Bhojpuri24.com की विशेष शृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय ऐसे साहित्य साधक का, जिन्होंने शिक्षक के रूप में समाज को शिक्षित करने के साथ अपनी लेखनी से भोजपुरी भाषा और साहित्य को समृद्ध किया। शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ की रचनाओं में गीत, गजल, कविता, दोहा और भाषा-विज्ञान के माध्यम से भोजपुरी माटी, लोकजीवन, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
शिक्षा और साहित्य को जीवन का आधार बनाने वाले शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ लंबे समय तक शिक्षक रहे और प्राथमिक शिक्षक संघ अंचल तरैया, सारण के पूर्व अध्यक्ष भी रहे। उनकी साहित्य साधना निरंतर प्रकाशित कृतियों के साथ-साथ कई अप्रकाशित रचनाओं में भी दिखाई देती है।
सारण की धरती से साहित्य साधना की शुरुआत
2 जनवरी 1955 को जन्मे शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ का संबंध बिहार के सारण जिले से है। उनके पिता श्री शिवशंकर सिंह, जो स्वयं अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं, और माता स्वर्गीय कौशल्या देवी के संस्कारों ने उनके जीवन को दिशा दी।
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उनकी प्रारंभिक सामाजिक और शैक्षिक यात्रा शिक्षक जीवन से जुड़ी रही। उन्होंने एम.ए. (हिन्दी), बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से किया तथा बी.टी. प्राथमिक शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय, थावे, सारण से शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
शिक्षक के रूप में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय तक योगदान दिया। अवकाश प्राप्ति के बाद भी साहित्य उनकी सक्रिय साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ का पारिवारिक जीवन भी शिक्षा और सामाजिक मूल्यों से जुड़ा रहा है।
शिक्षक से साहित्य साधक तक का सफर
शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ के व्यक्तित्व में शिक्षक और साहित्यकार की भूमिकाएं एक-दूसरे से जुड़ी दिखाई देती हैं। शिक्षा ने जहां उन्हें समाज और नई पीढ़ी को करीब से समझने का अवसर दिया, वहीं साहित्य ने उनके अनुभवों और संवेदनाओं को अभिव्यक्ति का माध्यम दिया।
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भोजपुरी भाषा के प्रति उनका लगाव उनकी प्रकाशित कृतियों के शीर्षकों और विषय-वस्तु में भी स्पष्ट दिखाई देता है। गीत-गजल से लेकर कविता और भाषा-विज्ञान तक उन्होंने विभिन्न साहित्यिक विधाओं में लेखन किया है।
भोजपुरी साहित्य को दी विविध विधाओं की रचनाएं
शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ की भोजपुरी में प्रकाशित और अप्रकाशित कृतियों की सूची उनकी साहित्यिक सक्रियता और विविध रुचियों को सामने रखती है।
उनकी प्रमुख कृतियां हैं—

- ‘राम-अनुराग’ — गीत-गजल संग्रह, मार्च 2017
- ‘शुभ-दर्पण’ — कविता-संग्रह, मार्च 2018
- ‘बेटी हई वरदान’ — कविता-संग्रह, मार्च 2019
- ‘भोजपुरी रचना संसार’ — कविता-संग्रह, मार्च 2019
- ‘भारतीय भाषा विज्ञान आ भोजपुरी’ — 2020
- ‘कलयुग के देवता’ — अप्रकाशित
- ‘शुभ दोहावली’ — अप्रकाशित
इन कृतियों से स्पष्ट होता है कि उनकी साहित्यिक यात्रा केवल एक विधा तक सीमित नहीं रही। गीत, गजल, कविता, दोहा और भोजपुरी भाषा के भाषावैज्ञानिक पक्ष तक उनकी रचनात्मक रुचि फैली हुई है।
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‘बेटी हई वरदान’ से सामाजिक संवेदना का स्वर
शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ की कृतियों में सामाजिक सरोकार भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ‘बेटी हई वरदान’ जैसा कविता-संग्रह समाज में बेटियों के महत्व और उनके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है।
उनकी साहित्य साधना में भाषा के साथ समाज भी केंद्र में दिखाई देता है। यही विशेषता उन्हें ऐसे रचनाकार के रूप में पहचान देती है, जिनके लिए साहित्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का माध्यम भी है।
भोजपुरी भाषा और साहित्य के सजग साधक
‘भारतीय भाषा विज्ञान आ भोजपुरी’ उनकी साहित्यिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस कृति के माध्यम से भोजपुरी को भाषा-विज्ञान के संदर्भ में देखने की उनकी रुचि सामने आती है।

भोजपुरी की साहित्यिक समृद्धि और भाषाई स्वरूप को लेकर गंभीर लेखन आज भोजपुरी भाषा के व्यापक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है। शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ की रचनात्मक यात्रा इसी दिशा में उनके निरंतर प्रयास को दर्शाती है।
सम्मानों से सम्मानित हुई साहित्य साधना
भोजपुरी साहित्य और भाषा के प्रति उनके योगदान को विभिन्न संस्थाओं ने सम्मानित किया है। उन्हें प्राप्त प्रमुख सम्मानों में शामिल हैं-
- बाबू रघुवीर नारायण सम्मान — 2016, हेलो भोजपुरी, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, नई दिल्ली
- भिखारी ठाकुर सम्मान — 22 मार्च 2017, खानकाहे औलिया इमामिया शफियाबादी शरीफ, बैकुण्ठपुर, गोपालगंज
- बज्म-ए-सुहैल सम्मान — 2017, छपरा
- साहित्य रश्मि सम्मान — 2017, साहित्यिक संस्था, छपरा
- वज्म-ए-हबीब सम्मान — 2018, बरौली, गोपालगंज
- पं. धरीक्षण मिश्र साहित्य सम्मान — 2018, सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
- पं. कुबेरनाथ मिश्र ‘विचित्र’ स्मृति सम्मान — 2020, विश्व भोजपुरी परिषद, नई दिल्ली
ये सम्मान उनकी साहित्य साधना और भोजपुरी भाषा के प्रति उनके समर्पण की सार्वजनिक स्वीकृति हैं।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ को ‘भोजपुरी धुरंधर’ इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने अपने शिक्षक जीवन के अनुभवों और साहित्यिक संवेदनाओं को भोजपुरी भाषा की विभिन्न विधाओं में अभिव्यक्त किया। गीत-गजल, कविता, दोहा और भाषा-विज्ञान जैसे विविध क्षेत्रों में उनकी रचनात्मक उपस्थिति भोजपुरी साहित्य की व्यापकता को सामने लाती है।
उनकी कृतियां भोजपुरी को केवल बोलचाल की भाषा के रूप में नहीं, बल्कि साहित्यिक अभिव्यक्ति, सामाजिक चेतना और भाषाई अध्ययन की समर्थ भाषा के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
‘भोजपुरी धुरंधर’ शृंखला में शुभ नारायण सिंह ‘शुभ’ उस साहित्य साधक के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने शिक्षक की भूमिका से समाज को समझा और साहित्यकार की कलम से भोजपुरी भाषा, लोकसंवेदना और सामाजिक सरोकारों को शब्द दिए।

