Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय भोजपुरी भाषा और साहित्य के ऐसे शख्सियत से, जिन्होंने अपनी लेखनी को केवल कविता और कहानी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि भोजपुरी भाषा की वैज्ञानिकता, उसकी संवैधानिक मान्यता, मानक व्याकरण, भाषायी अस्मिता और अकादमिक प्रतिष्ठा के लिए आजीवन संघर्ष किया। डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ उन चुनिंदा साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने भोजपुरी को भावनात्मक आग्रह से निकालकर वैचारिक और शोधपरक विमर्श के केंद्र में स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।
आज जब भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता, मानक भाषा और उसके भविष्य को लेकर देशभर में बहस हो रही है, तब डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ का नाम सबसे विश्वसनीय और गंभीर अध्येताओं में लिया जाता है। वे कवि, कथाकार, भाषाविद्, समालोचक, शिक्षक, संपादक और सबसे बढ़कर भोजपुरी भाषा की अस्मिता के सजग प्रहरी हैं। पिछले चार दशकों से वे भोजपुरी भाषा को अकादमिक, साहित्यिक और संवैधानिक स्तर पर प्रतिष्ठित करने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।
गांव की चौपाल से विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष तक का सफर
1 नवम्बर 1969 को बिहार के सारण (छपरा) जिले के मशरक प्रखंड अंतर्गत चरिहारा गांव में जन्मे डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ का बचपन भोजपुरी लोकसंस्कृति और साहित्यिक वातावरण के बीच बीता। उनके पिता श्री शिवशंकर सिंह और माता श्रीमती कौशल्या देवी ने उन्हें भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और शिक्षा के संस्कार दिए।
ये भी पढ़ें- भोजपुरी के पास है आठवीं अनुसूची में शामिल होने ले लिए समृद्ध व्याकरण परंपरा, विरोध गलत
उनका गांव चरिहारा केवल एक गांव नहीं, बल्कि शिक्षकों, साहित्यकारों और सैनिकों की समृद्ध परंपरा वाला सांस्कृतिक केंद्र रहा है। गांव की कवि गोष्ठियां, लोकगीत, भजन-कीर्तन, लोकनाटक और सांस्कृतिक आयोजन उनके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।

बचपन में वे स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। महेन्द्र मिश्र, भिखारी ठाकुर, खलील और संतराज सिंह ‘रागेश’ जैसे गीतकारों के गीत सुनते-सुनते उनके भीतर भी एक कवि जन्म लेने लगा। वे बताते हैं कि स्कूल में गीतों की अंत्याक्षरी प्रतियोगिताओं में अपनी टीम को जिताने के लिए तत्काल गीत लिखने की कोशिश किया करते थे। यही बाल-सृजन आगे चलकर उन्हें भोजपुरी साहित्य का एक बड़ा नाम बना गया।
जौहर शफियाबादी की एक सलाह ने बदल दी जीवन की दिशा
डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ के साहित्यिक जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब वरिष्ठ साहित्यकार जौहर शफियाबादी ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उनसे कहा-
‘तुम हिन्दी में नहीं, भोजपुरी में लिखो। भोजपुरी तुम्हारी मातृभाषा है। जितनी दूर तक दौड़ सकते हो, भोजपुरी में तुम्हारे लिए उतनी ही जमीन खाली है।’
ये भी पढ़ें-सांविधानिक दर्जा की आस में भोजपुरी, छह दशक से सिर्फ आंदोलन और इंतजार
यह सलाह उनके जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई। उन्होंने हिन्दी के साथ-साथ भोजपुरी में गंभीर लेखन शुरू किया और बाद में अपना संपूर्ण साहित्यिक जीवन भोजपुरी भाषा और साहित्य को समर्पित कर दिया।
उनकी पहली चर्चित भोजपुरी रचना थी-
‘नयना नीर रतन रस मातल,
छलकल नयन गगरिया मोर…’
इस गीत को मंचों पर मिली प्रशंसा ने उन्हें एक कवि के रूप में नई पहचान दी।

भोजपुरी को भावनाओं से निकालकर भाषा विज्ञान का विषय बनाया
भोजपुरी भाषा के साथ सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि उसे लंबे समय तक केवल लोकगीतों और फिल्मों की भाषा मानकर देखा जाता रहा। डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ उन साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने भोजपुरी को भाषा विज्ञान और अकादमिक अध्ययन के दायरे में स्थापित किया।
उन्होंने भोजपुरी भाषा की संरचना, व्याकरण, विकास यात्रा, भाषायी स्वरूप और संवैधानिक अधिकारों पर गहन शोध किया है। उनका मानना है कि किसी भी भाषा का भविष्य केवल उसके बोलने वालों की संख्या से तय नहीं होता, बल्कि उस भाषा में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, व्याकरण और संस्थागत स्वीकृति उसे दीर्घकालिक पहचान प्रदान करती है।
भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता के सबसे मुखर विद्वानों में शामिल
भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग वर्षों से की जा रही है, लेकिन इस विषय पर गंभीर और शोधपरक साहित्य बहुत कम उपलब्ध है। डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक- भोजपुरी भाषा : संवैधानिक मान्यता-समस्या और समाधान, के माध्यम से इस पूरे विमर्श को अकादमिक आधार प्रदान किया है।
ये भी पढ़ें- भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में मिले स्थान, तो बदल सकती है करोड़ों लोगों की तकदीर
वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि ‘भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता की लड़ाई वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों की भाषा, शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान के लिए है।’
उनका कहना है कि यदि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिलती है, तो इसका लाभ केवल भाषा प्रेमियों को नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा, शोध, रोजगार और प्रशासनिक अवसरों के रूप में मिलेगा।
भोजपुरी के मानक व्याकरण के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान
भोजपुरी भाषा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उसका मानकीकरण रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली भोजपुरी की विविधता उसकी ताकत भी है और चुनौती भी।

डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। उनकी पुस्तक ‘मानक भोजपुरी भाषा, व्याकरण और रचना’ आज भोजपुरी भाषा के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।
इसके अलावा उनकी पुस्तक ‘हिन्दी तथा भोजपुरी की व्याकरणिक कोटियाँ : तुलनात्मक अध्ययन’ भोजपुरी के भाषायी अध्ययन को नई दृष्टि प्रदान करती है।
भोजपुरी गद्य साहित्य के गंभीर समालोचक
भोजपुरी साहित्य में कविता और लोकगीतों पर काफी काम हुआ है, लेकिन गद्य साहित्य के क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम कार्य देखने को मिलता है। डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ ने इस कमी को दूर करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।
ये भी पढ़ें- मॉरीशस में भोजपुरी का गला किसने घोंटा?
उनकी चर्चित पुस्तक ‘भोजपुरी गद्य साहित्य : स्वरूप, सामग्री और समालोचना’ भोजपुरी गद्य साहित्य के इतिहास, विकास और आलोचनात्मक अध्ययन को प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जाती है।
कविता से कहानी तक समान अधिकार
डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ केवल भाषाविद् ही नहीं, बल्कि संवेदनशील कवि और कथाकार भी हैं। उनका कविता संग्रह ‘देश-दुनिया’ और कहानी संग्रह ‘भंडारघर’ भोजपुरी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनकी रचनाओं में गांव, समाज, बदलते सांस्कृतिक मूल्य, भाषायी अस्मिता और आमजन के संघर्षों की गहरी छाप दिखाई देती है।
विश्वविद्यालयों में भोजपुरी अध्ययन को मजबूत करने वाले शिक्षक
वर्तमान में डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय के लंगट सिंह महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर में भोजपुरी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने इग्नू, नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय सहित कई संस्थानों के लिए अध्ययन सामग्री तैयार की है। विश्वविद्यालय स्तर पर भोजपुरी अध्ययन के विस्तार में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
संपादन, प्रसारण और संगठनात्मक योगदान
डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ साहित्यिक पत्रिका संपादन से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। उन्होंने ‘उगेन’, ‘भोर’, ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ और ‘रचनात्मक बातचीत’ जैसी पत्रिकाओं के संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी कविताएं, कहानियां और वार्ताएं आकाशवाणी पटना तथा दूरदर्शन पटना एवं मुजफ्फरपुर से प्रसारित होती रही हैं।
वे अनेक साहित्यिक और सामाजिक संगठनों में महत्वपूर्ण दायित्व निभा चुके हैं, जिनमें भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन और भोजपुरी भारती जैसी संस्थाएं प्रमुख हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित
डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ को उनके साहित्यिक और भाषायी योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें-

भोजपुरी गौरव सम्मान
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्मृति सम्मान
रामेश्वर सिंह काश्यप सम्मान
विद्यासागर सारस्वत सम्मान
पंडित बनारसी पाण्डेय स्मृति सम्मान
मधेश सांस्कृतिक प्रतिष्ठान सम्मान (नेपाल)
डॉ. निर्भीक स्मृति सम्मान
सारस्वत सम्मान
जैसे कई सम्मान शामिल हैं।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ को भोजपुरी धुरंधर इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी भाषा के संवैधानिक अधिकार, उसके वैज्ञानिक अध्ययन, मानक व्याकरण, साहित्यिक समृद्धि और अकादमिक प्रतिष्ठा के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया है। वे उन साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने भोजपुरी को केवल भावनात्मक आग्रह की भाषा नहीं माना, बल्कि उसे ज्ञान, शोध और भविष्य की भाषा के रूप में स्थापित करने का सतत प्रयास किया।
भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ उस वैचारिक पुरोधा के रूप में दर्ज हैं, जिनकी कलम भोजपुरी भाषा के सम्मान, उसकी संवैधानिक पहचान और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए निरंतर चलती रही है।
भोजपुरी के भविष्य की लड़ाई अगर संसद से लेकर विश्वविद्यालयों तक लड़ी जा रही है, तो उस लड़ाई के अग्रिम पंक्ति के विद्वानों में डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’ का नाम बड़े अक्षरों में लिखा जाएगा।


डॉ० जयकांत सिंह भोजपुरी भाषा साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। भोजपुरी भाषा साहित्य केन्द्रित विमर्श को नई दिशा देने का कार्य आपने किया है। स्नातकोत्तर भोजपुरी विभाग की स्थापना में आपकी महती भूमिका रही है।
[…] […]