भोजपुरी24 विशेष | सोनभद्र
भोजपुरी लोकसाहित्य, लोकगाथाओं और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में डॉ. अर्जुन दास केशरी का योगदान महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के राबर्ट्सगंज निवासी डॉ. केशरी ने अपने जीवन का लंबा समय लोकजीवन, जनजातीय परंपराओं, लोककथाओं और सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन एवं दस्तावेजीकरण में लगाया। उनका साहित्यिक सफर इस बात का प्रमाण है कि लोकसंस्कृति को बचाने के लिए केवल उसका गुणगान करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे संकलित करके अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी जरूरी है।
जनजातीय जीवन और संस्कृति पर 60 से अधिक पुस्तकें
डॉ. अर्जुन दास केशरी के साहित्यिक योगदान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनजातीय जीवन और संस्कृति पर केंद्रित उनका लेखन है। उनके अनुसार, जनजातीय समाज की लोकगाथाओं, लोककथाओं, लोकजीवन, लोकसंस्कृति और पुरातत्व पर 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
उनका लेखन जनजातीय समुदायों की जीवनशैली, परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और मौखिक साहित्य को समझने का महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराता है। लोकसमाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रचलित कथाओं और गाथाओं को लिखित रूप देना सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।
‘लोरिकायन’ और ‘विंध्य क्षेत्र का सांस्कृतिक वैभव’ की विशेष पहचान
डॉ. केशरी की प्रमुख कृतियों में ‘लोरिकायन’ और ‘विंध्य क्षेत्र का सांस्कृतिक वैभव’ का विशेष स्थान है। इन पुस्तकों के आधार पर पांच शोधार्थी पीएचडी कर चुके हैं। यह उपलब्धि बताती है कि उनका साहित्यिक कार्य केवल पाठकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विश्वविद्यालयों में शोध और अकादमिक अध्ययन के लिए भी उपयोगी साबित हुआ है।
उनकी पुस्तक ‘विजयमल’ लोकगाथा पर एक शोधार्थी नेशनल सीनियर फेलोशिप के तहत अध्ययन कर रहा है। इसी तरह बड़ौदा विश्वविद्यालय का एक विद्यार्थी डॉ. केशरी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पीएचडी कर रहा है।
इन शोध कार्यों से स्पष्ट होता है कि लोकसाहित्य के गंभीर अध्ययन में डॉ. केशरी के योगदान का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित
डॉ. अर्जुन दास केशरी को कला समीक्षा के क्षेत्र में वर्ष 2023 के लिए उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कार की घोषणा के बाद उनके परिजनों और शुभचिंतकों में खुशी का माहौल रहा।
शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें अब तक 16 राष्ट्रीय स्तर के सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 1996 में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
शिक्षा के क्षेत्र में भी रहा उल्लेखनीय योगदान
डॉ. केशरी के जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा से जुड़ा रहा है। उन्होंने 32 वर्षों तक आदर्श इंटरमीडिएट कॉलेज में प्रधानाचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दीं। शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी को दिशा देने के साथ-साथ वे लोकसंस्कृति के अध्ययन और संरक्षण में भी सक्रिय रहे।
उनकी शैक्षणिक यात्रा में टीडी कॉलेज, जौनपुर से वर्ष 1964 में एलटी प्रशिक्षण, गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिंदी और संस्कृत में एमए तथा काशी विद्यापीठ से पीएचडी की उपाधि शामिल है। हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज से उन्हें ‘साहित्य महोपाध्याय’ की उपाधि भी प्राप्त हुई।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा सोनभद्र जिले के चतरा ब्लॉक के कोरियांव स्थित उनके पैतृक क्षेत्र में हुई।
लोकसाहित्य का संरक्षण ही सांस्कृतिक विरासत की रक्षा
लोकगाथाओं, लोककथाओं और जनजातीय परंपराओं का बड़ा हिस्सा मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। समय के साथ यदि इन परंपराओं का संकलन और दस्तावेजीकरण नहीं किया जाए, तो सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा लुप्त हो सकता है।
डॉ. अर्जुन दास केशरी के कार्यों का महत्व इसी बात में है कि उन्होंने जनजातीय समाज और विंध्य क्षेत्र के सांस्कृतिक जीवन को साहित्य के माध्यम से दर्ज करने का प्रयास किया। उनकी पुस्तकें आज शोधार्थियों के लिए अध्ययन का आधार बन रही हैं।
भोजपुरी और पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाने में ऐसे साहित्यकारों का योगदान नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। डॉ. केशरी की साहित्यिक यात्रा यह संदेश देती है कि अपनी मिट्टी, बोली, लोकगाथाओं और परंपराओं को सहेजना समाज के भविष्य को सुरक्षित रखने जैसा है।
भोजपुरी24 की नजर में, डॉ. अर्जुन दास केशरी जैसे साहित्यकारों के योगदान को व्यापक स्तर पर सामने लाने की जरूरत है, ताकि लोकसंस्कृति की यह धरोहर पुस्तकों, शोध और जनचर्चा के माध्यम से जीवित रहे।





लोक की आत्मा,संस्कृति एवं परंपरा को जीवित रखने में उनके दस्तावेज धरोहर हैं।ऐसे मनीषी अमर होते हैं।ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें।ऐसी कामना है।