शाही लीची, जो हर गर्मी में बिहार को महकाती है

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शाही लीची के लिए मशहूर बिहार का मुजफ्फरपुर जिले में हर साल करीब तीन लाख टन लीची का उत्पादन होता है। करीब एक लाख से अधिक किसान परिवार सीधे तौर पर लीची की खेती से जुड़े हैं, जबकि पैकेजिंग, परिवहन, व्यापार, मजदूरी और निर्यात जैसे कार्यों को जोड़ लें तो 2 से 3 लाख लोग इस पूरी श्रृंखला में अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते हैं।

पल्लवी कश्यप की रिपोर्ट

मुजफ्फरपुर। बिहार की धरती अपनी उपजाऊ मिट्टी और कृषि परंपराओं के लिए जानी जाती है, लेकिन जब गर्मियों का मौसम आता है तो इस मिट्टी की सबसे मीठी पहचान बनकर सामने आती है मुजफ्फरपुर की शाही लीची। लाल छिलके में छिपा सफेद, रसदार और सुगंधित गूदा ऐसा स्वाद देता है कि एक बार खाने वाला इसकी मिठास कभी नहीं भूलता। यही कारण है कि इसे देशभर में ‘लीचियों की रानी’ कहा जाता है। यहां हर साल करीब तीन लाख टन से अधिक लीची का उत्पादन होता है। बिहार भारत के सबसे बड़े लीची उत्पादक राज्यों में से एक है, जो देश के कुल लीची उत्पादन में 40% से अधिक का योगदान देता है।  http://सतुआ की कहानी, भोजपुरी-बिहारी संस्कृति का इंस्टेंट सुपरफूड

मिनी-फेस्टिवल जैसा माहौल

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का नाम लेते ही लोगों के मन में सबसे पहले शाही लीची की छवि उभरती है। यह केवल एक मौसमी फल नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की संस्कृति, अर्थव्यवस्था, किसानों की मेहनत और बिहार की प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी है। अनुमानित तौर पर इन इलाकों में एक लाख से अधिक किसान परिवार सीधे तौर पर लीची की खेती से जुड़े हैं, जबकि पैकेजिंग, परिवहन, व्यापार, मजदूरी और निर्यात जैसे कार्यों को जोड़ लें तो 2 से 3 लाख लोग इस पूरी श्रृंखला में अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते हैं। लीची का मौसम आमतौर पर मई से जून के बीच रहता है, लेकिन इस छोटे से समय में ही पूरा साल का आर्थिक गणित तय हो जाता है। खास बात यह भी है कि इस दौरान गांवों में एक तरह का “मिनी-फेस्टिवल” जैसा माहौल बन जाता है सुबह-सुबह तुड़ाई, दिनभर छंटाई और पैकिंग, और रात तक बाजारों के लिए ट्रकों में लोडिंग का सिलसिला चलता रहता है।  http://रामजी को सीता जी के साथ विदाई में मिला था दही चूड़ा (इंडियन सुपरफूड)

2018 में GI Tag (Geographical Indication Tag) मिला

शाही लीची की पतली छाल, अधिक गूदा और मीठा स्वाद इसे अन्य किस्मों से अलग बनाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यहां की जलवायु और उपजाऊ मिट्टी इस फल की गुणवत्ता को खास बनाती है। गंगा के मैदानी क्षेत्र में स्थित यह इलाका लीची उत्पादन के लिए आदर्श माना जाता है। इसको 2018 में GI Tag (Geographical Indication Tag) मिला। इससे यह प्रमाणित हुआ कि इस लीची की गुणवत्ता और पहचान इस क्षेत्र से विशेष रूप से जुड़ी हुई है। GI Tag मिलने के बाद इसकी मांग देश ही नहीं, विदेशों में भी तेजी से बढ़ी। अब यह केवल बिहार का फल नहीं, बल्कि भारत के कृषि मानचित्र पर एक प्रतिष्ठित ब्रांड बन चुका है। इस टैग ने किसानों को यह विश्वास भी दिया कि उनकी वर्षों की मेहनत को राष्ट्रीय पहचान मिली है।

चीन से भारत आने की कहानी
लीची फल का इतिहास करीब 2000 साल पुराना है। इस फल को हजारों साल पहले चीन में उगाया जाता था। भारत में लीची का आगमन 1800 साल बाद हुआ। भारत में बिहार के मुजफ्फरपुर में लीची की सबसे ज्यादा उत्पादन होता है। भारत और चीन के अलावा लीची की खेती अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, मेडागास्कर और दक्षिण अफ्रीका में भी किया जाता है। 18वीं शताब्दी के शुरुआत से अमेरिका, भारत, दक्षिण पूर्व एशिया, वियतनाम, ब्राजील ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, मेडागास्कर और दक्षिण अफ्रीका में लीची के उत्पादन का शुरुआत हो गया था। शाही लीची को लोगों ने इतना ज्यादा पसंद किया कि इसने मार्केट में अलग दबदबा बनाया और इसकी खेती बड़े पैमाने में होने लगी। भारत में लीची चीन से आई थी, अब भारत दुनिया दूसरा ऐसा देश है, जहां लीची की सबसे ज्यादा खेती होती है। भारत में बिहार के मुजफ्फरपुर में अकेले ही सिर्फ 36 हजार से अधिक हेक्टेयर में लीची की खेती होती है।

http://भोजपुरी त्योहार व्यंजन: मिट्टी की खुशबू, भक्ति की महक और सांस्कृतिक विरासत का अनोखा स्वाद

मुजफ्फरपुर में ही क्यों होती है लीची की सबसे ज्यादा खेती?
लीची की बेहतर पैदावार और उत्पादन के लिए 5-7 PH मान वाली बलुई दोमट मिट्टी को सबसे अच्छा माना गया है। बिहार में लीची की खेती नदियों के किनारे या आसपास के क्षेत्रों में होती है। बिहार में लीची के बागान (लीची के किस्म) सबसे ज्यादा गंगा, गंडक, बूढ़ी गंडक के किनारे पर हैं, जहां की मिट्टी, पानी और वातावरण लीची के अच्छी पैदावार के लिए बेस्ट हैं।  http://लिट्टी-चोखा की कहानी: चंद्रगुप्त मौर्य के सैनिक युद्ध में साथ रखते थे लिट्टी

Red lychee fruit placed in a basket on a white background.

 

सालभर की मेहनत का फल गर्मी में मिलता
मणिका (Manika) क्षेत्र लीची अनुसंधान केंद्र और घने लीची बागानों के लिए बेहद प्रसिद्ध है, वहीं सरैया (Saraiya) अपने उच्च गुणवत्ता वाले शाही लीची बागानों के कारण खास पहचान रखता है। मीनापुर (Minapur) में भी बड़े पैमाने पर लीची की खेती की जाती है, जबकि कांटी (Kanti) के बागानों में बेहतरीन गुणवत्ता की लीची का उत्पादन होता है। इसके अलावा मोतीपुर (Motipur) और मुशहरी (Musahari) भी शाही लीची उत्पादन के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं। मुशहरी के ही रामचरण यादव का कहना है, ‘हमारे लिए लीची सिर्फ फल नहीं है, यही हमारी सालभर की मेहनत का परिणाम है।’ अच्छी फसल होने पर किसानों के चेहरों पर अलग ही चमक दिखाई देती है, क्योंकि यही मौसम उनकी आर्थिक स्थिति तय करता है।

करोबार और दूर-दूर तक फैलती मिठास
शाही लीची का कारोबार मुजफ्फरपुर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। मई-जून के मौसम में यहाँ की मंडियाँ सुबह से रात तक गुलजार रहती हैं। बिहार ही नहीं, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ और देश के कई बड़े शहरों से व्यापारी यहाँ पहुँचते हैं। ट्रकों, रेफ्रिजरेटेड वैन और रेलवे के जरिए हजारों पेटी लीची देशभर में भेजी जाती हैं। कुछ मात्रा में इसका निर्यात खाड़ी देशों और नेपाल जैसे पड़ोसी क्षेत्रों में भी किया जाता है। स्थानीय व्यापारियों के लिए यह मौसम किसी त्योहार से कम नहीं होता।  http://भोजपुरी भाषी क्षेत्रों का बदलता फूड हैबिट, ‘मॉडर्न’ Food का कहर

बाजारों में छा जाती है रौनक
फलों के कारोबारी नवल सिंह कहते हैं कि लीची का मौसम आते ही मुजफ्फरपुर की सड़कों, मंडियों और चौक-चौराहों पर लाल लीची की बहार दिखने लगती है। हर तरफ बांस की टोकरियाँ, पैकिंग बॉक्स, आवाज लगाते दुकानदार और खरीददारों की भीड़ नजर आती है। फल मंडी के एक अन्य व्यापारी संजय प्रसाद कहते है कि शाही लीची के बिना मुजफ्फरपुर की गर्मी अधूरी है। यह रौनक केवल फल बेचने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पैकिंग मजदूर, ट्रांसपोर्टर, आढ़ती, ठेला चालक और छोटे दुकानदार सभी की आमदनी इससे जुड़ जाती है।

अब तो स्वाद से ज्यादा एक भावना
मुजफ्फरपुर के लोगों के लिए शाही लीची सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि गर्व का विषय है। यहाँ के बच्चे बचपन से इसकी मिठास के साथ बड़े होते हैं और बुजुर्ग इसे शहर की पहचान मानते हैं। मीनापुर के एक निवासी शम्भू पांडेय कहते हैं कि मैं तो इसकी खेती नहीं करता हूँ लेकिन दुनिया मुजफ्फरपुर को लीची से जानती है, यही हमारी असली पहचान है। जब कोई रिश्तेदार बाहर से आता है, तो उसे शाही लीची खिलाना यहाँ की मेहमाननवाजी का हिस्सा माना जाता है।

आने वाली पीढ़ी और नई उम्मीदें
आज युवा पीढ़ी भी शाही लीची के महत्व को समझ रही है। कृषि वैज्ञानिकों की मदद से अब बेहतर पैकिंग, कोल्ड स्टोरेज, ऑनलाइन मार्केटिंग और प्रोसेसिंग पर काम हो रहा है। नई पीढ़ी चाहती है कि मुजफ्फरपुर की लीची सिर्फ ताजा फल के रूप में नहीं, बल्कि जूस, जैम, कैंडी और पल्प के रूप में भी दुनिया के बाजार तक पहुँचे। अगर सही तकनीक और सरकारी सहयोग मिले, तो यह फल आने वाले समय में बिहार की अर्थव्यवस्था को और मजबूत कर सकता है।

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