं के माध्यम से आजादी की अलख जगाई और चौरी-चौरा कांड के बाद एक वर्ष से अधिक समय तक गोरखपुर जेल में बंद रहे। प्रसिद्ध कवि श्रीनारायण सिंह ने ‘विद्रोह’ नामक कविता लिखी।

ऐसे बहुत से गीत हैं, जिनमें भोजपुरी की सुगंध आज भी मिलती है। महेंद्र मिसिर का नाम इनमें प्रमुखता से आता है। मोती बीए ने भी अंग्रेजी हुकूमत का मुकाबला अपनी लेखनी के माध्यम से किया और लंबी जेल यात्रा की।

चंद्रशेखर मिसिर ने स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागिता की और कई बार जेल भी गए। हालांकि, यह दुखद है कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इन लोगों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में वह मान्यता नहीं मिल सकी, जिसके वे हकदार थे।

नई पीढ़ी से जुड़ने की जरूरत

आज की पीढ़ी भोजपुरी की लोक परंपरा से दूर होती जा रही है। हमारे बच्चे भोजपुरी गीतों और लोकगीतों से दूर हो रहे हैं। लोकगीत गाने और सुनने की परंपरा भी कमजोर पड़ रही है। ऐसे में भोजपुरी की इस गौरवशाली विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत और बढ़ गई है।

भोजपुरी की लोकविधाओं, साहित्य और स्वतंत्रता आंदोलन में इसके योगदान पर गंभीर अध्ययन और दस्तावेजीकरण आवश्यक है।

बीएचयू के भोजपुरी अध्ययन केंद्र में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण शोध हुए हैं। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े लोगों की स्मृतियों पर शोध किया गया है। मोती बीए पर शोध हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी कथाओं और अनेक साहित्यकारों पर भी काम किया गया है। इसके अलावा गिरमिटिया मजदूरों से जुड़े विषयों पर भी शोध किए गए हैं।

भोजपुरी की यह विरासत केवल भाषा और साहित्य की विरासत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की जनचेतना, लोकसंस्कृति और प्रतिरोध की भी विरासत है। इसे संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

लेखक — विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अंतरराष्ट्रीय महासचिव और भोजपुरी साहित्य मंच के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक हैं।

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