नरसिंह, संस्थापक-अध्यक्ष, भोजपुरी पुनर्जागरण मंच
भोजपुरी खाली बोलचाल के भाषा ना ह, ई हमनी के पहचान, संस्कृति आ सामूहिक चेतना के जीवंत अभिव्यक्ति ह। एकरा के संवैधानिक सम्मान मिले के मांग कवनो दोसर भाषा के विरोध में ना, बलुक अपना भाषा के सम्मान आ बराबरी के मौका मिले के पक्ष में उठावल गइल लोकतांत्रिक आवाज ह।
एक आदर्श समाज के बुनियाद एकता, सामाजिक सुरक्षा आ शांति पर टिकल होला। एकता खाली प्रशासनिक व्यवस्था से ना बने; एकरा पीछे साझा संस्कृति, सामाजिक संबंध आ अपना माटी-जड़ से जुड़ाव के भी बहुत बड़ भूमिका होला। मातृभाषा इंसान के ओकर सामाजिक आ सांस्कृतिक जड़ से जोड़े वाला सबसे प्रभावशाली माध्यम ह।
एही से मातृभाषा के सम्मान के भाषाई विखंडन यानी बंटवारा से जोड़ के देखल उचित नइखे। अनेक भाषा आ संस्कृति के सम्मान करत भी व्यापक सामाजिक आ राष्ट्रीय एकता कायम राखल जा सकेला। सच त ई बा कि विविधता के सम्मान लोकतांत्रिक एकता के अउरी मजबूत आधार देला।
भोजपुरी हमार पहचान आ सांस्कृतिक धरोहर ह
भोजपुरी खाली विचार आ भाव व्यक्त करे के साधन ना ह। एकरा में हमार लोकस्मृति, लोकगीत, लोककथा, परंपरा, संस्कार, हंसी-ठिठोली, पीड़ा, संघर्ष आ जीवन-दृष्टि सुरक्षित बा।
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संस्कृति अगर समाज के करेजा ह, त भाषा ओकर धड़कन ह।
भोजपुरी लोकगीत खाली गीत ना हवें; ऊ भोजपुरी समाज के सामाजिक जीवन आ सामूहिक अनुभव के आईना हवें। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलत आइल मौखिक परंपरा में समाज के इतिहास आ ओकर संवेदना सुरक्षित बा।
कवनो क्षेत्र के मातृभाषा के लगातार उपेक्षा के असर खाली भाषा तक सीमित ना रहेला। एकरा से नया पीढ़ी में अपना भाषा आ संस्कृति के प्रति हीनभावना पैदा हो सकेला आ आपन सांस्कृतिक पहचान से दूरी बढ़ सकेला। एही से मातृभाषा के संरक्षण आ विकास के सामाजिक सम्मान आ सांस्कृतिक आत्मविश्वास से जोड़ के देखल जरूरी बा।
भोजपुरी के खाली ‘बोली’ कह के समेटल ठीक ना
भोजपुरी के आपन व्यापक साहित्यिक आ सांस्कृतिक संसार बा। एकर आपन शब्द-भंडार, व्याकरणिक ढांचा, सर्वनाम, क्रिया-रूप, वाक्य-बनावट, उच्चारण के परंपरा आ समृद्ध लोक-साहित्य बा।
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भोजपुरी के भाषावैज्ञानिक रूप पर चर्चा करत घरी एकरा के खाली कवनो दोसर भाषा के साधारण ‘बोली’ मान के छोड़ देहल, एकरा व्यापक भाषाई आ साहित्यिक स्वरूप के पूरा तरह से व्यक्त ना करे। भोजपुरी के अलग-अलग क्षेत्रीय रूप आ उपभाषिक विविधता एकरा भीतरी समृद्धि के हिस्सा ह।
एही से जरूरत ई बा कि भोजपुरी के अध्ययन भावनात्मक लगाव के साथ-साथ भाषावैज्ञानिक आ अकादमिक नजरिया से भी गंभीरता से कइल जाव।
संवैधानिक मान्यता काहे जरूरी बा?
भारत के संविधान के आठवीं अनुसूची में फिलहाल 22 गो भाषा शामिल बाड़ी स। भोजपुरी अभी एह सूची में शामिल नइखे।
भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के मांग के कवनो दोसर भाषा के खिलाफ मांग के रूप में ना देखे के चाहीं। ई भोजपुरी भाषी समाज के भाषा, संस्कृति आ पहचान के संवैधानिक स्तर पर मान्यता देवे के मांग ह।
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संवैधानिक मान्यता आ खाली लोकप्रियता—दूनो अलग-अलग बात ह। कवनो भाषा करोड़ों लोग बोल सकेलें आ ओकर विशाल साहित्य भी हो सकेला, बाकिर संस्थागत मान्यता मिलला से ओकर विकास खातिर अलग तरह के अवसर आ संस्थागत प्रक्रिया उपलब्ध हो सकेला।
एही से भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के सवाल खाली भाषा के सवाल ना ह; ई सांस्कृतिक सम्मान, बराबरी के मौका आ सामाजिक पहचान से भी जुड़ल सवाल ह।
मातृभाषा आ शिक्षा
लइका जे भाषा में अपना आसपास के दुनिया के सहज रूप से समझेलें, ओही में शुरुआती शिक्षा मिलला से सीखे के प्रक्रिया अउरी स्वाभाविक हो सकेला। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350A राज्य आ स्थानीय प्रशासन से भाषाई अल्पसंख्यक समूह के लइकन खातिर प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा के पर्याप्त सुविधा उपलब्ध करावे के प्रयास के अपेक्षा रखेला।
मातृभाषा में शिक्षा के मतलब दोसर भाषन के विरोध कइल ना ह। एकरा उलट, मजबूत मातृभाषाई आधार के साथ लइका दोसर भारतीय आ अंतरराष्ट्रीय भाषा भी आसानी से सीख सकेलें।
एही से अइसन शिक्षा-व्यवस्था के जरूरत बा, जहां मातृभाषा सम्मानित होखे आ बहुभाषिकता यानी कई भाषा सीखे के क्षमता के भी बढ़ावा मिले।
संवैधानिक सम्मान आ नया पीढ़ी
जब कवनो भाषा के संस्थागत सम्मान मिलेला, त ओकर असर खाली सरकारी कागज तक सीमित ना रहेला। एकरा से ओ भाषा में पढ़ाई, लिखाई, साहित्य, शोध, शब्दकोश, शिक्षण सामग्री आ सांस्कृतिक गतिविधि के विकास खातिर अउरी अवसर पैदा हो सकेला।
सबसे जरूरी बात ई बा कि नया पीढ़ी अपना मातृभाषा के पिछड़ापन के निशानी ना, बलुक गौरव आ ज्ञान के भाषा के रूप में देखे।
भोजपुरी के विकास के लक्ष्य ई होखे के चाहीं कि भोजपुरी में साहित्य लिखल जाव, शोध होखे, आधुनिक ज्ञान के सामग्री तैयार होखे, डिजिटल संसाधन विकसित होखें आ लइकन तथा युवाओं के अपना भाषा में नीमन आ गुणवत्तापूर्ण सामग्री मिले।
ई कवनो भाषा के खिलाफ आंदोलन ना ह
भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के मांग के कवनो दोसर भारतीय भाषा के विरोध के रूप में देखावल ठीक नइखे। भारत के ताकत ओकर भाषाई आ सांस्कृतिक विविधता में बा। एक भाषा के सम्मान दोसर भाषा के अपमान पर टिकल ना होखे के चाहीं। हमार मकसद केहू से कुछ छीने के ना ह, बलुक भोजपुरी के ओकर उचित आ वाजिब सम्मान दिलावे के ह। भोजपुरी के सम्मान हिंदी के विरोध में नइखे आ ना ही भारत के भाषाई एकता के खिलाफ बा। ई भारत के बहुभाषिक आ बहुसांस्कृतिक परंपरा के भीतर भोजपुरी के खास पहचान के सम्मान देवे के प्रयास ह।
जन-जागरण ही बदलाव के आधार ह
भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता दिलावे खातिर खाली राजनीतिक घोषणा काफी नइखे। समाज में जागरूकता, अकादमिक पढ़ाई-लिखाई, साहित्यिक गतिविधि, शिक्षाविदन के सहयोग, युवाओं के भागीदारी आ लोकतांत्रिक तरीका से लगातार जनसंवाद जरूरी बा।
भोजपुरी पुनर्जागरण मंच के जन-जागरण अभियान एही व्यापक मकसद से जुड़ल एगो समावेशी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयास हो सकेला, जेमे समाज के अलग-अलग वर्ग के भागीदारी होखे।
भोजपुरी समाज के अपना भाषा के प्रति आत्मगौरव पैदा करे के परी। हमनी के घर में भोजपुरी बोले में लजाए के ना, बलुक गर्व महसूस करे के परी। लइकन के भोजपुरी साहित्य आ लोक-संस्कृति से जोड़े के परी। भोजपुरी में लेखन, पठन-पाठन, शोध आ डिजिटल सामग्री के बढ़ावा देवे के परी।
अब सवाल खाली भाषा के ना, हमनी के जिम्मेवारी के बा
भाषा तबे जीवित आ सामर्थ्यवान रहेली, जब ओकरा बोले वाला लोग ओकरा के सम्मान देला, ओकर इस्तेमाल करेला आ आवे वाली पीढ़ी तक पहुंचावेला। एही से भोजपुरी के संवैधानिक सम्मान के मांग खाली सरकार से कइल जाए वाली मांग ना ह; ई भोजपुरी समाज के सामने भी एगो बड़ जिम्मेवारी बा। हमनी अपना मातृभाषा के सम्मान दीं, ओकरा के शिक्षा आ ज्ञान से जोड़ीं, ओकर साहित्य आ संस्कृति के संजो के राखीं आ लोकतांत्रिक तरीका से ओकर संवैधानिक सम्मान के आवाज उठाईं।
भोजपुरी हमार आवाज ह।
भोजपुरी हमार सांस्कृतिक चेतना ह।
भोजपुरी हमार पहचान ह।
भोजपुरी के संवैधानिक सम्मान के मांग कवनो बंटवारा के आवाज ना-ई सम्मान, समता आ सांस्कृतिक अधिकार के लोकतांत्रिक आवाज ह।
नरसिंह, पूर्व प्रधानाचार्य- संस्थापक-अध्यक्ष, भोजपुरी पुनर्जागरण मंच




