केवल तलवार नहीं, शब्दों से भी जीती गई आज़ादी की जंग, भोजपुरी कवियों का भी बड़ा योगदान

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कुमार अजय सिंह, गीतकार/कहानीकार, भोजपुर (आरा), बिहार

भारत की आज़ादी की लड़ाई केवल तलवार, बंदूक, अस्त्र-शस्त्र और राजनीतिक रणनीतियों से ही नहीं लड़ी और जीती गई। यह भी एक सच्चाई है कि इतनी बड़ी ऐतिहासिक विजय के लिए हुए महायज्ञ में कवियों और साहित्यकारों की लेखनी ने भी आहुति के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अनेक कवि-लेखकों ने अपनी रचनाओं और साहित्यिक चेतना के माध्यम से देशभक्ति की भावना जगाकर समाज में क्रांति पैदा करने में अहम योगदान दिया। इसी कारण आज़ादी से पहले और बाद में भी देश के राजनेताओं और शासकों ने इन साहित्यकारों को सम्मानित किया।

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स्वतंत्रता संग्राम के दौर में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। उनकी रचना ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन का नारा बनी और बाद में राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त किया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का योगदान भी अतुलनीय रहा। उनकी रचना ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान बना, जो देशभक्ति और मानवता का प्रतीक है। वर्ष 1913 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला और जालियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी।

रामधारी सिंह दिनकर वीर रस के महान कवि थे। उनकी रचनाएं ‘हुंकार’ और ‘रश्मिरथी ने युवाओं में देशभक्ति और क्रांतिकारी चेतना जगाई। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार, ‘पद्म भूषण’ और ‘राष्ट्रकवि’ जैसे सम्मान मिले। कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी” ने स्वतंत्रता आंदोलन में जोश भर दिया। उनके सम्मान में मरणोपरांत डाक टिकट भी जारी किया गया।

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मैथिलीशरण गुप्त ने ‘भारत-भारती’ के माध्यम से राष्ट्रभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाया और हिंदी को जनभाषा बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हें ‘पद्म भूषण’ और ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि मिली। माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ ने अंग्रेजों के खिलाफ जनजागरण में अहम भूमिका निभाई। उन्हें “साहित्य अकादमी पुरस्कार” और “पद्म भूषण” से सम्मानित किया गया। इसके अलावा मुंशी प्रेमचंद, सरोजिनी नायडू, काजी नजरुल इस्लाम, इकबाल और जयशंकर प्रसाद जैसे अनेक साहित्यकारों की लेखनी देश और समाज के कल्याण के लिए निरंतर सक्रिय रही।

भोजपुरी कवि-लेखकों का योगदान
भोजपुरी भाषा के कवि-लेखक भी किसी मायने में पीछे नहीं रहे, बल्कि समाज के नव-निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाते रहे। कबीरदास की लेखनी ने समाज की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भिखारी ठाकुर ने लोक साहित्य के माध्यम से ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्रण किया और भोजपुरी संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई।महेन्द्र मिश्र, जिन्हें भोजपुरी पूर्वी का पुरोधा माना जाता है, उनके गीत घर-घर में गूंजे और समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया। इसके अलावा हनुमान सिंह पाठा, सत्यनारायण सिंह, रामजी सिंह मुखिया, गणेशदत्त किरण जैसे कई साहित्यकारों ने अपनी लेखनी से समाज को दिशा दी। इन साहित्यकारों के योगदान के कारण आज भी भारत की आत्मा साहित्य और संस्कृति में जीवित है। यह मानना आवश्यक है कि कवि और लेखक अपनी लेखनी से जनमानस में देशभक्ति तब तक जगाते रहे, जब तक देश को स्वतंत्रता नहीं मिली।

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वर्तमान दौर में जिम्मेदारी
आज के समय में हर भाषा और संस्कृति के कवि-लेखकों का यह कर्तव्य है कि वे अपनी लेखनी का उपयोग समाज और देश के हित में करें। समाज के विकास में कवि-लेखकों के शब्द उतने ही आवश्यक हैं, जितना शरीर के लिए रक्त। जहां कहीं भी सत्ता जनता के दुख-दर्द को नजरअंदाज कर अन्याय या शोषण करती है, वहां कवि-लेखकों की लेखनी को मुखर होना चाहिए। उन्हें अपनी रचनाओं के माध्यम से सच्चाई को सामने लाकर व्यवस्था को सही दिशा दिखानी चाहिए। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है कि साहित्यकार सच की आवाज बनें और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह बनाएं।

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