गांव की मिट्टी से निकली लोकसंगीत की आवाज
गोरखपुर: देवरिया जनपद के करौंदी (भलुअनी) गांव की सुबहें कभी लोकगीतों की मधुर धुनों से गूंजती थीं। खेतों में काम करते किसान, आंगन में गीत गाती महिलाएं और पर्व-त्योहारों पर गांव की सामूहिक संस्कृति आदि इन्हीं ध्वनियों और संस्कारों के बीच राकेश उपाध्याय का बचपन बीता। यही लोकधुनें आगे चलकर उनकी पहचान बन गईं।
आज राकेश उपाध्याय भोजपुरी लोकगायन का एक प्रतिष्ठित नाम हैं। वर्तमान में वे गोरखनाथ की पावन नगरी गोरखपुर में रहकर अपनी सांस्कृतिक सेवा दे रहे हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन केंद्र गोरखपुर के ‘ए’ श्रेणी के लोकगायक के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है।
लगभग चार दशकों से वे भोजपुरी लोकसंगीत की उस परंपरा को जीवित रखने में लगे हैं, जो तेजी से आधुनिकता और बाजारवाद के बीच कमजोर पड़ती जा रही है। उनके गीतों में गांव की मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन की सहजता और भारतीय संस्कृति की आत्मा सुनाई देती है।
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लोकगीतों को बनाया जीवन का मिशन
राकेश उपाध्याय के लिए लोकगायन केवल कला नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक मिशन है। वे मानते हैं कि लोकगीत किसी समाज की पहचान और उसकी आत्मा होते हैं। यही कारण है कि उन्होंने अपने पूरे जीवन को भोजपुरी लोकसंस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित कर दिया।

वे पारंपरिक शैली में लोकगीत गाने के लिए जाने जाते हैं। विवाह गीत, कजरी, सोहर, बिरहा, फगुआ और संस्कार गीतों की प्रस्तुति में उनकी विशेष पकड़ है। उनके गीतों में कृत्रिमता नहीं, बल्कि लोकजीवन की सहज संवेदनाएं दिखाई देती हैं।
राकेश उपाध्याय लगातार शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यशालाएं आयोजित कर युवा पीढ़ी को लोककला से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इन कार्यशालाओं में युवाओं को भोजपुरी लोकगीतों की परंपरा, उसके अर्थ और प्रस्तुति की बारीकियों के बारे में बताया जाता है। उनका मानना है कि यदि नई पीढ़ी अपनी लोकसंस्कृति से दूर हो गई, तो समाज अपनी जड़ों से कट जाएगा।
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आकाशवाणी से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर
लोकगायन की दुनिया में राकेश उपाध्याय का सफर छोटे मंचों से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचा। आकाशवाणी और दूरदर्शन गोरखपुर से जुड़ने के बाद उनकी पहचान तेजी से बढ़ी। उनकी आवाज ने लाखों श्रोताओं को भोजपुरी लोकसंगीत से जोड़ा।

धीरे-धीरे उनकी प्रस्तुतियां देश की सीमाओं को पार करने लगीं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के डरबन, ओमान के मस्कट, नीदरलैंड, बैंकॉक, सिंगापुर और फिजी जैसे देशों में भारतीय लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व किया।
हाल ही में फिजी में आयोजित गिरमिटिया समारोह में उनकी प्रस्तुति को विशेष सराहना मिली। विदेशों में बसे भारतीयों के बीच जब उन्होंने भोजपुरी लोकगीत गाए, तो श्रोताओं की आंखों में अपनी मिट्टी और गांव की यादें ताजा हो उठीं। उनके गीतों ने प्रवासी भारतीयों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम किया।
राकेश उपाध्याय मानते हैं कि लोकसंगीत की भाषा भले क्षेत्रीय हो, लेकिन उसकी संवेदनाएं सार्वभौमिक होती हैं। यही कारण है कि उनके गीत दुनिया के किसी भी कोने में श्रोताओं के दिल को छू लेते हैं।
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सम्मान और उपलब्धियों से सजा सफर
भोजपुरी लोकगायन के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके लंबे सांस्कृतिक संघर्ष और लोकसंगीत के प्रति समर्पण की पहचान है।

इसके अलावा देश-विदेश की कई सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित किया है। हालांकि राकेश उपाध्याय का कहना है कि उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान श्रोताओं का प्रेम और लोकसंस्कृति के प्रति लोगों का जुड़ाव है।
वे कहते हैं कि जब कोई युवा उनके गीतों को सीखने की इच्छा जताता है या कोई बुजुर्ग उनके गीत सुनकर अपने गांव की यादों में खो जाता है, तब उन्हें लगता है कि उनकी साधना सफल हो रही है।

कोरोना काल में कला से दिया लोगों को सहारा
कोरोना महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया भय और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही थी, तब भी राकेश उपाध्याय ने अपनी कला को समाज से जोड़े रखा। लॉकडाउन के समय जब सांस्कृतिक गतिविधियां पूरी तरह बंद हो गई थीं, तब उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक लोकसंगीत पहुंचाने का काम शुरू किया।
उन्होंने विभिन्न ऑनलाइन कार्यक्रमों के जरिए देशभर के कलाकारों को एक मंच पर जोड़ा और लोगों का मनोरंजन करने के साथ उन्हें मानसिक संबल देने का कार्य किया। उस कठिन दौर में उनके लोकगीत लोगों के लिए उम्मीद और सकारात्मकता का माध्यम बने।
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इस सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान के लिए उन्हें वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, लंदन की ओर से सम्मान पत्र प्रदान किया गया। यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और कठिन समय में सहारा देने की शक्ति भी रखती है।
लोकसंस्कृति की गरिमा बचाने की चुनौती
आज भोजपुरी संगीत तेजी से व्यावसायिकता की ओर बढ़ रहा है। फूहड़ता और तड़क-भड़क के बीच पारंपरिक लोकगीतों की मिठास कहीं खोती जा रही है। ऐसे समय में राकेश उपाध्याय जैसे कलाकार लोकसंस्कृति की गरिमा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

वे मानते हैं कि भोजपुरी की असली ताकत उसकी संस्कृति, संवेदना और सामाजिक मूल्यों में है। यदि लोकगीतों की आत्मा खत्म हो गई, तो भोजपुरी संगीत अपनी पहचान खो देगा।
राकेश उपाध्याय का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्ची कला समय और सीमाओं से परे होती है। वे केवल एक लोकगायक नहीं, बल्कि भोजपुरी संस्कृति के ऐसे प्रहरी हैं, जो अपनी आवाज से आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का काम कर रहे हैं।
उनकी लोकधुनों में आज भी गांव की मिट्टी की महक, भारतीय संस्कारों की गर्माहट और लोकजीवन की सादगी जीवित है।

