कुमार अजय सिंह की शानदार कविता का आनंद लें

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चईत बुझात कहां बा ।।

चईत -चईत लेखा, बुझात कहां बा,
बनिहार से कटनी, कटात कहां बा।
शहरन में लोगवा लहर लूटत बा,
गांवन में अब केहू जात कहां बा।
ए. सी. किनाइल त देसी भुलाइल,
खुला हवा अब केहू खात कहां बा।
चईत-चईत लेखा, बुझात कहां बा।
कुदारिन से कोड़ार कोड़ात नइखे,
खेत में पानी करहा मोड़ात नइखे।
ट्रैक्टर – ट्रॉली पर बोझा लादाता,
बैलन पर लादना ढोआत कहां बा।
चईत – चईत लेखा, बुझात कहां बा।
हरवाहन के हाथे खेत जोतात नइखे,
टांड़ के चलाके बिया बोआत नइखे।
खटे वाला मजदूरा, मिलत नइखन,
मार मुंअरिन तीसी पिटात कहां बा।
चईत – चईत लेखा, बुझात कहां बा।
हार्वेस्टर कटर से फसल कटात बा,
बड़ भूंसा के टाल गंजात कहां बा।
खरिहनियो अब त लिपातो नइखे,
अनाजन के ढेरी तउलात कहां बा।
चईत- चईत लेखा, बुझात कहां बा।
ओखर – मुसर, ढेकी उफर परल,
जांत में सतुआ पिसात कहां बा।
सतुआनो के दिनवा, चटक चटनी,
सतुअवा जवरे जी भेंटात कहां बा।
चईत- चईत लेखा, बुझात कहां बा।
चर-चबेनी, मोहरइया मिलत नइखे,
गंउआ में घुंसार झोंकात कहां बा।
गैस से भरल सिलेंडर किनात बा,
गोइंठा ईंधन खातिर पथात कहां बा।
चईत- चईत लेखा, बुझात कहां बा।
आपस में बइठ दुआर – दलान पर,
चईता- चईती अब गावात कहां बा।
ठंडा पानी घइला में रखात कहां बा,
सिलवट प मसाला पिसात कहां बा।
चईत -चईत लेखा, बुझात कहां बा।
दूध- दहीया बिकाता पोलिथीन में,
नादा में गोरसवा अवंटात कहां बा।
सिरफल के शर्बत अब दुलम भइल,
बुंटवा के होरहा झोरात कहां बा।
चईत- चईत लेखा, बुझात कहां बा।
इनार के कचड़ा उड़हात कहां बा,
ठंढा पानी से करेज जुड़ात कहां बा
बात त बहुत लिखे के अबहियों बा,
अजय लिखले, लिखात कहां बा।
चईत- चईत लेखा, बुझात कहां बा।
कुमार अजय सिंह, गीतकार/ कहानीकार, भोजपुर (आरा, बिहार)

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