पुस्तक/फिल्म समीक्षा

भोजपुरी गीत-संगीत का संकट या बदलाव? अश्लील बनाम श्लील की नई बहस

डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह भोजपुरी की गीत परंपरा में प्रतिरोध, राग-विराग, संयोग-वियोग, संस्कार और जन सरोकारों की चेतना प्रवाहित होती रही है। वहीं इक्कीसवीं सदी...

कुक्कुर पर सिनेमा आ सिनेमा में कुक्कुर

मनोज भावुक कुक्कुर, कुत्ता, डॉग, टॉमी, डॉगी, शेरु जवन नाम से रउआ जानत होईं बाकिर सभका जिनगी में कुक्कुर होखबे करेले सन. हमरा जिनगी में...

भोजपुरिया जिनगी के सुख-दुख के मार्मिक आख्यान बा ‘झनकि बाजे हो

कनक किशोर सरल व्यक्तित्व के स्वामी बड़का आ गंभीर बात के बड़ा सहज ढंग से एह तरे सामने रखेला कि ऊ अपना जइसन, अपना जोरे...

अल्ट्रासोनोग्राफी : भोजपुरी कविता में स्त्री चेतना और सामाजिक यथार्थ का सशक्त दस्तावेज

'किसी का सत्य था, मैंने संदर्भ में जोड़ दिया। कोई मधुकोष काट लाया था, मैंने निचोड़ लिया। यो मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ, काव्य-तत्त्व की खोज में...

‘देखावा के जिनगी’ में महकत बा भोजपुरी माटी के सोंध

राम नाथ बेख़बर (वरिष्ठ साहित्यकार) भोजपुरी ग़ज़ल के युवा हस्ताक्षर नूरैन अंसारी कवनो परिचय के मोहताज नइखीं। इहां के भोजपुरी के एगो बहुत समर्थ कवि...

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