भोजपुरी को अश्लीलता और प्रवासी मजदूरों की भाषा मानने वाली सोच को चुनौती दे रहे युवा कलाकार, लोकसंगीत और आधुनिक संगीत के संगम से नई पहचान बना रही भोजपुरी
पटना/नई दिल्ली। सदियों पुरानी लोक परंपरा, विरह की मार्मिक अभिव्यक्ति और बिहार की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा भोजपुरी लोकगीत ‘कचौड़ी गली’ इन दिनों देशभर में नई पहचान बना रहा है। कोक स्टूडियो भारत में भोजपुरी लोकगायक उत्पल उदित और प्रसिद्ध गायिका रेखा भारद्वाज की प्रस्तुति ने इस गीत को करोड़ों श्रोताओं तक पहुंचा दिया है। इसके साथ ही भोजपुरी भाषा की समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत पर भी राष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई है।
यह लोकगीत ब्रिटिश शासन के दौर की उस पीड़ा को सामने लाता है, जब एक महिला अपने पति को अंग्रेजों की लड़ाई में जाते हुए देखती है। गीत में विरह, उपनिवेशवाद और सामाजिक दर्द की गहरी अभिव्यक्ति है, जिसने श्रोताओं को भावुक कर दिया।
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भोजपुरी की नई पहचान बनाने की कोशिश
उत्पल उदित का कहना है कि भोजपुरी को अक्सर केवल अश्लील गीतों और प्रवासी मजदूरों की भाषा के रूप में देखा जाता है, जबकि इसकी वास्तविक पहचान कहीं अधिक समृद्ध है। उनका उद्देश्य लोगों को यह बताना है कि भोजपुरी लोकसंगीत में इतिहास, समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति मौजूद है।
बिहार के सहरसा जिले के रहने वाले उदित बचपन से ही विभिन्न लोकधुनों के बीच पले-बढ़े। बाद में उन्होंने भोजपुरी के महान लोकनाटककार भिखारी ठाकुर और लोककवि महेंद्र मिसिर की रचनाओं का अध्ययन किया। उनकी प्रस्तुतियों में प्रवास, बिछोह और ग्रामीण जीवन की कहानियां प्रमुखता से दिखाई देती हैं।
भिखारी ठाकुर की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास
उत्पल उदित अपने कार्यक्रमों में अक्सर भिखारी ठाकुर के प्रसिद्ध नाटक ‘बिदेसिया’ के गीत ‘जनि जा बिदेसवा के ओर’ भी प्रस्तुत करते हैं। यह गीत उस स्त्री की व्यथा को व्यक्त करता है, जो अपने पति से रोज़गार की तलाश में घर छोड़कर बाहर न जाने की विनती करती है।
उदित सोशल मीडिया पर अपने गीतों के साथ उनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी साझा करते हैं, ताकि युवा पीढ़ी लोकसंगीत के पीछे छिपे इतिहास को समझ सके।
ख्वाब और उत्पल का लक्ष्य है लोकसंगीत को नई पीढ़ी के लिए आकर्षक और लोकप्रिय बनाना।
कोक स्टूडियो में लोक और आधुनिक संगीत का संगम
‘कचौड़ी गली’ के निर्माता ख्वाब (Khwaab) ने बताया कि उन्होंने इस गीत को आधुनिक संगीत के साथ प्रस्तुत किया, लेकिन इसकी लोक आत्मा को पूरी तरह सुरक्षित रखा। रिकॉर्डिंग में शहनाई, तबला, ढोलक, हारमोनियम और दोतारा जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का उपयोग किया गया, जबकि संगीत संयोजन आधुनिक शैली में तैयार किया गया।
उनका मानना है कि लोकसंगीत को केवल संग्रहालयों तक सीमित रखने के बजाय नई पीढ़ी की पसंद के अनुरूप प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है।
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रैपर शिक्रीवाल भी बदल रहे हैं भोजपुरी की छवि
भोजपुरी संगीत की नई पहचान गढ़ने वालों में रैपर संकेत शिक्रीवाल भी शामिल हैं। वे भोजपुरी को हिप-हॉप, जैज़ और स्पोकन वर्ड जैसी आधुनिक संगीत शैलियों के साथ जोड़ रहे हैं। उनके गीतों में बिहार की लोक संस्कृति के साथ समकालीन सामाजिक मुद्दे, प्रवास और युवाओं की भावनाएं भी प्रमुखता से दिखाई देती हैं।
शिक्रीवाल का कहना है कि जिस तरह पंजाबी संगीत को राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान मिली, उसी तरह भोजपुरी को भी उसकी सांस्कृतिक गरिमा के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए।

शिक्रीवाल के गीतों में जैज़ की धुनों के साथ प्रखर कविता और समाज पर तीखा चिंतन सुनाई देता है।
विश्वभर में बोली जाती है भोजपुरी
भोजपुरी केवल भारत के बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड तक सीमित नहीं है। मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना और नेपाल सहित दुनिया के कई देशों में करोड़ों लोग भोजपुरी बोलते और समझते हैं। इसकी लोकगीत, लोकनाट्य, कविता और मौखिक परंपरा सदियों से भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण धरोहर रही है।
Bhojpuri24.com का दृष्टिकोण
‘कचौड़ी गली’ की सफलता इस बात का संकेत है कि यदि भोजपुरी की मूल सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक प्रस्तुति के साथ दुनिया के सामने रखा जाए, तो यह भाषा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि भारत की ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी स्थापित हो सकती है। यह उपलब्धि भोजपुरी के संवैधानिक सम्मान और वैश्विक पहचान की दिशा में भी एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। (स्रोत: BBC के साथ कलाकारों के साक्षात्कार एवं कोक स्टूडियो भारत में प्रस्तुत सामग्री पर आधारित रिपोर्ट)
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