जानिए उन चेहरों को जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा का इतिहास बनाया

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21 फरवरी 1963 को पटना के ‘वीणा सिनेमा’ में जब ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’ रिलीज हुई, तो भीड़ को संभालने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी थी। लोग बैलगाड़ियों पर बैठकर मीलों दूर से अपने ‘अपने लोगों’ को पर्दे पर देखने आए थे। फिल्म की कहानी दहेज प्रथा और सामाजिक कुरीतियों पर आधारित थी। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश देने वाली फिल्म थी। फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट में बनी थी।

Part II

History and Heros of Bhojpuri Cinema: भोजपुरी सिनेमा (भोजीवुड) आज एक विशाल उद्योग बन चुका है, जो दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ से अधिक बोलने वालों की पसंद है। आज भोजपुरी सिनेमा और गानों की दीवानगी ऐसी है कि जो भोजपुरी नहीं समझते हैं वो भी सुनते-देखते और समझने की कोशिश करते हैं. रंगीन दृश्यों, जबरदस्त एक्शन और रूह को छू लेने वाले लोक संगीत से सजी यह दुनिया आज जिस मुकाम पर है, उसकी शुरुआत कोई व्यावसायिक प्रयोग नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम और एक सांस्कृतिक मिशन का परिणाम थी।
आज से ठीक 63 साल पहले सन 1963 में फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’ के साथ भोजपुरी सिनेमा का जन्म हुआ। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली बार था जब उत्तर भारत की किसी क्षेत्रीय बोली ने रुपहले पर्दे पर अपनी पहचान का दावा किया था।यह किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं थी। हालाँकि नजीर हुसैन को ‘भोजपुरी सिनेमा का जनक’ कहा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि इस सपने को हकीकत में बदलने के लिए राजनीति, कला और तकनीक के कई दिग्गज एक साथ आए थे।

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इस फिल्म में लता मंगेशकर ने गीत गाया था। जल्द ही आप पढ़ेंगे कि किसके कहने पर वह भोजपुरी गीत गाने के लिए तैयार हुई थीं।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, भोजपुरी में फिल्म काहे नहीं बनाते?
भोजपुरी सिनेमा के बीज फिल्म स्टूडियो में नहीं, बल्कि राष्ट्रपति भवन में बोए गए थे। भारत के प्रथम राष्ट्रपति और बिहार के माटी के लाल डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपनी संस्कृति से गहरे जुड़े थे। एक मुलाकात के दौरान उन्होंने दिग्गज अभिनेता नजीर हुसैन से अपनी मातृभाषा के प्रति चिंता जताते हुए कहा था, ‘अपनी भाषा (भोजपुरी) में फिल्म काहे नहीं बनाते?’ यह केवल एक सुझाव नहीं था, बल्कि उस समय के भाषाई वर्चस्व को एक चुनौती थी। डॉ. प्रसाद का मानना था कि सिनेमा को अगर जन-जन तक पहुँचना है, तो उसे उनकी अपनी भाषा में बात करनी होगी। इस उच्च-स्तरीय प्रोत्साहन ने उस नैतिक साहस को जन्म दिया, जिसकी जरूरत इस जोखिम भरे काम के लिए थी।

नजीर हुसैन बनें भोजपुरी सिनेमा के शिल्पकार और आत्मा

नजीर हुसैन, जो पहले से ही हिंदी सिनेमा का एक प्रतिष्ठित नाम थे, इस आंदोलन के मुख्य इंजन बने। उन्होंने न केवल फिल्म में अभिनय किया, बल्कि भोजपुरी क्षेत्र की आत्मा वहाँ के रीति-रिवाज, दर्द और सादगी आदि को समेटने वाली कहानी और पटकथा भी लिखी। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संवाद केवल हिंदी का अनुवाद न हों, बल्कि उनमें ‘माटी की खुशबू’ और भोजपुरी लहजे की मिठास हो। हुसैन ने कई साल निवेशकों को यह समझाने में बिताए कि भोजपुरी फिल्म भी सफल हो सकती है।

साहसी निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी का संकल्प
किसी भी क्रांति को एक आधार की जरूरत होती है, और भोजपुरी सिनेमा के लिए वह आधार बने विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी। उस दौर में जब क्षेत्रीय सिनेमा (दक्षिण और बंगाल को छोड़कर) का कोई वजूद नहीं था, भोजपुरी फिल्म में पैसा लगाना आर्थिक आत्महत्या माना जाता था। लेकिन शाहाबादी ने आलोचकों की परवाह नहीं की। उन्होंने इसे एक व्यापार के रूप में नहीं, बल्कि अपनी भाषा की सेवा के रूप में लिया और आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराई।

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पर्दे पर लोक जीवन को उतारने वाले निर्देशक कुंदन कुमार
ग्रामीण और लोक-आधारित संस्कृति को 35mm फिल्म की जटिल तकनीक पर उतारने के लिए एक संवेदनशील निर्देशक की आवश्यकता थी। कुंदन कुमार ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। उनका निर्देशन यथार्थवाद और भावनात्मक गहराई पर केंद्रित था। उन्होंने समझा कि इस फिल्म का दर्शक हॉलीवुड

जैसा तमाशा नहीं, बल्कि अपनी ही जिंदगी का आईना देखना चाहता है। उनके कुशल निर्देशन ने ही आगे की क्षेत्रीय फिल्मों के लिए एक पैमाना (Template) तैयार किया।

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संगीत की जादुई धुनें के लिए चित्रगुप्त का अमर योगदान
संगीत भोजपुरी संस्कृति की जीवनरेखा है। सोहर से लेकर चैता तक, यह भाषा स्वाभाविक रूप से संगीतमय है। इसे पर्दे पर उतारने के लिए संगीतकार चित्रगुप्त को चुना गया, जिनके पास लोक धुनों की गहरी समझ थी। उन्होंने केवल गीत नहीं रचे, बल्कि एक ऐसा माहौल तैयार किया जो दर्शकों को सीधे गांव की गलियों में ले गया। फिल्म का शीर्षक गीत ‘हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’ एक कालजयी रचना बन गया, जो आज भी उत्सवों में गूंजता है।

शैलेंद्र, मिट्टी की सादगी को शब्द देने वाले कवि
महान गीतकार शैलेंद्र, जिन्होंने राज कपूर की फिल्मों के लिए अमर गीत लिखे थे, मूल रूप से बिहार के आरा जिले से थे। उन्होंने इस फिल्म के गीतों में अपनी मातृभूमि के प्रति सारा प्रेम उड़ेल दिया। उनके शब्दों में भोजपुरी लोक जीवन के मुहावरे और संवेदनाएं इस तरह घुली हुई थीं कि दर्शकों को लगा जैसे उनके अपने ही शब्द संगीत बन गए हों। उन्होंने उच्च कला और लोक परंपरा के बीच एक सेतु का काम किया।

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कुमकुम और असीम कुमार बनें नई इंडस्ट्री के सितारे
किसी भी नई फिल्म इंडस्ट्री को स्थापित होने के लिए ऐसे चेहरों की जरूरत होती है जिनसे जनता प्यार कर सके। कुमकुम, जो उस समय हिंदी सिनेमा की एक बड़ी स्टार थीं, ने एक क्षेत्रीय फिल्म में काम करने का बड़ा फैसला लिया। उनकी मौजूदगी ने फिल्म को ‘स्टार वैल्यू’ दी। वहीं, असीम कुमार ने एक आदर्श भोजपुरी नायक की छवि पेश की। इन कलाकारों के अभिनय ने दर्शकों का भरोसा जीता और उन्हें भोजपुरी फिल्मों का मुरीद बना दिया।

तकनीकी टीम और वितरक भी पर्दे के पीछे के असली नायक
कलाकारों की चमक के पीछे एक समर्पित तकनीकी टीम खड़ी थी। सीमित बजट और कम संसाधनों के बावजूद कैमरामैन, एडिटर और आर्ट डायरेक्टरों ने इसे एक विश्वस्तरीय फिल्म बनाने में दिन-रात एक कर दिया। साथ ही, वितरकों और सिनेमाघर मालिकों की भूमिका भी कम नहीं थी। 21 फरवरी 1963 को पटना के ‘वीणा सिनेमा’ में जब यह फिल्म रिलीज हुई, तो भीड़ को संभालने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी थी। लोग बैलगाड़ियों पर बैठकर मीलों दूर से अपने ‘अपने लोगों’ को पर्दे पर देखने आए थे।

अगली कड़ी में- रिकॉर्ड बनाने वाली पहली भोजपुरी फिल्म, जानिए खास बातें

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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