गिरमिटिया इतिहास के साक्षी और भोजपुरी-फिजी हिंदी संस्कृति के संरक्षक हैं राजेंद्र प्रसाद

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न्यूजीलैंड/फिजी: फिजी के बा (Ba) क्षेत्र में जन्मे राजेंद्र प्रसाद आज इंडो-फिजियन डायस्पोरा के उन दुर्लभ आवाजों में से एक हैं, जो गिरमिटिया अतीत को सिर्फ याद नहीं करते, बल्कि उसे जीवंत बनाते हैं। वे लेखक, इतिहासकार, गीतकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। उनकी सबसे चर्चित कृति Tears in Paradise: Suffering and Struggles of Indians in Fiji 1879-2004 ने फिजी के भारतीय मूल के लोगों के दर्द, संघर्ष और लचीलेपन को दुनिया के सामने लाया। गिरमिटिया दादा-दादी के वंशज होने के नाते प्रसाद का लेखन न सिर्फ ऐतिहासिक दस्तावेज है, बल्कि भावनात्मक यात्रा भी है, जो ‘स्वर्ग के आंसू’ की कहानी बयान करती है।

गिरमिट की कड़वी सच्चाई

1879 में पहला जहाज लियोनिडास (Leonidas) फिजी पहुंचा था। लगभग 60,500 भारतीय, ज्यादातर बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से, ब्रिटिश कॉलोनियल सिस्टम के तहत गिरमिट (indenture) पर फिजी लाए गए। उन्हें चीनी के खेतों में काम करने के लिए ‘5 साल के गुलाम’ की तरह लुभाया गया। झूठे वादों के सहारे वे ‘स्वर्ग’ की तलाश में निकले, लेकिन पहुंचे तो नर्क में।

राजेंद्र प्रसाद की किताब में ये दृश्य जीवंत हो उठते हैं, ओवरसियर की कोड़े की मार, आधे नंगे शरीर पर पड़ती लाठी, महिलाओं का शोषण, आत्महत्याएं और निरंतर भय। प्रसाद लिखते हैं कि गिरमिटिया पीढ़ी ने अत्याचार सहन किया, लेकिन अपनी संस्कृति, भाषा और पहचान को बचाए रखा। उन्होंने फिजी को जंगल से हरा-भरा खेतों वाला देश बनाया, फिर भी इतिहास की किताबों में उनका नाम गायब रहा। प्रसाद कहते हैं, ‘यह गायब होना संयोग नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया था।’

Tears in Paradise 2004 में पहली बार प्रकाशित हुई और कई बार संशोधित हुई। किताब में लेखक अपनी पारिवारिक जड़ों की तलाश करते हैं, गिरमिटिया पूर्वजों की कहानियां इकट्ठा करते हैं और ब्रिटिश शोषण की क्रूर तस्वीर पेश करते हैं। समीक्षकों ने इसे आंखें नम करने वाली और आश्चर्यजनक बताया। न्यूजीलैंड में रहने वाले प्रसाद 1987 के सैन्य तख्तापलट के बाद फिजी छोड़कर गए, लेकिन उनका दिल हमेशा वहां रहा। वे खुद को गिरमिटिया पीढ़ी का वंशज मानते हैं, जो दर्द से निकली लचीलापन (resilience) की मिसाल है।

लेखक से गीतकार तक

राजेंद्र प्रसाद केवल इतिहासकार नहीं हैं। वे भोजपुरी और फिजी हिंदी (जिसे फिजी बात भी कहते हैं) की परंपरा के सक्रिय संरक्षक हैं। फिजी में भोजपुरी-आवधी का मिश्रण हुआ और फिजी हिंदी का जन्म हुआ, जो आज भी इंडो-फिजियन समुदाय की पहचान है। प्रसाद ने कई गिरमिट गीत और भजन लिखे हैं।

उनका गीत ‘Fiji Girmit Bidesiya’ आज भी लोकप्रिय है। इसमें वे बिदेसिया की पीड़ा, घर से दूर होने का दर्द और नई भूमि में बसने की कहानी गाते हैं। वे भजन भी गाते हैं तंबूरा और ढोलक के साथ फिजी भजन। कुछ गीतों में वे पारंपरिक लोकगीत शैली को गिरमिट अनुभव से जोड़ते हैं। प्रसाद की लेखनी और गायकी दोनों में भोजपुरी की सरलता, भावुकता और सांस्कृतिक गहराई दिखती है।

वे फिजी हिंदी को लेकर भी सक्रिय रहे हैं। एक लेख में उन्होंने लिखा कि फिजी हिंदी अनपढ़ नहीं, बल्कि गिरमिटिया अनुभव से जन्मी जीवंत भाषा है। बिहार-यूपी की भोजपुरी-आवधी से निकली यह भाषा आज फिजी में सांस्कृतिक पुल का काम करती है।

सांस्कृतिक संरक्षण और नई पीढ़ी

प्रसाद का काम सिर्फ किताब तक सीमित नहीं। 2025 में उन्होंने अपनी पत्नी अरुणा प्रसाद के साथ डॉक्यूमेंट्री ‘Girmit: The Fields of Sadness’ बनाई, जो उनकी किताब पर आधारित है। इसमें गिरमिटिया जीवन की कठिनाइयां, कड़ी मेहनत, सांस्कृतिक पहचान का नुकसान, जबरन धर्मांतरण दिखाई गई हैं। प्रसाद ने कहा कि गिरमिटिया इतिहास स्कूल की किताबों से गायब था। मैंने महसूस किया कि यह जानबूझकर किया गया। अब नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि उनके पूर्वजों ने क्या सहा।

वे नियमित रूप से लेख लिखते हैं, फिजी और न्यूजीलैंड के समुदायों में बोलते हैं और गिरमिट दिवस (14 मई) पर याद दिलाते हैं कि फिजी की समृद्धि गिरमिटिया खून-पसीने से बनी है। उनके अनुसार, गिरमिटिया न सिर्फ मजदूर थे, बल्कि फिजी के निर्माणकर्ता थे, जिन्होंने अपनी भाषा, रामलीला, होली, दीवाली और लोकगीतों को बचाया।

विरासत और संदेश

आज राजेंद्र प्रसाद न्यूजीलैंड में रहते हैं, लेकिन उनकी आवाज फिजी, भारत, मॉरिशस, सूरीनाम और कैरेबियन के गिरमिटिया डायस्पोरा तक पहुंचती है। वे कहते हैं कि दर्द को भूलना नहीं चाहिए, बल्कि उससे सीखना चाहिए, सहिष्णुता, एकता और सांस्कृतिक गर्व। उनकी किताब और गीत युवाओं को याद दिलाते हैं कि “स्वर्ग” आसान नहीं मिलता; उसे बनाने के लिए आंसू बहाने पड़ते हैं।

Tears in Paradise पढ़ने या प्रसाद के गीत सुनने के बाद कोई भी सोचने पर मजबूर हो जाता है, गिरमिटिया कहानी सिर्फ फिजी की नहीं, पूरे भारतीय डायस्पोरा की है। वे उन लाखों अनाम आत्माओं की आवाज हैं, जिन्हें कुली कहा गया, लेकिन जिन्होंने नई दुनिया बसाई। राजेंद्र प्रसाद जैसे लोग हमें सिखाते हैं कि इतिहास को दबाया नहीं जा सकता। वह लौटकर आता है किताबों में, गीतों में और उन आंसुओं में जो स्वर्ग को भी नम कर देते हैं। उनकी विरासत भोजपुरी-फिजी हिंदी को जीवित रखेगी और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ेगी।

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