बिहार के लाल का कमाल: मात्र 24 की उम्र में 197 देशों की यात्रा कर शुभम कुमार ने रचा इतिहास

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मुंगेर/भागलपुर: जहां अमूमन 24 साल की उम्र में युवा अपने करियर की दिशा तय करने या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे होते हैं, वहीं बिहार के एक छोटे से गांव के रहने वाले शुभम कुमार ने दुनिया नाप कर एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। शुभम ने भारतीय पासपोर्ट पर दुनिया के 197 संप्रभु देशों की यात्रा पूरी कर ली है, और वह भी बिना किसी भारी बैंक बैलेंस या विलासिता के।

गांव की गलियों से ब्राजील के तट तक

मुंगेर और भागलपुर के बीच एक साधारण से गांव में पले-बढ़े शुभम की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। एक सरकारी स्कूल शिक्षक के बेटे शुभम ने अपनी यात्रा महज 17 साल की उम्र में शुरू की थी। हाल ही में ब्राजील (उनका 197वां देश) से साझा किए गए उनके वीडियो ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है।

‘IAS की तैयारी’ का बहाना और हकीकत

शुभम के सफर की शुरुआत संघर्षों भरी थी। उन्होंने एक बार खुलासा किया था कि उन्होंने अपने माता-पिता से झूठ बोला था कि वे दिल्ली जाकर IAS की तैयारी करेंगे, जबकि हकीकत में वे मलेशिया की उड़ान भर चुके थे। यात्रा के जुनून के लिए उन्होंने कोचिंग सेंटर की फीस तक रिफंड करा ली थी ताकि अपने सफर का खर्च निकाल सकें।

बजट ट्रैवल और ‘कमजोर’ पासपोर्ट की चुनौतियां

भारतीय पासपोर्ट के साथ दुनिया घूमना आसान नहीं था। शुभम ने बताया कि उन्हें कई बार वीजा रिजेक्शन और कागजी कार्रवाई के तनाव का सामना करना पड़ा।

  • इक्वाडोर का किस्सा: उनके पास पासपोर्ट में खाली पन्ने खत्म हो गए थे, जिसके कारण उन्हें लगभग डिपोर्ट (देश से बाहर) किया जाने वाला था। वे अब तक 6 पासपोर्ट भर चुके हैं।
  • खतरों से सामना: गैबॉन में उन्हें जासूस समझकर हिरासत में लिया गया, तो मोजाम्बिक में वे विरोध प्रदर्शनों के बीच फंस गए थे।
  • सीमित संसाधन: शुरुआती दिनों में शुभम मात्र 10,000 से 12,000 रुपये महीने में अपना खर्च चलाते थे, जिसमें लिफ्ट मांगना (Hitchhiking) और विदेशों में वॉलेंटियर के रूप में काम करना शामिल था।

डिजिटल दुनिया के चमकते सितारे

आज शुभम किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। यूट्यूब पर उनके 3.2 मिलियन (32 लाख) से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं और इंस्टाग्राम पर 6 लाख से अधिक फॉलोअर्स। उनके ब्लॉग्स को करोड़ों बार देखा जाता है। शुभम का कहना है कि उनकी सफलता यह साबित करती है कि दुनिया घूमने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान या अमीर होना जरूरी नहीं, बल्कि अटूट इरादा चाहिए।

एक मिसाल: भूगोल भाग्य नहीं बदलता

शुभम कुमार की यह यात्रा उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे शहरों या गांवों से आते हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर हौसला बुलंद हो, तो बिहार की धूल भरी सड़कों से शुरू हुआ सफर सात समंदर पार तक जा सकता है।

“शुभम कुमार केवल एक ट्रैवल व्लॉगर नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि आपकी पैदाइश या भाषा आपकी मंजिलों का दायरा तय नहीं कर सकती।”

बिहार के लाल का कमाल: मात्र 24 की उम्र में 197 देशों की यात्रा कर शुभम कुमार ने रचा इतिहास

मुंगेर/भागलपुर: जहां अमूमन 24 साल की उम्र में युवा अपने करियर की दिशा तय करने या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे होते हैं, वहीं बिहार के एक छोटे से गांव के रहने वाले शुभम कुमार ने दुनिया नाप कर एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। शुभम ने भारतीय पासपोर्ट पर दुनिया के 197 संप्रभु देशों की यात्रा पूरी कर ली है, और वह भी बिना किसी भारी बैंक बैलेंस या विलासिता के।

गांव की गलियों से ब्राजील के तट तक

मुंगेर और भागलपुर के बीच एक साधारण से गांव में पले-बढ़े शुभम की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। एक सरकारी स्कूल शिक्षक के बेटे शुभम ने अपनी यात्रा महज 17 साल की उम्र में शुरू की थी। हाल ही में ब्राजील (उनका 197वां देश) से साझा किए गए उनके वीडियो ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है।

‘IAS की तैयारी’ का बहाना और हकीकत

शुभम के सफर की शुरुआत संघर्षों भरी थी। उन्होंने एक बार खुलासा किया था कि उन्होंने अपने माता-पिता से झूठ बोला था कि वे दिल्ली जाकर IAS की तैयारी करेंगे, जबकि हकीकत में वे मलेशिया की उड़ान भर चुके थे। यात्रा के जुनून के लिए उन्होंने कोचिंग सेंटर की फीस तक रिफंड करा ली थी ताकि अपने सफर का खर्च निकाल सकें।

बजट ट्रैवल और ‘कमजोर’ पासपोर्ट की चुनौतियां

भारतीय पासपोर्ट के साथ दुनिया घूमना आसान नहीं था। शुभम ने बताया कि उन्हें कई बार वीजा रिजेक्शन और कागजी कार्रवाई के तनाव का सामना करना पड़ा।

  • इक्वाडोर का किस्सा: उनके पास पासपोर्ट में खाली पन्ने खत्म हो गए थे, जिसके कारण उन्हें लगभग डिपोर्ट (देश से बाहर) किया जाने वाला था। वे अब तक 6 पासपोर्ट भर चुके हैं।
  • खतरों से सामना: गैबॉन में उन्हें जासूस समझकर हिरासत में लिया गया, तो मोजाम्बिक में वे विरोध प्रदर्शनों के बीच फंस गए थे।
  • सीमित संसाधन: शुरुआती दिनों में शुभम मात्र 10,000 से 12,000 रुपये महीने में अपना खर्च चलाते थे, जिसमें लिफ्ट मांगना (Hitchhiking) और विदेशों में वॉलेंटियर के रूप में काम करना शामिल था।

डिजिटल दुनिया के चमकते सितारे

आज शुभम किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। यूट्यूब पर उनके 3.2 मिलियन (32 लाख) से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं और इंस्टाग्राम पर 6 लाख से अधिक फॉलोअर्स। उनके ब्लॉग्स को करोड़ों बार देखा जाता है। शुभम का कहना है कि उनकी सफलता यह साबित करती है कि दुनिया घूमने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान या अमीर होना जरूरी नहीं, बल्कि अटूट इरादा चाहिए।

एक मिसाल: भूगोल भाग्य नहीं बदलता

शुभम कुमार की यह यात्रा उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे शहरों या गांवों से आते हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर हौसला बुलंद हो, तो बिहार की धूल भरी सड़कों से शुरू हुआ सफर सात समंदर पार तक जा सकता है।

‘शुभम कुमार केवल एक ट्रैवल व्लॉगर नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि आपकी पैदाइश या भाषा आपकी मंजिलों का दायरा तय नहीं कर सकती।’

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