लिट्टी-चोखा की कहानी: चंद्रगुप्त मौर्य के सैनिक युद्ध में साथ रखते थे लिट्टी

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नई दिल्ली/पटना: गोइठा की धीमी आंच पर सेंकी लिट्टी, उसमें भरा सत्तू का मसालेदार भराव, और साथ में आग पर भुने बैंगन-आलू-टमाटर का स्मोकी चोखा… एक कौर मुंह में जाते ही भोजपुरी इलाके की पूरी कहानी जीवंत हो उठती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और झारखंड के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में ये व्यंजन सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति, संघर्ष और समृद्धि की कहानी बयां करते हैं।

सैनिक युद्ध में साथ रखते थे लिट्टी भोजपुरी भाषी क्षेत्रों का बदलता फूड हैबिट, ‘मॉडर्न’ Food का कहर
लिट्टी-चोखा की जड़ें प्राचीन मगध साम्राज्य तक जाती हैं। इतिहासकार बताते हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य के सैनिक युद्ध के दौरान इसे साथ रखते थे। लंबी यात्राओं में खराब न होने वाला, पौष्टिक और आसानी से बनने वाला यह भोजन सैनिकों की ताकत का सहारा था। 1857 की क्रांति में भी विद्रोही इसे जंगलों में खाते थे। सत्तू (भुने चने का आटा) प्रोटीन और फाइबर से भरपूर है, जो पूरे दिन की मेहनत के लिए ऊर्जा देता है। सरसों के तेल, लहसुन, अजवाइन और हरी मिर्च के साथ बना चोखा इसे अनोखा स्वाद देता है।

गर्मी में सत्तू का घोल शरीर को ठंडक पहुंचाता
भोजपुरी घरों में सत्तू का इस्तेमाल बहुत व्यापक रहा है। गर्मियों में सत्तू का घोल (नमक, नींबू या गुड़ मिलाकर) शरीर को ठंडक पहुंचाता। किसान और मजदूर सुबह-सुबह सत्तू पराठा या सत्तू चाट खाकर खेतों को रवाना होते। आज भी बुजुर्ग कहते हैं कि ‘सत्तू खाओ, ताकत पाओ।’
ठेकुआ भोजपुरी त्योहारों का राजा है। छठ पूजा के दौरान महिलाएं चावल के आटे, गुड़ और घी से ठेकुआ बनाती हैं। सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद यह प्रसाद के रूप में पूरे परिवार को बांटा जाता है। ठेकुआ की खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती है। होली में मांसाहारी व्यंजन और थंडाई के साथ मीठे व्यंजन परोसे जाते हैं।

शादी में परोरा और कटहल की तरकारी के का बात भोजपुरियों का परदेस में पसीना से देश में समृद्धि 2 लाख करोड़ से अधिक की तरक्की
शादियों में भोजपुरी थाली की अपनी अलग शान होती है। दाल-भात, परवल (परोरा) की सब्जी, कटहल की तरकारी, घुघनी, दही पूरी और अंत में मालपुआ या खुरमा। दाल पिठी (दाल में गेहूं की छोटी-छोटी गोली) सर्दियों का खास व्यंजन है। मक्के या ज्वार की रोटी के साथ सरसों का साग या पंचफोड़न वाली सब्जियां (लौकी, कुम्हड़ा, नेनुआ) रोजमर्रा का भोजन रहता था। ये व्यंजन मौसम के अनुकूल और स्थानीय सामग्री पर आधारित थे। ग्रीष्म में हल्का सत्तू, वर्षा में दाल-चावल और शीत में घी वाली लिट्टी या रोटी। आयुर्वेद में भी सत्तू को त्रिदोष नाशक माना जाता है। यह कम खर्च में ज्यादा पोषण देता था, जो खेतिहर समाज के लिए वरदान था।

‘बिहारी थाली’ फैशन में लेकिन बहुत कुछ छूट रहा
आज बदलते समय में ये व्यंजन चुनौती का सामना कर रहे हैं। शहरों में फास्ट फूड और प्रोसेस्ड आइटम्स ने युवाओं का ध्यान खींच लिया है। माइग्रेशन के कारण घरेलू रसोई में पारंपरिक स्वाद कम हो रहा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि लिट्टी-चोखा अब पूरे देश में लोकप्रिय हो रहा है। दिल्ली, मुंबई के रेस्टोरेंट्स में ‘बिहारी थाली’ ट्रेंड कर रही है। कई शेफ इसे आधुनिक ट्विस्ट दे रहे हैं जैसे बेक्ड लिट्टी, सत्तू स्मूदी या हेल्दी ठेकुआ।

सस्ते में अच्छा खाना है भोजपुरी व्यंजन
भोजपुरी व्यंजनों का सबसे बड़ा गुण उनकी सादगी है। इन्हें बनाने के लिए महंगे सामान की जरूरत नहीं। सिर्फ मिट्टी का चूल्हा, गोइठा की आग और दिल से बनाया गया प्यार काफी है। ये व्यंजन हमें याद दिलाते हैं कि असली स्वाद जड़ों में छिपा होता है। पीएम मोदी से लेकर कई सेलिब्रिटी तक लिट्टी-चोखा के प्रशंसक हैं। लेकिन असली महत्व तब समझ आएगा जब हम इन्हें रोजमर्रा की थाली में शामिल करेंगे। स्कूलों में पोषण शिक्षा, स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को प्रशिक्षण और किसानों को सत्तू-ज्वार की खेती के लिए प्रोत्साहन देकर हम इस विरासत को बचा सकते हैं। भोजपुरी पारंपरिक व्यंजन सिर्फ खाना नहीं, हमारी पहचान हैं। जब तक गोइठा की आग जलती रहेगी और सत्तू की महक फैलती रहेगी, तब तक भोजपुरी संस्कृति जिंदा रहेगी। अगली बार जब लिट्टी चोखा खाएं, तो याद रखें कि यह एक व्यंजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी मिट्टी की कहानी है।

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