‘जीना यहां मरना यहां’ लिखने वाले गीतकार शैलेन्द्र का भोजपुरी मिट्टी से था खास नाता

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महज 43 साल की उम्र में दुनिया को कह गए थे अलविदा, भोजपुरी अंचल से जुड़ा था शैलेन्द्र का भावनात्मक रिश्ता. Bhojpuri24.com के स्पेशल सीरीज ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज पढ़ें मशहूर गीतकार शैलेन्द्र के बारे में.

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जो समय के साथ और भी अमर हो जाते हैं। राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर का गीत ‘जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां’ भी उन्हीं कालजयी गीतों में शामिल है। इस गीत को लिखने वाले महान गीतकार शैलेन्द्र भले आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जिंदा हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि शैलेन्द्र का भोजपुरी भाषा और भोजपुरी संस्कृति से गहरा जुड़ाव था। उनकी रचनाओं में आम आदमी की भावनाएं और लोक जीवन की सादगी साफ झलकती थी, जो भोजपुरी समाज की पहचान भी है।

हिंदी सिनेमा को दिए कई अमर गीत

शैलेन्द्र का पूरा नाम शंकरदास केसरीलाल शैलेन्द्र था। उनका जन्म 30 अगस्त 1923 को हुआ था। वे हिंदी फिल्म जगत के सबसे सम्मानित गीतकारों में गिने जाते हैं। राज कपूर, शंकर-जयकिशन और मुकेश के साथ उनकी जोड़ी ने कई यादगार गीत दिए।

उनके लिखे गीतों में ‘मेरा जूता है जापानी’, ‘आवारा हूं’, ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार’, ‘सजन रे झूठ मत बोलो’, ‘सब कुछ सीखा हमने’ और ‘दोस्त दोस्त ना रहा’ जैसे गीत शामिल हैं। इन गीतों की खासियत यह थी कि उनमें साहित्यिक गहराई होने के बावजूद आम लोगों की भाषा और भावनाएं दिखाई देती थीं। यही वजह है कि उनके गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने दशकों पहले थे।

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‘जीना यहां मरना यहां’ गीत की दिलचस्प कहानी

फिल्म मेरा नाम जोकर का मशहूर गीत ‘जीना यहां मरना यहां’ शैलेन्द्र की अंतिम रचनाओं में गिना जाता है। कहा जाता है कि इस गीत को लिखने का काम पूरी तरह समाप्त होने से पहले ही उनका निधन हो गया था। बाद में उनके बेटे शैले शैलेन्द्र ने गीत को पूरा करने में योगदान दिया।

यह गीत केवल एक फिल्मी गीत नहीं बल्कि जीवन का दर्शन बन गया। इसमें इंसान के संघर्ष, सपनों और जीवन के सफर को बेहद सरल शब्दों में बयां किया गया है। यही कारण है कि आज भी यह गीत सुनते ही लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।

‘तीसरी कसम’ ने बढ़ाई मुश्किलें

शैलेन्द्र केवल गीतकार ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने फिल्म निर्माण में भी कदम रखा था। उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी पर आधारित फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किया। इस फिल्म में राज कपूर और वहीदा रहमान मुख्य भूमिका में थे।

हालांकि फिल्म को बाद में क्लासिक का दर्जा मिला और राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, लेकिन रिलीज के समय यह व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हो सकी। फिल्म निर्माण में हुए भारी आर्थिक नुकसान ने शैलेन्द्र को गहरे तनाव में डाल दिया। आर्थिक दबाव और लगातार बिगड़ती सेहत ने उनके जीवन पर गंभीर असर डाला।

43 साल की उम्र में थम गई कलम, लेकिन अमर हो गए शब्द

14 दिसंबर 1966 को महज 43 वर्ष की आयु में शैलेन्द्र का निधन हो गया। इतनी कम उम्र में दुनिया छोड़ने के बावजूद उन्होंने भारतीय सिनेमा को ऐसी विरासत दी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

भोजपुरी समाज के लिए भी शैलेन्द्र गर्व का विषय हैं। उनकी लेखनी में लोकजीवन की खुशबू, आम आदमी का दर्द और मिट्टी से जुड़ी संवेदनाएं साफ दिखाई देती हैं। यही कारण है कि आज भी उनके गीत पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।

‘जीना यहां मरना यहां’ जैसे गीतों के जरिए शैलेन्द्र ने साबित कर दिया कि सच्ची कला कभी नहीं मरती। इंसान भले दुनिया से चला जाए, लेकिन उसके शब्द और विचार हमेशा जीवित रहते हैं। शैलेन्द्र की रचनाएं इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

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भोजपुरी सिनेमा और लोकभाषा से भी था गहरा जुड़ाव

शैलेन्द्र सिर्फ हिंदी फिल्मों के महान गीतकार ही नहीं थे, बल्कि भोजपुरी भाषा और संस्कृति के भी बड़े समर्थक थे। जब भोजपुरी सिनेमा अपने शुरुआती दौर में था, तब उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के लिए भी गीत लिखे। साल 1963 में रिलीज हुई पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के गीतों में उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। इस फिल्म ने भोजपुरी सिनेमा की नींव मजबूत करने का काम किया था।

भोजपुरी लोकजीवन, गांव-घर की संस्कृति, रिश्तों की मिठास और आम आदमी की भावनाओं को शैलेन्द्र अपनी रचनाओं में बेहद सहजता से उतारते थे। यही वजह थी कि उनके लिखे गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बने, बल्कि समाज और मिट्टी की खुशबू को भी लोगों तक पहुंचाते रहे।

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शैलेन्द्र का मानना था कि भारतीय भाषाओं की असली ताकत उनकी लोकसंस्कृति में छिपी है। भोजपुरी के प्रति उनका प्रेम उनकी रचनात्मक सोच में साफ दिखाई देता है। यही कारण है कि आज भी भोजपुरी जगत में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। हिंदी सिनेमा में अपार सफलता हासिल करने के बावजूद उन्होंने अपनी लोकभाषाई जड़ों को कभी नहीं भुलाया।

भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में जब भी शुरुआती दौर के योगदानकर्ताओं का जिक्र होगा, तब शैलेन्द्र का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। उनकी लेखनी ने यह साबित किया कि लोकभाषा में भी विश्वस्तरीय संवेदनाएं और साहित्यिक गहराई मौजूद होती है।

बिहार और पाकिस्तान से भी नाता

गीतकार शैलेन्द्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था, लेकिन उनकी पारिवारिक जड़ें बिहार से जुड़ी थीं। उनके पूर्वज बिहार के भोजपुर क्षेत्र से संबंध रखते थे, जिसके कारण भोजपुरी भाषा और लोकसंस्कृति के प्रति उनका विशेष लगाव था। उनके पिता केसरीलाल सेना में कार्यरत थे। बाद में परिवार मथुरा में बस गया। शैलेन्द्र का विवाह शकुंतला देवी से हुआ था और उनके पुत्र शैले शैलेन्द्र भी साहित्य एवं फिल्म जगत से जुड़े। भोजपुरी मिट्टी से जुड़ाव के कारण उन्होंने भोजपुरी सिनेमा और लोकभाषा को भी अपनी रचनाओं में सम्मानजनक स्थान दिया।

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