पटना: 1950-60 के दशक में जब हिंदी सिनेमा अपने स्वर्णिम दौर में था, उसी समय कुमकुम ने अपनी अलग पहचान बनाई। वे मुख्य नायिका के बजाय सह-नायिका और डांसर के रूप में ज्यादा दिखीं, लेकिन हर भूमिका में उन्होंने ऐसा प्रभाव छोड़ा कि दर्शक उन्हें याद रखे बिना नहीं रह सके। मदर इंडिया, सीआईडी और नया दौर जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी ने उन्हें इंडस्ट्री में एक भरोसेमंद और प्रतिभाशाली कलाकार के रूप में स्थापित किया।
http://ऐसी भोजपुरी फिल्म जिसने बॉलीवुड को भी पीछे छोड़ दिया था
बिहार से फिल्मी दुनिया तक कुमकुम की जड़ें
कुमकुम का असली नाम जेबुन्निसा था। उनका जन्म 22 जून 1934 को बिहार के शेखपुरा जिले के हुसैनाबाद में एक नवाबी परिवार में हुआ था। वे एक समृद्ध और प्रतिष्ठित खानदान से ताल्लुक रखती थीं, जहां कला और संस्कृति का गहरा माहौल था। यही वातावरण उनके भीतर बचपन से ही अभिनय और नृत्य के प्रति रुचि जगाने का कारण बना।
हालांकि समय के साथ परिस्थितियां बदल गईं। सरकारी नीतियों के चलते परिवार की संपत्ति जब्त हो गई, जिससे उनका जीवन अचानक संघर्षों की ओर मुड़ गया। इसके बाद उनका परिवार कलकत्ता (अब कोलकाता) चला गया, लेकिन यहां भी उनका पारिवारिक जीवन स्थिर नहीं रह सका। कुमकुम के पिता ने परिवार को छोड़ दिया, दूसरी शादी कर ली और बाद में पाकिस्तान चले गए। वे फिर कभी वापस नहीं लौटे। इन कठिन परिस्थितियों के बीच कुमकुम ने न सिर्फ खुद को संभाला, बल्कि आगे चलकर सिनेमा की दुनिया में अपनी अलग पहचान भी बनाई जो उनके संघर्ष और आत्मविश्वास की मजबूत कहानी को दर्शाती है।
फिल्मों में ऐसे आईं कुमकुम http://भोजपुरी सिनेमा की सबसे बड़ी समस्या उसकी ‘गंदी इमेज’
हिंदी फिल्मों में कुमकुम के आने की शुरुआत असल में 1950 के दौरान हुई थी। कुमकुम को फिल्म इंडस्ट्री में लाने का क्रेडिट गुरु दत्त को जाता है। कहा जाता है कि गुरु दत्त की वजह से ही कुमकुम फिल्मों में आईं। साल 1954 में फिल्म ‘आर-पार’ के गाने ‘कभी आर कभी पार’ में एक छोटी सी झलक में वो दिखाई थी। गुरु दत्त उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि उन्हें और मौके दिए गए। इसके बाद गुरुदत्त की ‘प्यासा’ और ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ में नजर आईं।
भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत और ऐतिहासिक मोड़
1963 में आई फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो ने न केवल भोजपुरी सिनेमा की नींव रखी, बल्कि कुमकुम को इतिहास में दर्ज कर दिया। यह फिल्म भोजपुरी की पहली बड़ी हिट मानी जाती है। इस फिल्म की खास बात यह थी कि इसमें ग्रामीण जीवन, आस्था और सामाजिक मूल्यों को बड़े ही सहज तरीके से दिखाया गया। कुमकुम का किरदार इतना जीवंत था कि वे सीधे दर्शकों के दिल में उतर गईं। यहीं से उन्हें भोजपुरी सिनेमा की पहली सुपरस्टार का दर्जा मिला।

कुमकुम की असली ताकत अभिनय और नृत्य
कुमकुम की सबसे बड़ी पहचान उनका नृत्य और अभिव्यक्ति थी। उस दौर में जब हेलन जैसी डांसर ग्लैमर का प्रतीक थीं, कुमकुम ने अपनी अलग शैली बनाई जहां भारतीयता और सौम्यता दोनों का संतुलन था। उनके गानों में सिर्फ नृत्य नहीं, बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति भी दिखती थी। यही वजह थी कि वे हर वर्ग के दर्शकों के बीच लोकप्रिय रहीं।
कुछ रोचक और अहम तथ्य
भोजपुरी सिनेमा का इतिहास जितना दिलचस्प है, उतना ही संघर्षपूर्ण भी। पहली भोजपुरी फिल्म (1963) में आई ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ कम बजट लेकिन बड़ी सफलता वाली फिल्म थी। शुरुआती फिल्मों का बजट बहुत कम होता था, लेकिन दर्शकों का जुड़ाव बेहद मजबूत था। इससे भोजपुरी का भी विस्तार हुआ। यूपी-बिहार से निकलकर यह सिनेमा मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और नेपाल तक पहुंचा और भोजपुरी फिल्मों में संगीत सबसे मजबूत पक्ष रहा, कई गीत आज भी लोकजीवन का हिस्सा हैं। 90 के दशक में एक समय ऐसा आया जब भोजपुरी सिनेमा लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गया. फिर 2000 के बाद पुनर्जागरण यानि मनोज तिवारी और रवि किशन जैसे कलाकारों ने इसे फिर से जीवित किया। दिलचस्प बात यह है कि जिस इंडस्ट्री की शुरुआत एक फिल्म से हुई, आज वह हर साल सैकड़ों फिल्मों का निर्माण करती है।
कुमकुम एक लेकिन दो इंडस्ट्री के बीच मजबूत सेतु
कुमकुम की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने हिंदी और भोजपुरी सिनेमा के बीच एक पुल का काम किया। जहां हिंदी सिनेमा में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया, वहीं भोजपुरी सिनेमा को उन्होंने एक पहचान और स्टारडम दिया। उस दौर में किसी स्थापित हिंदी अभिनेत्री का क्षेत्रीय सिनेमा में आना बहुत बड़ी बात थी और कुमकुम ने यह जोखिम उठाया।
शादी के बाद इंड्स्ट्री को छोड़ा
कुमकुम ने अपने करियर में कभी भी कोई रोल करने से परहेज नहीं किया। कभी लीड हीरोइन बनीं तो कभी साइड रोल में भी वह नजर आईं। फिल्मों के बाद साल 1975 में बिजनेसमैन सज्जाद खान से उन्होंने शादी कर ली। सज्जाद खान लखनऊ के एक जाने-माने परिवार से ताल्लुक रखते थे और सऊदी अरब में काम करते थे। इसके बाद कुमकुम ने फिल्मों से दूरी बना ली।

विरासत और आज का संदर्भ
आज जब भोजपुरी सिनेमा एक बड़े बाजार के रूप में उभर चुका है, तब कुमकुम का योगदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वे सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत थीं। उन्होंने यह साबित किया कि क्षेत्रीय सिनेमा भी राष्ट्रीय पहचान बना सकता है। उनकी विरासत आज भी जीवित है हर उस कलाकार में, जो सीमाओं को तोड़कर नई राह बनाना चाहता है।

