भोजपुरिये के नाँव प काहे संसद में चुप बानी?’: मनोज भावुक की कविता में संवैधानिक पहचान की मांग को आवाज

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भोजपुरी को हेय दृष्टि से देखने वाली सोच पर व्यंग्य, भाषा के सम्मान और संवैधानिक पहचान की मांग को आवाज

भोजपुरी भाषा और संस्कृति के सम्मान को लेकर चर्चित कवि और साहित्यकार मनोज भावुक ने अपनी कविता ‘भोजपुरिये के नाँव प काहे संसद में चुप बानी?’ के माध्यम से एक बड़ा सवाल खड़ा किया है। यह कविता केवल भाषा की पीड़ा नहीं बताती, बल्कि उस मानसिकता पर भी प्रहार करती है, जो भोजपुरी को सीमित नजरिए से देखती है।

मनोज भावुक अपनी रचनाओं में भोजपुरी समाज की भावनाओं, संघर्ष और सांस्कृतिक गौरव को स्वर देते हैं। उनकी कविता में उस दर्द की अभिव्यक्ति है, जहां एक ओर करोड़ों लोग भोजपुरी बोलते हैं, वहीं दूसरी ओर भाषा को अब तक वह संवैधानिक पहचान नहीं मिल पाई है, जिसकी मांग लंबे समय से उठती रही है।

ये भी पढ़ें-‘मालिक बहुत मानते हैं’, भोजपुरी की दुर्दशा पर मनोज भावुक का करारा व्यंग्य

भाषा नहीं, पहचान है भोजपुरी

कविता की शुरुआत ही समाज में बदलती भाषा-मानसिकता पर सवाल उठाती है। घरों में हिंदी और अंग्रेजी को प्रतिष्ठा मिलने तथा भोजपुरी को पिछड़ेपन से जोड़ने वाली सोच पर कवि व्यंग्य करते हैं। वह बताते हैं कि भोजपुरी केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपरा, संस्कार, खान-पान, रिश्तों और जीवन शैली की धरोहर है।

कविता की पंक्तियां-

‘सास बकेली हिंदी, इंग्लिश छाँटेली बहुरानी
भोजपुरी के थाती बस ढोवेली दादी-नानी’

उस सामाजिक बदलाव को दर्शाती हैं, जहां नई पीढ़ी अपनी ही मातृभाषा से दूरी बनाने लगी है।

लोक संस्कृति और नई पीढ़ी के बीच बढ़ती दूरी

मनोज भावुक अपनी कविता में उन लोक शब्दों और परंपराओं का भी जिक्र करते हैं, जो भोजपुरी जीवन का हिस्सा रहे हैं। चुक्की-मुक्की, ठेकुआ, ओरहन जैसे शब्द केवल भाषा नहीं, बल्कि गांव की संस्कृति और पारिवारिक स्मृतियों से जुड़े प्रतीक हैं।

ये भी पढ़ें-भोजपुरी बोलना शर्म नहीं, गर्व की बात है

कवि सवाल करते हैं कि क्या आधुनिकता के नाम पर अपनी जड़ों से कट जाना सही है? क्या अपनी मातृभाषा बोलना पिछड़ेपन की निशानी है या अपनी पहचान पर गर्व करने का माध्यम?

30 करोड़ लोगों की भाषा, फिर भी पहचान का इंतजार

कविता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भोजपुरी की व्यापकता और उसके सम्मान का सवाल है। मनोज भावुक याद दिलाते हैं कि देश-विदेश में करोड़ों लोग भोजपुरी बोलते हैं, लेकिन इसके बावजूद भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने का इंतजार है।

‘तीस करोड़ जने बोलेलें देश-विदेश में जे के
ऊ भाषा अभियो तड़पत बा, माँगत बाटे पानी’ 

इन पंक्तियों में भोजपुरी भाषा की उस पीड़ा को व्यक्त किया गया है, जहां संख्या और समृद्ध साहित्यिक परंपरा के बावजूद पहचान का संघर्ष जारी है।

सत्ता और समाज से सीधा सवाल

कविता में कवि राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व से भी सवाल करते हैं। भोजपुरी में भाषण देकर समर्थन हासिल करने वाले नेताओं से वह पूछते हैं कि जब भाषा के अधिकार और सम्मान की बात आती है तो आवाज क्यों कमजोर पड़ जाती है।

‘भोजपुरी में भाषण देके रउरा पवनी सत्ता
भोजपुरिये के नाँव प काहे संसद में चुप बानी’ 

यह सवाल केवल राजनीति से नहीं, बल्कि पूरे समाज से भी जुड़ा है कि अपनी भाषा के संरक्षण और सम्मान के लिए सामूहिक प्रयास कितने जरूरी हैं।

भोजपुरी संस्कृति के सम्मान का संदेश

मनोज भावुक की कविता का उद्देश्य किसी भाषा के विरोध में खड़ा होना नहीं, बल्कि सभी भाषाओं के सम्मान के साथ भोजपुरी को उसका उचित स्थान दिलाने की मांग करना है। उनकी रचनाएं यह संदेश देती हैं कि भाषा किसी क्षेत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक ताकत होती है।

Bhojpuri24.com की विशेष साहित्यिक शृंखला में मनोज भावुक की यह कविता भोजपुरी अस्मिता, संस्कृति और भाषा सम्मान की उसी आवाज को सामने लाती है, जो अपनी पहचान के लिए लगातार संवाद कर रही है। आज पढ़ें मनोज भावुक की कविता-


भोजपुरिये के नाँव प काहे संसद में चुप बानी?

सास बकेली हिंदी, इंग्लिश छाँटेली बहुरानी
भोजपुरी के थाती बस ढोवेली दादी-नानी

चुक्की-मुक्की, चाल करs, ठेकुआ, ओरहन, अगरासन
पीहू पूछेली मम्मी से – ‘’ क्या हैं इनके मानी ‘’

मैडम बोलेली पीहू से- ‘’ बिगड़ेगी ही भाषा ‘’
क्यों सुनती रहती हो तुम दादी से रोज कहानी

भोजपुरी के दर्द कहीं का, हम रउरा से साहेब
टूटल खटिया, उसरल लेवा, फाटल मच्छरदानी

तीस करोड़ जने बोलेलें देश-विदेश में जे के
ऊ भाषा अभियो तड़पत बा, माँगत बाटे पानी

देश रतन, पीएम, सीएम, नेता, अफसर जे देलस
ऊ भाषा सरकारी नइखे, होखत बा हैरानी

भोजपुरी में भाषण देके रउरा पवनी सत्ता
भोजपुरिये के नाँव प काहे संसद में चुप बानी

अष्टम अनुसूची में शामिल भोजपुरी बा कहवाँ
तबहूँ रउरा मंच से लामा-लामा फेंकत बानी

खिल्ली आज उड़ावत बा जे भोजपुरी भाषा के
नइखे दूर समय जब ऊहो एकर लोहा मानी

शायद हमनी के कोशिश में चूक कहीं त बाटे
कइसे ना अधिकार मिली जब सब मिल-जुल के ठानी

भोजपुरी जीवन-शैली हs, थाती हs हमनी के
‘भावुक’ हो, एही से दुनिया हमनी के पहचानी

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