पटना/वाराणसी : ग्रामीण जीवन की सच्ची तस्वीर, गांव की मिट्टी की महक और पूर्वांचल की पीड़ा को शब्दों में उतारने वाले साहित्यकार हैं डॉ. विवेकी राय। हिंदी और भोजपुरी दोनों भाषाओं में उन्होंने 85 से अधिक पुस्तकें लिखीं और भोजपुरी गद्य साहित्य को मजबूत आधार प्रदान किया। उपन्यास, कहानी, निबंध और आलोचना में उनका योगदान आज भी बेजोड़ माना जाता है।
ग्रामीण मिट्टी से निकला साहित्यकार
डॉ. विवेकी राय का जन्म 19 नवंबर 1924 को हुआ। उनका ननिहाल बलिया जिले के भरौली गांव में था, जबकि पैतृक गांव गाजीपुर जिले का सोनवानी था। बचपन खेती-बाड़ी और गांव की सादगी भरी जिंदगी में बीता। शुरू में उन्होंने खेती का काम भी किया, लेकिन पढ़ाई के प्रति लगन ने उन्हें अध्यापन profession की ओर मोड़ा। ग्रामीण भारत की हकीकत को उन्होंने करीब से देखा। यही अनुभव बाद में उनके साहित्य की जान बन गया। उन्होंने गांव की स्त्रियों की पीड़ा, किसानों की मजबूरियां, सामाजिक रूढ़ियों और मानवीय संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में जीवंत किया।
भोजपुरी गद्य साहित्य के मजबूत स्तंभ
भोजपुरी साहित्य में गद्य विधा को विकसित करने वाले प्रमुख लेखकों में विवेकी राय का नाम सबसे आगे आता है। उन्होंने भोजपुरी में उपन्यास, कहानी और समीक्षा लिखकर इस भाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। उनका प्रसिद्ध भोजपुरी उपन्यास ‘अमंगलहारी’ (1998) को भोजपुरी कथा साहित्य की महत्वपूर्ण कृति माना जाता है। इसके अलावा उन्होंने ‘भोजपुरी कथा साहित्य के विकास’ जैसी समीक्षा पुस्तक भी लिखी, जिसमें भोजपुरी गद्य की यात्रा को विस्तार से रेखांकित किया। वे भिखारी ठाकुर की लोक परंपरा के बाद भोजपुरी को आधुनिक गद्य रूप देने वाले प्रमुख साहित्यकार थे। उनकी रचनाएं पाठकों को गांव की जमीनी हकीकत से जोड़ती हैं।
हिंदी साहित्य में अविस्मरणीय योगदान
विवेकी राय सिर्फ भोजपुरी तक सीमित नहीं रहे। हिंदी में उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें आठ उपन्यास, नौ कहानी संग्रह, आठ निबंध संग्रह और कई समीक्षा ग्रंथ शामिल हैं। उनका लोकप्रिय उपन्यास ‘सोनामती’ काफी चर्चित रहा। अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं में ‘चुनरी रंगला’, ‘देहरी के पार’, ‘सर्कस’ आदि शामिल हैं। वे ललित निबंधकार के रूप में भी प्रसिद्ध थे। उनकी निबंध शैली सरल, गहरी और ग्रामीण जीवन से जुड़ी हुई थी। आपातकाल के दौरान उन्होंने सत्ता की आलोचना भी की, जो उनके साहसी लेखन का प्रमाण है। कई कृतियों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।
विवेकी राय जब किसी से मिलते थे, तो अपनी सहजता, विद्वता और व्यंग्यात्मक शैली से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। उनकी बातचीत में वही सादगी और गहराई झलकती थी, जो उनकी लेखनी की पहचान है। वे सामान्य से विषयों को भी इस तरह प्रस्तुत करते कि श्रोता उनके विचारों में खो जाते। उनकी वाणी में ग्रामीण जीवन की मिठास और मानवीय संवेदनाओं की गहराई होती थी, जो हर व्यक्ति के दिल को छू जाती थी।
अमर विरासत और संदेश
22 नवंबर 2016 को वाराणसी में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी पाठकों और शोधकर्ताओं को प्रेरित करती हैं। जन्म शताब्दी (2024) पर भी उन्हें याद किया गया और उनकी साहित्य साधना पर चर्चाएं हुईं। डॉ. विवेकी राय ने साबित किया कि साहित्य सिर्फ शहर की बात नहीं करता है, वह गांव की मिट्टी, किसान की पसीने और आम आदमी की भावनाओं को भी उतना ही महत्व देता है। उनकी रचनाएं भोजपुरी भाषा को नई ऊंचाई देने के साथ-साथ हिंदी साहित्य को भी समृद्ध करती हैं। अंत में विवेकी राय का साहित्य हमें याद दिलाता है कि सच्ची साहित्यिकता जड़ों से जुड़ी होती है। भोजपुरी गद्य के इस स्तंभ को सलाम!

