अजीत दुबे, राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व भोजपुरी सम्मेलन
भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव की अभिव्यक्ति है। इसके शब्दों में गांव की मिट्टी की खुशबू है, लोकगीतों में जीवन का दर्शन है और साहित्य में समाज की संवेदनाएं हैं। भारत के पूर्वांचल से निकलकर भोजपुरी आज विश्व के अनेक देशों में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है।
मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना, नेपाल और खाड़ी देशों सहित दुनिया के कई हिस्सों में भोजपुरी केवल बोली नहीं जाती, बल्कि वहां के लोगों की सांस्कृतिक विरासत के रूप में जीवित है। प्रवासी भोजपुरी समाज ने अपनी भाषा, लोकगीतों, परंपराओं और संस्कारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाकर इसे वैश्विक पहचान प्रदान की है।
इसके बावजूद भोजपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में अब तक स्थान नहीं मिल पाया है। यह स्थिति करोड़ों भोजपुरी भाषियों के लिए चिंता का विषय है। आज भोजपुरी भाषा की मान्यता की मांग केवल भाषा के सम्मान की नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार और सांस्कृतिक अस्मिता की मांग बन चुकी है।
20 करोड़ लोगों की भाषा को संवैधानिक पहचान का इंतजार
भारत की 2011 की जनगणना में लगभग 5.1 करोड़ लोगों ने भोजपुरी को अपनी मातृभाषा बताया था। भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि व्यवहार में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या इससे कहीं अधिक है और यह लगभग 20 करोड़ तक पहुंचती है। इतनी बड़ी जनसंख्या, समृद्ध साहित्यिक परंपरा और विश्वव्यापी सांस्कृतिक प्रभाव रखने वाली भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलना समय की मांग है।
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भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को शिक्षा, शोध, प्रकाशन, अनुवाद, प्रतियोगी परीक्षाओं और संस्थागत विकास के क्षेत्र में विशेष अवसर प्राप्त होते हैं। भोजपुरी को इस सूची में शामिल करने से भाषा संरक्षण और विकास के नए रास्ते खुलेंगे। यह मांग किसी एक क्षेत्र या समुदाय की नहीं, बल्कि भारत की भाषाई विविधता और सांस्कृतिक लोकतंत्र को मजबूत करने का प्रयास है।
भोजपुरी की मान्यता की मांग किसी भाषा के विरोध में नहीं
भोजपुरी आंदोलन को लेकर कभी-कभी यह भ्रम फैलाया जाता है कि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिलने से हिंदी कमजोर होगी। यह विचार सही नहीं है।
हम सौभाग्यशाली हैं कि हिंदी हमारी राजभाषा है। हमारी इच्छा है कि हिंदी को वैश्विक स्तर पर और मजबूती मिले, हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बने और विश्व मंच पर भारत की भाषाई शक्ति का प्रतिनिधित्व करे। साथ ही हमें गर्व है कि भोजपुरी हमारी मातृभाषा है। हम चाहते हैं कि भोजपुरी भाषा को भी उसका उचित एवं संवैधानिक सम्मान मिले, जैसा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल अन्य 22 भाषाओं को मिला हुआ है।
हिंदी और भोजपुरी के बीच कोई संघर्ष नहीं है। दोनों भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण भाषाई धाराएं हैं। हिंदी देश को जोड़ने वाली व्यापक भाषा है, जबकि भोजपुरी करोड़ों लोगों की भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान है। भोजपुरी को सम्मान देना हिंदी को कमजोर करना नहीं, बल्कि भारत की भाषाई विविधता को मजबूत करना है।
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भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करना क्यों जरूरी है?
भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिलने से इसके विकास के अनेक रास्ते खुलेंगे। विश्वविद्यालयों में भोजपुरी अध्ययन और शोध को बढ़ावा मिलेगा। भोजपुरी साहित्य के संरक्षण और प्रकाशन को नई दिशा मिलेगी। शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में भोजपुरी का विस्तार होगा। भाषा के डिजिटल संसाधनों का विकास तेजी से हो सकेगा। आने वाली पीढ़ियों को अपनी मातृभाषा में ज्ञान अर्जित करने के बेहतर अवसर मिलेंगे।
आज जब दुनिया की भाषाएं तकनीक, डिजिटल मीडिया और शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ रही हैं, तब भोजपुरी को भी आधुनिक संसाधनों से जोड़ना आवश्यक है। संवैधानिक मान्यता भोजपुरी को केवल सम्मान नहीं देगी, बल्कि इसे भविष्य की ज्ञान और तकनीकी भाषा बनने का अवसर भी प्रदान करेगी।
भोजपुरी बने शिक्षा, शोध और ज्ञान-विज्ञान की भाषा
हम लंबे समय से भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए काम कर रहे हैं। उद्देश्य दुनिया भर में बसे भोजपुरी समाज को एक सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ना है। साहित्यिक गोष्ठियों, सम्मान समारोहों, युवा सम्मेलनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शोध गतिविधियों के माध्यम से भोजपुरी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
हमारी कोशिश है कि भोजपुरी केवल घर और समाज की भाषा बनकर सीमित न रहे, बल्कि शिक्षा, शोध और ज्ञान-विज्ञान की भाषा भी बने।
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इस अभियान को मजबूत करने के लिए सांसदों, विधायकों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और सामाजिक संगठनों से संवाद स्थापित किया जा रहा है। हमारा प्रयास है कि भोजपुरी का विषय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सांस्कृतिक अस्मिता का विषय बने।
भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता को लेकर ‘भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता : सवाल, विमर्श, समाधान’ तथा ‘तलाश भोजपुरी भाषायी अस्मिता की’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से भी इस विमर्श को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।
राज्यों में भोजपुरी को संस्थागत पहचान की आवश्यकता
हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में भोजपुरी सहित अवधी, ब्रज और बुंदेली जैसी भाषाओं को विधानसभा स्तर पर सम्मान देने की पहल हुई है। इसी प्रकार बिहार, दिल्ली और अन्य राज्यों में भी भोजपुरी को संस्थागत पहचान दिलाने के लिए प्रयास तेज होने चाहिए।
हमने बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार तथा बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश कुमार तिवारी को पत्र लिखकर भोजपुरी को सम्मान देने की मांग की है। इसी क्रम में दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता को भी पत्र भेजकर भोजपुरी को उचित स्थान देने का आग्रह किया गया है। बिहार के बक्सर से विधायक आनंद मिश्रा द्वारा बिहार विधानसभा में भोजपुरी भाषा और कैथी लिपि से जुड़े विषय उठाना एक सकारात्मक पहल है। हमें आशा है कि बिहार सरकार इस दिशा में गंभीर प्रयास करेगी।
भोजपुरी की सबसे बड़ी चुनौती है मानसिकता
भोजपुरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसकी समृद्धि नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता है। आज भी कई परिवारों में बच्चों को भोजपुरी बोलने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता। कुछ लोग भोजपुरी को केवल मनोरंजन तक सीमित समझते हैं, जबकि इसकी साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा अत्यंत समृद्ध है।
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भोजपुरी भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिश्र और राहुल सांकृत्यायन जैसे महान व्यक्तित्वों की भाषा है। लोकनाट्य, लोकगीत, कविता, कहानी और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में भोजपुरी का योगदान अमूल्य है। हमें भोजपुरी को केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध और आधुनिक तकनीक से जोड़ना होगा।
युवा पीढ़ी के हाथ में भोजपुरी का भविष्य
डिजिटल युग में युवाओं के पास भोजपुरी को विश्व स्तर तक पहुंचाने का बड़ा अवसर है। युवा भोजपुरी में गुणवत्तापूर्ण लेखन, पत्रकारिता, पॉडकास्ट, फिल्म, शोध और डिजिटल सामग्री तैयार कर भाषा को नई ऊंचाई दे सकते हैं।
भोजपुरी को सम्मान दिलाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है। घर में भोजपुरी बोलना, बच्चों को भोजपुरी सिखाना, भोजपुरी साहित्य पढ़ना और सकारात्मक भोजपुरी सामग्री को बढ़ावा देना इस अभियान के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
संघर्ष जारी रहेगा, लक्ष्य है संवैधानिक सम्मान
भोजपुरी ने अपनी क्षमता हर स्तर पर साबित की है। इसकी सांस्कृतिक शक्ति, साहित्यिक समृद्धि और वैश्विक उपस्थिति किसी प्रमाण की मोहताज नहीं है। अब आवश्यकता केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवैधानिक पहल की है। भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना किसी भाषा या क्षेत्र विशेष पर कृपा नहीं होगी, बल्कि भारतीय संविधान की भावना के अनुरूप भाषाई न्याय होगा। जिस दिन भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलेगा, वह दिन केवल भोजपुरी भाषियों की जीत नहीं होगी, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और भाषाई लोकतंत्र की ऐतिहासिक विजय होगी।
भोजपुरी के सम्मान की यह लड़ाई किसी के विरोध में नहीं, बल्कि अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान के अधिकार के लिए है। भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिलनी ही चाहिए। …जय भोजपुरी


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