‘गांव की भाषा’ मानकर हीन भावना से जुड़ेंगे तो खत्म हो जाएगी भोजपुरी

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भोजपुरी के अस्तित्व का सवाल है भाषा और बोली की शुद्धता में गिरावट

भोजपुरी की असली ताकत उसकी सादगी और आत्मीयता में है और यही वह विरासत है, जिसे सहेजना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है।

भोजपुरी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें लोकजीवन की सहजता, भावनाओं की गहराई और सामाजिक संबंधों की गर्माहट समाई हुई है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल, बिहार के पश्चिमी हिस्सों और प्रवासी भारतीयों के बीच फैली यह भाषा करोड़ों लोगों की पहचान रही है। लेकिन आज भोजपुरी अपनी शुद्धता और मौलिक स्वरूप को लेकर गंभीर संकट से गुजर रही है। बदलती जीवनशैली, तकनीकी प्रभाव और बाजारवाद ने इसे एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां इसका मूल रूप लगातार धुंधला पड़ता जा रहा है।

ऐतिहासिक विरासत और भाषाई समृद्धि का क्षरण
भोजपुरी भाषा का इतिहास सदियों पुराना है। भिखारी ठाकुर जैसे लोकनाट्यकारों ने इसे सामाजिक चेतना का माध्यम बनाया। ‘बिदेसिया’ और ‘गबरघिचोर’ जैसे नाटकों में शुद्ध भोजपुरी का प्रयोग हुआ, जो आज भी भाषा की ताकत का उदाहरण हैं।
भोजपुरी में संस्कृत, अवधी और मगही के शब्दों का सुंदर समन्वय मिलता है। जैसे का हो, कइसन बा, तू कहाँ जाताड़ जैसे वाक्य इसकी मौलिकता को दर्शाते हैं। लेकिन आज इनकी जगह क्या कर रहे हो, कैसे हो जैसे हिंदी मिश्रित वाक्य तेजी से बढ़ रहे हैं। यह बदलाव केवल शब्दों का नहीं, बल्कि पूरी भाषाई पहचान के क्षरण का संकेत है।

शहरीकरण और हिंदी-अंग्रेज़ी का बढ़ता प्रभाव
आधुनिक शिक्षा और रोजगार के अवसरों ने युवाओं को शहरों की ओर आकर्षित किया है। वहां हिंदी और अंग्रेज़ी का दबदबा है। परिणामस्वरूप, भोजपुरी बोलने में संकोच पैदा होने लगा है। एक सर्वे के अनुसार (भाषाई अध्ययन, 2019), शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 60% भोजपुरी भाषी युवा सार्वजनिक स्थानों पर भोजपुरी बोलने से बचते हैं। वे इसे ‘गांव की भाषा’ मानकर हीन भावना से जोड़ते हैं।
उदाहरण के तौर पर, पहले जहां घरों में ‘खइबू का?’ कहा जाता था, अब ‘खाना खाओगे?’ ज्यादा प्रचलित हो गया है। यह बदलाव धीरे-धीरे पूरी पीढ़ी की भाषा को बदल रहा है।

सोशल मीडिया और मनोरंजन उद्योग की भूमिका
डिजिटल युग में सोशल मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री भाषा के सबसे बड़े वाहक बन गए हैं। लेकिन भोजपुरी के संदर्भ में यह माध्यम दोधारी तलवार साबित हुआ है। भोजपुरी फिल्मों और गानों में शुद्ध भाषा की बजाय अशुद्ध, मिश्रित और कई बार अश्लील भाषा का प्रयोग बढ़ गया है। इससे भाषा की गरिमा और शुद्धता दोनों प्रभावित हो रही हैं। उदाहरण के तौर पर, पुराने समय के गीत-
‘पिया गए ससुराल हो राम”’
जहां भावनात्मक गहराई और शुद्धता लिए होते थे, वहीं आज कई गानों में भाषा का स्तर गिरता दिखता है। YouTube और Reels पर भी हिंग्लिश भोजपुरी का ट्रेंड बढ़ रहा है जैसे हम going market या तू awesome बा- जो भाषा के मूल स्वरूप को विकृत कर रहा है।

शिक्षा व्यवस्था में भोजपुरी की उपेक्षा
भोजपुरी को अभी तक संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिला है, जिससे इसे शैक्षणिक और सरकारी स्तर पर वह मान्यता नहीं मिल पाई, जिसकी यह हकदार है। स्कूलों और कॉलेजों में भोजपुरी पढ़ाई नहीं जाती, जिससे नई पीढ़ी इसे केवल बोलचाल तक सीमित समझती है। परिणामस्वरूप, व्याकरण, शुद्ध शब्दावली और साहित्य से उनका संपर्क टूटता जा रहा है।

अगर तुलना करें, तो मैथिली और संथाली जैसी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के बाद उनके साहित्य और अध्ययन में वृद्धि हुई है। भोजपुरी के साथ ऐसा न होना इसके विकास में एक बड़ी बाधा है।

पारिवारिक परिवेश और पीढ़ीगत अंतर
भोजपुरी की सबसे बड़ी ताकत उसका पारिवारिक परिवेश था, जहां बच्चे जन्म से ही इसे सीखते थे। दादी-नानी की कहानियां, लोकगीत और रोजमर्रा की बातचीत में भोजपुरी का प्रयोग होता था। लेकिन आज के न्यूक्लियर फैमिली सिस्टम में यह परंपरा टूट रही है। माता-पिता बच्चों से हिंदी या अंग्रेज़ी में बात करना आधुनिकता का प्रतीक मानने लगे हैं।
एक सामान्य उदाहरण-
पहले बच्चे “माई” और “बाबूजी” कहते थे, अब “मम्मी-पापा” आम हो गया है।
इस बदलाव से भाषा की जड़ें कमजोर हो रही हैं, क्योंकि भाषा केवल शब्द नहीं, बल्कि भावनात्मक संबंधों का माध्यम भी होती है।

संरक्षण के प्रयास और संभावित समाधान
हालांकि स्थिति चिंताजनक है, लेकिन पूरी तरह निराशाजनक नहीं। कई स्तरों पर भोजपुरी को बचाने के प्रयास भी हो रहे हैं। कुछ यूट्यूब चैनल और ब्लॉग शुद्ध भोजपुरी में कंटेंट बना रहे हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में भोजपुरी पर शोध कार्य हो रहा है। दूसरी तरफ भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लगातार उठ रही है।
समाधान के रूप में स्कूल स्तर पर भोजपुरी को वैकल्पिक भाषा के रूप में शामिल किया जाए। शुद्ध भोजपुरी कंटेंट को बढ़ावा दिया जाए। लोक कलाकारों और लेखकों को आर्थिक सहयोग मिले। परिवारों में बच्चों से भोजपुरी में संवाद को प्रोत्साहित किया जाए। साथ ही भोजपुरी को रोजगार की भाषा बनाने के दिशा में भी प्रयास हो.

अंत में बस यही कहूंगा कि भोजपुरी भाषा आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां उसका अस्तित्व और शुद्धता दोनों दांव पर हैं। यह केवल भाषाई संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का संकट है। अगर समय रहते इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां भोजपुरी को केवल एंटरटेनमेंट की भाषा के रूप में देखेंगी, न कि एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के रूप में। भोजपुरी को बचाने के लिए केवल नीतियों की नहीं, बल्कि सामूहिक जागरूकता और प्रयास की जरूरत है। जब तक लोग खुद अपनी भाषा पर गर्व नहीं करेंगे, तब तक इसकी शुद्धता और पहचान को बचाना मुश्किल होगा।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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