पटना/गोरखपुर: गोइठा की धीमी आंच पर सेंकी जा रही लिट्टी की महक, बैंगन-आलू-टमाटर के धुंआ वाले चोखे की तीखी खुशबू और छठ पूजा के ठेकुए की खस्ता मिठास… भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में त्योहार सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि इन पारंपरिक व्यंजनों के माध्यम से जीवंत हो उठते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और झारखंड के भोजपुरी इलाकों में खान-पान की ये परंपराएं सदियों पुरानी हैं। ये व्यंजन न सिर्फ स्वादिष्ट हैं, बल्कि पौष्टिक, मौसम-अनुकूल और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े हुए हैं।
भोजपुरी फूड कल्चर की पहचान लिट्टी-चोखा और सत्तू से शुरू होती है। इतिहासकारों के अनुसार लिट्टी-चोखा की जड़ें मगध साम्राज्य तक जाती हैं। चंद्रगुप्त मौर्य के सैनिक युद्ध के दौरान इसे साथ रखते थे क्योंकि यह लंबे समय तक खराब नहीं होता था और आसानी से बन जाता था। 1857 की स्वतंत्रता संग्राम में भी तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई के सैनिकों का मुख्य भोजन लिट्टी-चोखा था। आज यह व्यंजन पूरे देश में लोकप्रिय है, लेकिन भोजपुरी घरों में यह अभी भी रोजमर्रा और त्योहारों दोनों का हिस्सा है।
लिट्टी-चोखा है भोजपुरी थाली का राजा
लिट्टी गेहूं के आटे की लोई होती है, जिसमें सत्तू (भुने चने का आटा) भराव डाला जाता है। भराव में अजवाइन, लहसुन, हरी मिर्च, नमक, सरसों तेल और कभी-कभी प्याज मिलाया जाता है। लिट्टी को गोइठा या अंगीठी की आग पर सेंका जाता है। चोखा बैंगन, आलू और टमाटर को आग पर भूनकर बनाया जाता है, जिसमें कच्चा लहसुन, हरी मिर्च, सरसों तेल और धनिया डाला जाता है। घी में डुबोकर खाई जाने वाली लिट्टी-चोखा किसानों और मजदूरों की ताकत का प्रतीक रही है। सत्तू प्रोटीन, फाइबर और आयरन से भरपूर होता है, जो पूरे दिन की मेहनत के लिए ऊर्जा देता है।
छठ पूजा में ठेकुए की महिमा
भोजपुरी क्षेत्र का सबसे बड़ा त्योहार छठ पूजा है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में ठेकुआ सबसे महत्वपूर्ण प्रसाद है। ठेकुआ गेहूं के आटे में गुड़ का घोल, घी और सौंफ मिलाकर बनाया जाता है। आटे को सख्त गूंथकर विभिन्न आकार (गोल, फूल या डिजाइन वाले) दिए जाते हैं और घी में गहरे सुनहरे रंग तक तला जाता है। यह खस्ता और मीठा होता है। नहाय-खाय के दिन सात्विक थाली बनाई जाती है. इसमें चावल, दाल, लौकी की सब्जी, घी और सेंधा नमक। खरना के दिन खीर और फल। अर्घ्य के समय ठेकुआ, फल, नारियल और गन्ना सूर्य देव को चढ़ाया जाता है। छठ गीतों के साथ ठेकुए बनाने की प्रक्रिया पूरे परिवार को जोड़ती है। महिलाएं व्रत रखकर इसे बनाती हैं, जो भक्ति और शुद्धता का प्रतीक है। ठेकुआ पूरे साल खाया जाता है, लेकिन छठ में इसकी विशेष महत्ता है।
रंगों और मिठास का मिलन
होली में भोजपुरी घरों में मीठे व्यंजनों की भरमार होती है। ठेकुआ (गुड़ और तिल वाला), मालपुआ (आटे, दूध और गुड़ से बना), खुरमा या गुझिया और थंडाई प्रमुख हैं। कुछ जगहों पर मांसाहारी व्यंजन भी बनते हैं, लेकिन सात्विक भोजन प्रमुख रहता है। होली की रंगबाजी के बाद गरमागरम मालपुआ और ठंडी थंडाई का स्वाद अनोखा होता है।
दिवाली और अन्य त्योहार
दिवाली पर खजुर, खस्ता ठेकुआ, सत्तू के लड्डू और पिट्ठा (मीठे या नमकीन) बनाए जाते हैं। करवा चौथ पर महिलाएं सत्तू का घोल, फल और हल्का भोजन करती हैं। सतुवानी या श्रावणी पूर्णिमा पर सत्तू का सामूहिक भोजन होता है, इसका क्या ही कहना, मजा आ जाता है जब पूरा परिवार के साथ बइठ के खाता है. भोजपुरी समाज में सतुवानी विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दिन सत्तू का सामूहिक भोजन होता है। सत्तू को नमक, नींबू, हरी मिर्च या गुड़ के साथ घोलकर या पराठे बनाकर खाया जाता है। यह पर्व किसानों की मेहनत और मिट्टी से जुड़ाव को दर्शाता है।
पोषण और सादगी का संगम
ये व्यंजन सस्ते, स्थानीय और मौसम के अनुकूल हैं। गर्मियों में सत्तू का घोल शरीर ठंडा रखता है। सर्दियों में घी वाली लिट्टी या रोटी ऊर्जा देती है। सत्तू को आयुर्वेद में त्रिदोष नाशक माना जाता है। ये व्यंजन खेतिहर समाज की जरूरतों को पूरा करते थे और कम खर्च, ज्यादा पोषण और आसान बनाने वाले भी होते हैं।

