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भारतीय लोकविज्ञान को क्यों चाहिए ‘ग्रैंड थ्योरी’? गाजीपुर में 31 अक्टूबर से अंतरराष्ट्रीय सेमिनार

गाजीपुर, उत्तर प्रदेश। भारतीय लोकपरंपराओं, लोकसंस्कृति और लोकविज्ञान के व्यापक अध्ययन को केंद्र में रखते हुए गाजीपुर में 'Does Indian Folkloristics Need Grand Theory?'...

माटी के गंध, गाँव के पीड़ा आ लोकजीवन के सुर हऽ ‘चलऽ चलीं गँउवाँ के ओर’

समीक्षक: राजेश भोजपुरिया भोजपुरी साहित्य के समृद्ध परंपरा में गीत विधा के अपना एगो विशिष्ट स्थान बा। लोकजीवन, माटी के गंध, रिश्तन के आत्मीयता, प्रकृति...

डॉ. जौहर साफियाबादी के भोजपुरी उपन्यास ‘पूर्वी के धाह’, एक गंभीर, विस्तृत एवं आलोचनात्मक समीक्षा

कृष्ण कुमार भोजपुरी साहित्य की समृद्ध परंपरा में कुछ ऐसी कृतियाँ समय-समय पर सामने आती हैं, जो केवल साहित्यिक सृजन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि...

भोजपुरी लोक की वह बात, जो रहीम भी जानते थे और दोहे में कह गए

-डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी भोजपुरी साहित्य की असल शक्ति या ताकत या विशिष्टता क्या है? उसकी लोक-स्मृति। उसकी जड़ें लोक जीवन में हैं, जो पीढ़ियों...

भोजपुरी सिनेमा को अश्लीलता के चश्मे से देखना गलत-मोनालिसा

बोलीं- कुछ वायरल गानों से नहीं तय होती भोजपुरी फिल्मों की पहचान, अच्छे कलाकार भी कर रहे हैं बेहतरीन काम, पूरी इंडस्ट्री को बदनाम न...

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