भोजपुरी गानों में बढ़ती अश्लीलता, फूहड़ता और द्विअर्थी शब्दों को लेकर छपरा में बहस तेज। बिहार में अश्लील और जातिसूचक गीतों पर प्रशासनिक सख्ती के बीच भोजपुरी की सांस्कृतिक छवि पर सवाल।
छपरा: भोजपुरी गीत-संगीत में बढ़ती अश्लीलता, फूहड़ता और दोहरे अर्थ वाले शब्दों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। छपरा में भोजपुरी गीतों की मौजूदा स्थिति को लेकर लोगों में नाराजगी देखने को मिली। लोगों का कहना है कि भोजपुरी की पहचान उसकी लोक संस्कृति, मिठास और सामाजिक सरोकारों से रही है, लेकिन कुछ नए गानों में अश्लील शब्दों और आपत्तिजनक प्रस्तुति के कारण भाषा की छवि प्रभावित हो रही है।
ये भी पढ़ें-भोजपुरी के पास है आठवीं अनुसूची में शामिल होने ले लिए समृद्ध व्याकरण परंपरा, विरोध गलत
भोजपुरी गीत आज बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अलावा देश के कई हिस्सों और विदेशों में भी सुने जाते हैं। शादी-विवाह, पर्व-त्योहार और सामाजिक आयोजनों में भोजपुरी संगीत की खास जगह है। ऐसे में अश्लील और द्विअर्थी गीतों को लेकर उठ रहे सवालों का असर केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि भाषा और संस्कृति की पहचान से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
सार्वजनिक जगहों पर अश्लील गानों को लेकर सख्ती
बिहार में हाल के महीनों में अश्लील और जातिसूचक गीतों के खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर भी सख्ती के संकेत मिले हैं। कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से गृह विभाग को सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील, द्विअर्थी और जातिसूचक गानों के प्रसारण पर रोक लगाने के संबंध में पत्र भेजे जाने की खबर सामने आई थी।
वहीं, मुजफ्फरपुर पुलिस ने सितंबर 2026 में सार्वजनिक स्थलों, बसों, ऑटो और डीजे पर अश्लील भोजपुरी गाने बजाने के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश जारी किए। पुलिस के मुताबिक नियमों का उल्लंघन करने पर एफआईआर के साथ वाहन और इस्तेमाल किए गए उपकरण जब्त किए जा सकते हैं।
सिर्फ अश्लीलता नहीं, जातिसूचक और हिंसक गीत भी चिंता का विषय
भोजपुरी संगीत को लेकर उठ रही बहस में केवल अश्लीलता ही मुद्दा नहीं है। कई बार जाति आधारित, धमकी, दबंगई और अपराध को महिमामंडित करने वाले गीतों पर भी सवाल उठते रहे हैं। इससे पहले बिहार विधानसभा में भी भोजपुरी गीतों में आपत्तिजनक और जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का मुद्दा उठ चुका है।
ये भी पढ़ें-भोजपुरी को कटघरे में खड़ा करने वाले अश्लीलता भाषा में है या नजर में?
जानकारों का कहना है कि व्यावसायिक सफलता की होड़ में गीतों में ऐसे शब्द और दृश्य शामिल किए जाते हैं जो तेजी से वायरल तो होते हैं, लेकिन भोजपुरी की पारंपरिक सांस्कृतिक छवि से मेल नहीं खाते।
भोजपुरी कलाकार भी उठा चुके हैं सवाल
भोजपुरी इंडस्ट्री से जुड़े कई कलाकार समय-समय पर साफ-सुथरे और पारिवारिक गीतों की जरूरत पर जोर देते रहे हैं। लोकगायिका खुशी कक्कड़ ने भी हाल में कहा कि गीत ऐसे होने चाहिए जिन्हें परिवार के साथ बैठकर सुना जा सके। भोजपुरी में अश्लीलता को लेकर पहले भी अभियान चल चुके हैं। अभिनेत्री नीतू चंद्रा ने भी भोजपुरी सहित बिहार की भाषाओं के गीतों में अश्लीलता के खिलाफ अभियान की बात कही थी।
सवाल भोजपुरी की छवि का
भोजपुरी सिर्फ एक मनोरंजन की भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की लोक-स्मृति, संस्कृति और सामाजिक जीवन से जुड़ी भाषा है। बिरहा, कजरी, सोहर, चैता, फगुआ और लोकगीतों की समृद्ध परंपरा भोजपुरी की सांस्कृतिक ताकत रही है।
ये भी पढ़ें-तुलु को आधिकारिक दर्जा और भोजपुरी की उपेक्षा क्यों?
ऐसे में छपरा समेत बिहार के अलग-अलग हिस्सों से उठ रही आवाजों के बीच बड़ा सवाल यही है कि भोजपुरी संगीत को लोकप्रिय भी कैसे रखा जाए और उसकी सांस्कृतिक गरिमा भी कैसे बचाई जाए।
भोजपुरी24 की बात: अश्लीलता के खिलाफ कार्रवाई के साथ यह भी जरूरी है कि भोजपुरी के लोक और पारंपरिक संगीत को नए मंच, नए कलाकार और बेहतर डिजिटल प्रमोशन मिले, ताकि अच्छी भोजपुरी सामग्री के लिए भी बड़ा दर्शक वर्ग तैयार हो।




