डॉ. राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से रघुबीर नारायण ने 1911 में रचले रहस ‘बटोहिया’; देशभक्ति, भोजपुरी अस्मिता और गिरमिटिया समाज के दर्द के आजो जिंदा रखले बा ई गीत
भोजपुरी24 डेस्क: भोजपुरी भाषा के साहित्यिक आ सांस्कृतिक विरासत में कुछ रचना अइसन बाड़ी स, जे समय के सीमा पार करके पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग के मन में बसल रहेली। अइसने एगो अमर गीत हऽ ‘बटोहिया’, जेकरा के भोजपुरी के ‘वंदे मातरम’ भी कहल जाला। देशप्रेम, माटी से जुड़ाव आ अपना देश से दूर रहे के पीड़ा के आवाज देवे वाला ई गीत आज 115 साल बादो भोजपुरी समाज खातिर खास महत्व रखेला।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रेरणा से रचाइल गीत
‘बटोहिया’ के रचना साल 1911 में बिहार के सारण जिला के कवि आ विद्वान रघुबीर नारायण कइले रहले। प्रचलित विवरण के मुताबिक, डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रेरणा से ऊ भोजपुरी में लिखे के दिशा में आगे बढ़लें। अपना मातृभाषा में रचल ई गीत धीरे-धीरे आम लोग के जुबान पर चढ़ गइल आ भोजपुरी क्षेत्र में देशप्रेम के भावना जगावे के माध्यम बनल।
रघुबीर नारायण के एह रचना में खाली देश के प्राकृतिक सुंदरता के वर्णन नइखे, बल्कि भारत के संस्कृति, परंपरा आ गौरव के भी चित्रण बा। गीत में भारत के धरती के महिमा आ अपना वतन से जुड़ल भावनात्मक रिश्ता के प्रमुखता मिलेला।
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‘बटोहिया’ में बसल बा परदेस के पीड़ा
‘बटोहिया’ शब्द के अर्थ यात्री भा राहगीर होला। गीत में विदेश में रहत एगो अइसन व्यक्ति के भाव सामने आवेला, जे अपना मातृभूमि से दूर बा आ भारत जाए वाला यात्री से देश के हाल जाने के आग्रह करेला।
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ब्रिटिश शासन के दौर में बिहार आ पूर्वी उत्तर प्रदेश से बहुत लोग गिरमिटिया मजदूर के रूप में मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद आ अउरी देशन में गइल। ओह लोग के कई पीढ़ी विदेश में बस गइल, बाकिर अपना पुरखा के माटी, भाषा आ संस्कृति से जुड़ाव बनल रहल। ‘बटोहिया’ जइसन गीत एह भावनात्मक रिश्ता के जिंदा रखे में महत्वपूर्ण भूमिका निभवलस।
सात देश के 11 गायकन के आवाज में गूंजल ‘बटोहिया’
लाइव हिन्दुस्तान के रिपोर्ट के मुताबिक, भारत, सूरीनाम, हॉलैंड, मॉरीशस, त्रिनिदाद, गुयाना आ फिजी समेत सात देश के 11 गायक मिलकर एह गीत के गवले रहले। एह प्रस्तुति में अलग-अलग देश में बसल भारतीय मूल के लोग के भागीदारी भोजपुरी के वैश्विक पहचान आ गिरमिटिया विरासत से जुड़ल भावनात्मक रिश्ता के सामने ले आवेला।
भोजपुरी अस्मिता के प्रतीक
‘बटोहिया’ के लोकप्रियता के पीछे ओकर सरल भाषा, देशप्रेम से भरल भाव आ अपना माटी से जुड़ल संवेदना बा। एह गीत में भारत के भौगोलिक सुंदरता के साथे सांस्कृतिक विविधता के भी जगह मिलल बा। एही कारण से भोजपुरी साहित्य आ लोक-संस्कृति में एकर स्थान विशिष्ट मानल जाला।
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आज जब भोजपुरी भाषा के संवैधानिक पहचान, साहित्यिक समृद्धि आ वैश्विक प्रसार पर चर्चा हो रहल बा, तब ‘बटोहिया’ जइसन ऐतिहासिक रचना के नई पीढ़ी तक पहुंचावल जरूरी बा। ई गीत याद दिलावेला कि भोजपुरी खाली मनोरंजन के भाषा नइखे, बल्कि देशप्रेम, इतिहास, प्रवास आ सांस्कृतिक चेतना के सशक्त माध्यम भी हऽ।




