भोजपुरी गीतों को सिनेमा तक पहुंचाने वाले साहित्य साधक मोती बीए की कहानी

Date:

आज भोजपुरी के महान कवि मोती बीए की 107वीं जयंती है। Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला में आज पढ़िए उस महान कवि, गीतकार, साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी की कहानी, जिन्होंने भोजपुरी भाषा और साहित्य को नई पहचान दिलाई। मोती बीए केवल कवि नहीं थे, बल्कि भोजपुरी चेतना के ऐसे वाहक थे, जिन्होंने अपनी लेखनी से लोकजीवन, समाज और मानवीय संवेदनाओं को स्वर दिया। उन्होंने भोजपुरी गीतों को पहली बार बड़े पर्दे तक पहुंचाया और फिल्मी दुनिया में भोजपुरी भाषा की मजबूत दस्तक दी।

कवि, कलाकार, पत्रकार, शिक्षक और स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी के रूप में मोती बीए का व्यक्तित्व बहुआयामी था। भोजपुरी, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी साहित्य पर समान अधिकार रखने वाले इस साहित्य साधक ने अपनी रचनाओं से भारतीय भाषाओं की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाया। भोजपुरी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2001 में साहित्य अकादमी भाषा सम्मान से सम्मानित किया गया।

नाम के साथ जुड़ गया ‘बीए’, बनी पहचान

मोती बीए का पूरा नाम मोतीलाल उपाध्याय था। उनका जन्म 1 अगस्त 1919 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के बरहज क्षेत्र के निकट बरेजी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम राधाकृष्ण उपाध्याय और माता का नाम कौशल्या देवी था।

1938 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बीए करने के बाद वे कवि सम्मेलनों में चर्चित होने लगे। इसी दौरान उन्होंने अपने नाम के आगे ‘बीए’ जोड़ना शुरू किया और यही उनकी पहचान बन गया। आगे चलकर एमए, बीटी और साहित्य रत्न जैसी उपाधियां हासिल करने के बाद भी ‘मोती बीए’ नाम साहित्य जगत में अमर हो गया।

बचपन से ही कविता की ओर झुका मन

मोती बीए की साहित्यिक प्रतिभा बचपन से ही दिखाई देने लगी थी। महादेवी वर्मा की काव्य रचनाओं से प्रभावित होकर उनकी रचनात्मकता को नई दिशा मिली। उनकी प्रमुख हिन्दी काव्य कृतियों में ‘लतिका’, ‘बादलिका’, ‘समिधा’, ‘प्रतिबिम्बिनी’ और ‘अथेति’ शामिल हैं। 16 साल की उम्र में पहली बार एक कविता दैनिक आज में प्रकाशित हुई। उसकी पंक्तियां थीं- “बिखरा दो ना अनमोल -अरि सखि घूंघट के पट खोल “। जब उन्होंने बीए किया तब तक वे कवि सम्मेलनों में एक गीतकार के रूप में पहचान बना चुके थे। उन्होंने अपने नाम के आगे बीए लगाना शुरू कर दिया। उस समय आज़ादी की जंग जोरो पर थी। अंग्रेज़ों के खिलाफ़ पूरे देश में माहौल बहुत गर्म था। मोती जी भोजपुरी भाषा में क्रांतिकारी गीत लिख लिखकर लोगों को सुनाया करते थे। उसी दौर का उनका एक गीत था –

‘भोजपुरियन के हे भइया का समझेला
खुलि के आवा अखाड़ा लड़ा दिहे सा
तोहरी चरखा पढ़वले में का धईल बा
तोहके सगरी पहाड़ा पढ़ा दिये सा।’

बॉलीवुड में भोजपुरी की पहली गूंज

पत्रकारिता से जुड़ने के बाद भी मोती बीए का मन साहित्य और सृजन में ही रमा रहा। बी.टी. की पढ़ाई के दौरान पंडित सीताराम चतुर्वेदी के सहयोग से उन्हें लाहौर की ‘पंचोली आर्ट्स पिक्चर्स’ में फिल्मी गीत लिखने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने लाहौर और फिर मुंबई में रहते हुए अनेक हिंदी और भोजपुरी फिल्मों के लिए गीत लिखे। इस दौरान उन्होंने अशोक कुमार, किशोर साहू जैसे फिल्म जगत के प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ काम किया। गीतकार होने के साथ-साथ उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

मोती बी.ए.: Moti B.A (Makers of Indian Literature)

मोती बीए को हिंदी सिनेमा में भोजपुरी गीतों की शुरुआत करने वाले रचनाकार के रूप में याद किया जाता है। वर्ष 1948 में प्रदर्शित दिलीप कुमार और कामिनी कौशल अभिनीत फिल्म ‘नदिया के पार’ के लिए लिखा गया उनका गीत ‘कठवा के नइया बनइहे रे मलहवा’ बॉलीवुड का पहला भोजपुरी गीत माना जाता है। इसी फिल्म का उनका एक और गीत ‘मोरे राजा हो, ले चल नदिया के पार’ उस दौर का सुपरहिट गीत बना और भोजपुरी भाषा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में मील का पत्थर साबित हुआ। इसके अलावा उन्होंने ‘कैसे कहूं’, ‘साजन’, ‘सिन्दूर’, ‘राम विवाह’, ‘गजब भइले रामा’, ‘चम्पा चमेली’ और ‘ठकुराइन’ जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे और अभिनय भी किया।

‘नदिया के पार’ में उनकी एक गजल खासी चर्चित हुई थी, जिसका बोल था ‘हमको तुम्हारा ही आसरा, तुम हमारे हो न हो…।’ इसके अलावा फिल्म साजन, कैसे कहूं, राजपूत, राम विवाह, गजब भइले रामा, वीर घटोत्कच जैसी फिल्मों में अभिनय के साथ गीत भी लिखे। उनका जीवन गीत सागर में ही डूबता-उतराता रहा। वह लिखते हैं- ‘आंसुओं के पार से गाकर मुझे किसने पुकार, गीत जीवन का सहारा।’ उन्होंने 1944 से लेकर 1951 तक पंचोली आर्ट्स पिक्चर्स लाहौर, फिल्मिस्तान लिमिटेड, बम्बई, प्रकाश पिक्चर्स, बम्बई के गीतकार के रूप में ‘नदिया के पार’ के अलावा ‘कैसे कहूँ’, ‘साजन’, ‘सिन्दूर’, ‘रिमझिम’, ‘सुभद्रा’ इत्यादि अनेक फिल्मों में गीत लिखे। इसके बाद 1984-85 में भोजपुरी फिल्म ‘गजब भइलें रामा’ ‘चम्पा चमेली’ ‘ठकुराइन’ इत्यादि में गीत लेखन के साथ ही उन्होंने अभिनय भी किया। आकाशवाणी तथा दूरदर्शन बम्बई, इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर से काव्य पाठ तथा अनेक स्वरचित लोक संगीतिकाओं का प्रसारण होता रहा।

भोजपुरी साहित्य को मिली अमूल्य धरोहर

मोती बीए का साहित्यिक योगदान जितना व्यापक था, उतना सम्मान उन्हें अपने समय में नहीं मिल सका। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय और डॉ. रामचन्द्र तिवारी जैसे विद्वानों ने भी स्वीकार किया कि हिन्दी साहित्य जगत ने उनके रचनात्मक अवदान का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। इसके बावजूद भोजपुरी समाज में वे हमेशा अत्यंत सम्मानित रहे और आज भी उनके गीत लोकजीवन में उसी आत्मीयता से गूंजते हैं।

मोती बीए ने भोजपुरी साहित्य को कई महत्वपूर्ण कृतियां दीं। उनकी प्रमुख भोजपुरी रचनाओं में ‘सेमर के फूल’, ‘तुलसी रसायन’, ‘भोजपुरी सानेट’, ‘भोजपुरी मुक्तक’, ‘मोती के मुक्तक’ और ‘मेघदूत’ (भोजपुरी काव्यानुवाद) शामिल हैं। उनके प्रसिद्ध भोजपुरी गीतों में ‘असो आइल महुआबारी में बहार सजनी’, ‘कटिया के आइल सुतार’, ‘तिसिया के रंग सरसइया के सारी’, ‘कहवां से आइल अन्हरिया सुरुज दियना बारेले हो’ और ‘सनन सनन सन बहेले पुरवइया’ प्रमुख हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन में भी निभाई भूमिका

मोती बीए केवल साहित्यकार नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी भी रहे। 1942 के आंदोलन के दौरान उन्हें गोरखपुर और बनारस की जेलों में नजरबंद रखा गया। उन्होंने अपने क्रांतिकारी गीतों के माध्यम से लोगों में स्वतंत्रता की भावना जगाने का कार्य किया। उनकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम और सामाजिक चेतना के स्वर स्पष्ट दिखाई देते हैं।

पत्रकारिता से अध्यापन तक का सफर

आजादी के दौर में मोती बीए पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के दैनिक पत्र ‘अग्रगामी’, शिवप्रसाद गुप्त के ‘आज’ और ‘संसार’ के संपादकीय विभाग से जुड़े रहे। फिल्मी दुनिया से वापस लौटने के बाद उन्होंने शिक्षा क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। वर्ष 1952 से 1980 तक वे श्रीकृष्ण इंटर कॉलेज, बरहज में इतिहास, अंग्रेजी और तर्कशास्त्र के प्रवक्ता रहे। वर्ष 1978 में उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘आदर्श अध्यापक पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

भाषाओं के बीच बनाया साहित्यिक सेतु

मोती बीए हिन्दी, भोजपुरी, उर्दू और अंग्रेजी के सशक्त रचनाकार थे। उन्होंने अंग्रेजी कविताओं का हिन्दी और भोजपुरी में अनुवाद किया। शेक्सपीयर के सॉनेट्स और कालिदास के ‘मेघदूत’ का भोजपुरी पद्यानुवाद उनके साहित्यिक कौशल का उदाहरण है।

मिले कई प्रतिष्ठित सम्मान

मोती बीए के बहुआयामी साहित्यिक और शैक्षिक योगदान के लिए उन्हें जीवनभर दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों से नवाजा गया। इनमें उत्तर प्रदेश शासन का ‘राज्य साहित्यिक पुरस्कार’ (1973-74) ‘समिधा’ पुस्तक के लिए, ‘आदर्श अध्यापक’ पुरस्कार (1978), उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का ‘राहुल सांस्कृत्यायन पुरस्कार’ (1984), हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की ‘भोजपुरी रत्न’ उपाधि (1992), ‘श्रुतिकीर्ति’ सम्मान (1997), विश्व भोजपुरी सम्मेलन, भोपाल का ‘सेतु’ सम्मान (1998), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली का भोजपुरी के लिए प्रथम ‘भाषा सम्मान’ (2001-02), ‘किसलय’ सम्मान (2005) तथा ‘सरयूरत्न’ सम्मान (2005) प्रमुख हैं। ये सम्मान उनके साहित्य, शिक्षा और भोजपुरी भाषा के प्रति आजीवन समर्पण के प्रमाण हैं।

भोजपुरी साहित्य के अमर पुरोधा

18 जनवरी 2009 को मोती बीए का निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक चेतना में जीवित हैं। उन्होंने यह साबित किया कि लोकभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संस्कृति और पहचान की वाहक होती है।

आज जब भोजपुरी अपनी वैश्विक पहचान बना रही है, तब मोती बीए जैसे साहित्यकारों का योगदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने भोजपुरी को कविता से मंच तक, लोकजीवन से साहित्य तक और गांव से सिनेमा तक पहुंचाने का ऐतिहासिक कार्य किया। इसीलिए मोती बीए केवल एक कवि या गीतकार नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता, साहित्य और संस्कृति के अमर पुरोधा हैं।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

‘गंगा रतन बिदेसी’ भोजपुरी उपन्यास में प्रवासी जीवन की पीड़ा

समीक्षक: प्रकाश प्रियांशु भोजपुरी साहित्य धारा में उपन्यास विधा अपेक्षाकृत...

भोजपुरी में पढ़ाई जाएंगी कबीर की उलटबांसियां, नए सिलेबस में कबीर से पत्रकारिता तक

पटना। बिहार के विश्वविद्यालयों में भोजपुरी से स्नातक करने...

भोजपुरी बोलना शर्म नहीं, गर्व की बात है

भाषा सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं होती, वह किसी...