26 फरवरी 1873। कोलकाता के बंदरगाह पर हजारों आंखें नम थीं। कोई अपनी मां का हाथ पकड़कर रो रहा था, कोई पत्नी की गोद में सोए बच्चे को आखिरी बार देख रहा था। कई लोगों को यह तक नहीं पता था कि वे किस देश जा रहे हैं। उन्हें सिर्फ इतना बताया गया था कि वहां काम है, पैसा है, जिंदगी सुधर जाएगी।
‘26 फरवरी, 1873 को, लल्ला रूख नामक जहाज 410 यात्रियों के साथ सूरीनाम घाट से रवाना हुआ। इनमें से लगभग सभी यात्री उत्तर प्रदेश और बिहार के मूल स्थानों से थे। सूरीनाम में गन्ने के बागानों के मालिक डचों ने इन पुरुषों और महिलाओं को ‘कुली’ या अनुबंधित मजदूर के रूप में भर्ती किया था। यह जहाज 5 जून को पारामारिबो बंदरगाह पर पहुंचा, जिसमें 279 पुरुष, 70 महिलाएं और 50 बच्चे सवार थे। इनमें से ग्यारह लोगों की इस यात्रा में मृत्यु हो गई। इसके बाद के वर्षों में, कोलकाता बंदरगाह से सूरीनाम के लिए 63 और जहाज रवाना हुए। इनमें 34,304 भारतीयों को सूरीनाम भेजा गया, इनमें 70% से अधिक भोजपुरी भाषी ही थे.
अंग्रेजी शासन ने इन्हें Agreement यानी अनुबंध के तहत मजदूरी के लिए भेजा था। यही Agreement बाद में टूटते-बिगड़ते ‘गिरमिट’ बन गया और ये मजदूर इतिहास में गिरमिटिया कहलाए। यह जहाज तीन महीने से अधिक की कष्टदायक समुद्री यात्रा के बाद 5 जून 1873 को सूरीनाम की राजधानी पारामारिबो (Paramaribo) पहुँचा था।
इस कठिन यात्रा के दौरान खराब परिस्थितियों के कारण 11 यात्रियों की रास्ते में ही मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद 399 प्रवासी ही सूरीनाम की धरती पर पहुँच पाए थे। 5 जून को सूरीनाम में हर साल ‘भारतीय आगमन दिवस’ (Indian Arrival Day) के रूप में मनाया जाता है। इस ऐतिहासिक यात्रा और प्रवासियों की याद में कोलकाता के हुगली नदी तट पर ‘सूरीनाम घाट’ (Suriname Ghat) बनाया गया है जहाँ ‘माई-बाप स्मारक’ (Mai-Baap Memorial) स्थित है।

लेकिन यह केवल मजदूरी का अनुबंध नहीं था, बल्कि भूख, गरीबी, छल और विस्थापन की एक ऐसी कहानी थी जिसने लाखों भारतीयों की पीढ़ियों को बदल दिया।
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अकाल, गरीबी और अंग्रेजों का लालच
19वीं सदी के उत्तरार्ध में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश भीषण गरीबी, अकाल और सामाजिक असमानता से जूझ रहे थे। खेती पर निर्भर परिवारों के पास रोजगार नहीं था। अंग्रेजों ने इसी मजबूरी का फायदा उठाया।
भर्ती एजेंट, जिन्हें अरकाटी कहा जाता था, गांव-गांव घूमते थे। वे लोगों को सुनहरे सपने दिखाते थे कि यहां से चार पैसे अधिक मिलेंगे, अच्छा खाना मिलेगा, पांच साल बाद लौट आओगे। कई लोगों को बहला-फुसलाकर ले जाया गया, तो कई को धोखे से जहाजों तक पहुंचा दिया गया।
National Archives of Suriname, Government of India Diaspora Records और इतिहासकारों के अनुसार 1873 से 1916 के बीच लगभग 34,304 भारतीयों को सूरीनाम भेजा गया। इनमें करीब 70 प्रतिशत लोग भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से थे।
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‘काला पानी’ पार करने का दर्द
उस दौर में समुद्र पार करना धार्मिक और सामाजिक रूप से बड़ा अपराध माना जाता था। गांव के लोग मानते थे कि काला पानी पार करने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए जो लोग जहाज पर चढ़ते, वे जानते थे कि शायद अब कभी अपने गांव, अपनी मिट्टी और अपने लोगों को नहीं देख पाएंगे।
लल्ला रूख और बाद के जहाजों की यात्रा आसान नहीं थी। भारत से सूरीनाम पहुंचने में 90 से 120 दिन तक लग जाते थे। जहाजों में भीड़, गंदगी, बीमारी और कुपोषण आम बात थी। हैजा, पेचिश और बुखार से कई लोग रास्ते में ही मर जाते थे। कई तो तनाव के चलते ही समुद्र में कूद गए.
इतिहास में दर्ज है कि कई महिलाओं ने जहाज पर बच्चों को जन्म दिया और कई बच्चों ने समुद्र में ही दम तोड़ दिया। मृतकों के शव समुद्र में फेंक दिए जाते थे। उस समय न कोई अंतिम संस्कार, न कोई अपना। महिलाओं को मानसिक और शारीरिक शोषण भी किया जाता था.
सूरीनाम में गन्ने के खेत और कोड़ों की मार
सूरीनाम पहुंचने के बाद गिरमिटिया मजदूरों को गन्ने, कॉफी और कोको के खेतों में काम पर लगाया गया। काम का समय 10 से 14 घंटे तक होता था। मजदूरी बेहद कम थी और रहने की स्थिति अमानवीय।
अगर कोई मजदूर बीमार पड़ता या काम करने से मना करता, तो उसे सजा दी जाती थी। कई जगहों पर कोड़े मारने और भोजन रोकने जैसी घटनाएं भी दर्ज हैं।
महिलाओं की स्थिति और भी भयावह थी। लंबी यात्रा, असुरक्षा और कम संख्या के कारण उन्हें शोषण का सामना करना पड़ा। कई परिवार बिछड़ गए। कुछ लोग मानसिक तनाव में आत्महत्या तक कर लेते थे।
सूरीनाम के इतिहासकार रोज़िता रामसरण के अनुसार, गिरमिटिया मजदूर सिर्फ श्रमिक नहीं थे, वे औपनिवेशिक शोषण की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक थे।
न्यूजीलैंड निवासी लेखक-गिरमिटिया मजदूरों के वंशज राजेंद्र प्रसाद ने अपनी पुस्तक ‘टियर्स इन पैराडाइज: सफरिंग एंड स्ट्रगल्स ऑफ इंडियंस इन फिजी 1879-2004’ में गिरमिटिया भारतीयों के इतिहास, संघर्ष और पीड़ा को विस्तार से दर्ज किया है। उन्होंने एन्स्लेव्ड इन पैराडाइज पुस्तक भी लिखी तथा ‘गिरमिट – द फील्ड्स ऑफ सैडनेस’ नामक एक चर्चित डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया, जो गिरमिटिया मजदूरों के दर्द और जीवन संघर्ष को सामने लाती है।

Bhojpuri24.com से बात करते हुए राजेंद्र प्रसाद कहते हैं कि जब हमारे पुरखे भारत से जहाजों में बैठाकर सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस ले जाए गए, तब उनके पास न धन था, न शक्ति। उनके पास केवल मिट्टी की याद, भोजपुरी की बोली और रामचरितमानस के कुछ पन्ने थे। उन्हीं यादों और शब्दों ने उन्हें टूटने नहीं दिया। गिरमिटिया इतिहास दर्द का इतिहास जरूर है, लेकिन यह मानव आत्मा की सबसे बड़ी जीत की कहानी भी है।
राजेंद्र प्रसाद बताते हैं कि गिरमिटिया मजदूरों की जिंदगी दर्द, अपमान और असहनीय अत्याचारों से भरी थी। सूरीनाम के खेतों में वे दिन-रात खून-पसीना बहाते थे, लेकिन मालिक उन्हें इंसान नहीं, सिर्फ काम करने वाली मशीन समझते थे। जरा सी गलती पर कोड़े बरसते, बीमार होने पर दवा नहीं मिलती और कई बार भूखे पेट ही काम करना पड़ता था। सबसे दर्दनाक हालत महिलाओं और बच्चों की थी। लंबी समुद्री यात्रा, कुपोषण, बीमारी और शोषण ने हजारों परिवारों को तोड़ दिया। कई महिलाओं ने जहाजों और खेतों में बच्चों को जन्म दिया, लेकिन पर्याप्त इलाज और भोजन न मिलने से बड़ी संख्या में नवजातों की मौत हो जाती थी। उस दौर में महिलाओं और बच्चों की मृत्यु दर बेहद अधिक थी। अनजान देश में अपनों से दूर, दर्द और अकेलेपन के बीच कई गिरमिटिया मजदूर चुपचाप दम तोड़ देते थे, लेकिन उनकी चीखें इतिहास के पन्नों में आज भी सुनाई देती हैं।
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फिर भी नहीं टूटी भोजपुरी की डोर
इतनी पीड़ा के बीच भी भारतीय मजदूर अपनी भाषा और संस्कृति नहीं भूले। खेतों में काम करते हुए वे बिरहा गाते, चौपाल लगाते और होली-दीवाली मनाते। धीरे-धीरे भोजपुरी, अवधी और मगही मिलकर सरनामी हिंदुस्तानी भाषा बन गई। यही भाषा आज भी सूरीनाम और नीदरलैंड में भारतीय मूल के लोग बोलते हैं।उन्होंने मंदिर बनाए, रामायण मंडलियां शुरू कीं और बच्चों को भारतीय परंपराओं से जोड़े रखा। आज भी सूरीनाम और नीदरलैंड में फगुआ (होली), दिवाली और रामचरितमानस का पाठ बड़े उत्साह से होता है।
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मौत, संघर्ष और फिर पहचान की लड़ाई
1916 में गिरमिट प्रथा समाप्त हुई, लेकिन तब तक हजारों भारतीय अपनी मातृभूमि से कट चुके थे। कई लोग भारत लौटना चाहते थे, लेकिन गरीबी और दूरी के कारण वापस नहीं आ सके। 1975 में सूरीनाम की आजादी के बाद बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग नीदरलैंड जाकर बस गए। आज वहां लगभग 2 लाख से अधिक सरनामी हिंदुस्तानी रहते हैं। वे डॉक्टर, शिक्षक, सांसद, कलाकार और व्यवसायी बने, लेकिन उनकी पहचान में आज भी भोजपुरी संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है।
पीएम मोदी के दौरे से फिर चर्चा में आया इतिहास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया नीदरलैंड दौरे के दौरान जब भारतीय मूल के लोगों ने भोजपुरी गीतों और पारंपरिक अंदाज में उनका स्वागत किया, तो दुनिया की नजर फिर इस इतिहास पर गई। द हेग की सड़कों पर गूंजती भोजपुरी केवल भाषा नहीं थी, बल्कि उन लाखों गिरमिटिया मजदूरों की याद थी जिन्होंने दर्द, भूख और अपमान के बीच भी अपनी संस्कृति को जिंदा रखा।
इतिहास की वह सीख, जिसे भूलना नहीं चाहिए
गिरमिटिया इतिहास केवल प्रवास की कहानी नहीं, बल्कि मानव सहनशक्ति, संस्कृति और पहचान की सबसे बड़ी गाथाओं में से एक है।
यह उन लोगों की कहानी है जिन्हें मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ा, जिन्होंने समुद्र में अपनों को खोया, खेतों में कोड़े खाए, लेकिन फिर भी अपनी भाषा, अपने गीत और अपनी आत्मा को नहीं मरने दिया।
आज जब नीदरलैंड और सूरीनाम में कोई बच्चा भोजपुरी में ‘का हाल बा’ बोलता है, तो उसमें 153 साल पहले ‘लल्ला रूख’ जहाज पर बैठे उन मजदूरों की आवाज भी सुनाई देती है।


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