राजेश भोजपुरिया
राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त कवि, गीतकार, नवगीतकार और गजलकार का साहित्यिक सफर
“जीनगी में चारो ओर
पहरा अमावस के,
असरा के फाटे कबो पहना…
एही रे नगरिया में केहि विधि रहना,
केहि विधि रहना…”
भोजपुरी साहित्य के राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कवि, गीतकार, नवगीतकार, गजलकार और साहित्यकार गंगा प्रसाद अरुण जी का पूरा जीवन भोजपुरी भाषा और संस्कृति की साधना में समर्पित रहा। पांच दशक से अधिक समय तक अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने भोजपुरी साहित्य को नई ऊंचाई दी। उनकी रचनाओं में लोकजीवन की पीड़ा, सामाजिक संवेदना, मानवीय रिश्तों की गर्माहट और समय की विसंगतियों का सशक्त चित्रण मिलता है।
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भोजपुरी साहित्य की यात्रा में पांच दशक से अधिक का योगदान
गंगा प्रसाद अरुण जी वर्ष 1966 में जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद की कार्यसमिति के लिए चयनित हुए। इससे पहले से ही वे भोजपुरी में निरंतर लेखन कर रहे थे। बाद में वे परिषद की प्रवर समिति के सदस्य और आजीवन सदस्य भी रहे। वर्ष 2013 में वे सिंहभूम जिला भोजपुरी साहित्य परिषद के संस्थापक अध्यक्ष बने। वर्ष 2014 में व्यक्तिगत कारणों से संस्था से त्यागपत्र देने के बाद भी उनकी साहित्यिक यात्रा निरंतर जारी रही। इसी दौरान उन्होंने स्वतंत्र रूप से लेखन करते हुए लकीर पत्रिका का प्रकाशन भी किया।
वे अनेक भोजपुरी साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहे। इनमें जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद के पूर्व प्रवर समिति सदस्य एवं आजीवन सदस्य, रचनाकार संस्था के प्रधान सचिव, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पटना की कार्यसमिति एवं प्रवर समिति के सदस्य, भोजपुरी जन जागरण अभियान झारखंड इकाई के मुख्य संरक्षक, जमशेदपुर हिंदी परिषद, बेनीपुरी साहित्य परिषद और साहित्य सेवा समिति जैसे संस्थान प्रमुख रहे।
भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करती रचनाएं
अरुण जी की कलम हिंदी के साथ-साथ भोजपुरी में भी समान रूप से सक्रिय रही। लगभग 50 वर्षों से अधिक समय तक उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भोजपुरी साहित्य की सेवा की। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में हहरत हियरा (1974), अंगना महुआ झरल (2010), तीन डेगे त्रिलोक (2013), गजल गवाह बनी (2018), प्रेम न बाड़ी ऊपजै (2020), मनुवा मनगीत लिखे (2021), द्वंद्व समास (2021) और समय के डंक झेलने आए (2026) प्रमुख हैं।

उनकी कई रचनाएं विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनीं। भोजपुरी गीत-नवगीत संग्रह अंगना महुआ झरल की सात रचनाओं को बिहार विश्वविद्यालय के एम.ए. भोजपुरी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। इसके अलावा उनका यात्रा वृत्तांत फोकट में सैर भी विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाया गया।

उनकी कई पुस्तकें प्रकाशन की प्रक्रिया में थीं, जिनमें दोहा वीथिका, गोड़ में बाँस और अतुकान्तिकाएं प्रमुख हैं। उनके सुपुत्र राजेश भोजपुरिया द्वारा हहरत हियरा और गजल गवाह बनी के नए संस्करण के प्रकाशन का प्रयास जारी है।
बहुआयामी लेखन शैली के धनी साहित्यकार
गंगा प्रसाद अरुण जी ने गीत, नवगीत, मनगीत, गजल, दोहा, हाइकु, बिरहा, अतुकांतिका और ललित गद्य जैसी अनेक विधाओं में अपनी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया। उनकी रचनाओं में भोजपुरी समाज की संस्कृति, लोकजीवन और आम आदमी की संवेदनाएं प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं।
संपादन क्षेत्र में भी रहा महत्वपूर्ण योगदान
साहित्य सृजन के साथ-साथ अरुण जी ने संपादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लुकार, लकीर, रचनाकार, विकासवार्ता और पर्यावरण चिंतन जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया।
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उन्होंने जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद की रजत जयंती और स्वर्ण जयंती स्मारिकाओं के अलावा अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 24वें अधिवेशन की स्मारिका इस्पातिका का भी संपादन किया।
इसके अतिरिक्त उन्होंने अगुआ (भोजपुरी लघुकथा संग्रह), बीना के तान (भोजपुरी गीत संग्रह), सुपुली भर तरेगन (भोजपुरी काव्य संकलन), फूल हरसिंगार के, हरिशंकर वर्मा स्मृति ग्रंथ, निर्भीक अभिनंदन ग्रंथ और शोध ग्रंथों के संपादन में योगदान दिया।
कवि सम्मेलनों और प्रसारण माध्यमों में पहचान
गंगा प्रसाद अरुण जी ने झारखंड, बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और दिल्ली के अनेक मंचों पर अपनी रचनाओं का सस्वर पाठ किया। उनकी ओजपूर्ण और भावपूर्ण प्रस्तुति श्रोताओं को हमेशा आकर्षित करती रही।
वर्ष 2018 में दिल्ली सरकार की मैथिली-भोजपुरी अकादमी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में उन्हें आमंत्रित किया गया, जहां उन्होंने अपनी रचनाओं का पाठ किया।
उनकी कविताओं और गीतों का प्रसारण आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों से होता रहा। दूरदर्शन और सहारा समय जैसे माध्यमों पर भी उनकी रचनाएं प्रसारित हुईं। आकाशवाणी द्वारा चयनित उनके पांच राष्ट्रीय चेतना गीतों को संगीतबद्ध कर देश के विभिन्न केंद्रों से प्रसारित किया गया।
दिग्गज साहित्यकारों के साथ साझा किया मंच
अरुण जी ने हिंदी और भोजपुरी साहित्य के अनेक दिग्गज रचनाकारों के साथ मंच साझा किया। इनमें आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, रामधारी सिंह दिनकर, जनकवि नागार्जुन, काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी, अज्ञेय, शंकर दयाल सिंह, भोलानाथ गहमरी, आचार्य महेंद्र शास्त्री, विश्वनाथ प्रसाद शैदा, डॉ. रामविचार पांडेय सहित कई साहित्यकार शामिल रहे।
सम्मान और पुरस्कारों से अलंकृत साहित्य साधक
भोजपुरी साहित्य की लंबी सेवा के लिए गंगा प्रसाद अरुण जी को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। इनमें भिखारी ठाकुर सम्मान, डॉ. प्रभुनाथ सिंह सम्मान (विश्व भोजपुरी सम्मेलन, दिल्ली), इस्पात भारती सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मान, भोजपुरी सेवी सम्मान, संकल्प साहित्य शिरोमणि सम्मान, सरदार पटेल सम्मान, आचार्य महेंद्र शास्त्री पुरस्कार, विश्व भोजपुरी सम्मेलन सम्मान, भोजपुरी अस्मिता सम्मान, पाती अक्षर सम्मान, प्रथम एकादश और डॉ. रामसेवक विकल स्मृति सम्मान प्रमुख हैं।
साहित्य के साथ कला और सज्जा में भी रुचि
अरुण जी साहित्य के साथ-साथ कला और सज्जा के क्षेत्र में भी रुचि रखते थे। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के मुखपृष्ठ तैयार किए। लुकार, लकीर, विकासवार्ता, शाहाबादी रचनावली, भोजपुरी लोकधारा, हहरत हियरा, पारिजात कल्प, मानवी, पर्यावरण चिंतन, रचनाकार, तीन डेगे त्रिलोक और गजल गवाह बनी जैसी अनेक कृतियों की सज्जा में उनका योगदान रहा।
भोजपुरी साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति
भोजपुरी साहित्य की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले गंगा प्रसाद अरुण जी की लेखनी लंबी बीमारी के बाद 15 अगस्त 2025 को हमेशा के लिए शांत हो गई। उनका निधन भोजपुरी साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।
उनकी रचनाएं और साहित्यिक योगदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे। भोजपुरी भाषा और संस्कृति के इस महान साधक को बारंबार नमन।

