भोजपुरी को हेय दृष्टि से देखने वालों पर व्यंग्य के जरिए उठाई आवाज, भाषा और संस्कृति के सम्मान का संदेश
भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर समाज में फैली गलत धारणाओं पर चर्चित कवि और साहित्यकार मनोज भावुक ने अपनी कविताओं के माध्यम से तीखा प्रहार किया है। अपनी रचनाओं में वे भोजपुरी के सम्मान, उसकी समृद्ध परंपरा और उससे जुड़े लोगों के आत्मसम्मान की आवाज बुलंद करते हैं।
मनोज भावुक केवल रूप-श्रृंगार और जीवन-दर्शन के कवि नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक विसंगतियों, सांस्कृतिक उपेक्षा और भाषा के साथ हो रहे भेदभाव पर भी अपनी लेखनी से सवाल उठाते हैं। उनकी कविताओं में भोजपुरी समाज की पीड़ा, संघर्ष और स्वाभिमान की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
भोजपुरी को कमतर समझने वाली सोच पर व्यंग्य
भोजपुरी को कई बार केवल मनोरंजन या लोकगीतों तक सीमित करके देखने वाली मानसिकता पर मनोज भावुक अपनी रचनाओं में कटाक्ष करते हैं। उनका मानना है कि भोजपुरी सिर्फ बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं, संस्कारों और इतिहास से जुड़ी पहचान है।
उनकी कविता ‘मालिक बहुत मानते हैं’ इसी विडंबना को सामने रखती है, जिसमें भोजपुरी माध्यम से जुड़े लोगों के बीच भाषा और संस्कृति के प्रति दूरी तथा केवल बाहरी पहचान के आधार पर सम्मान पाने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया गया है।
Bhojpuri24.com द्वारा प्रस्तुत यह विशेष शृंखला भोजपुरी साहित्य और संस्कृति के उन स्वर को सामने लाने का प्रयास है, जो भाषा के सम्मान और पहचान की बात करते हैं। आज पढ़ें पहली कविता-
मालिक बहुत मानते हैं
© मनोज भावुक
मैं भोजपुरी चैनल में एंकर हूँ।
तुम्हें भोजपुरी आती है ?
नहीं…
पर, मालिक बहुत मानते हैं।
मैं राग-रंग की एंकर हूँ।
तुम्हें गीत-संगीत का ज्ञान है ?
फगुआ, चइता, कजरी, बिरहा, सोरठी, पूर्वी, झूमर, सोहर के बारे में
या भोजपुरी गीत-संगीत से जुड़ी हस्तियों और उनकी उपलब्धियों के बारे में कुछ जानती हो ?
बिल्कुल नहीं…
पर, मालिक बहुत मानते हैं।
अरे डायन भी एक घर छोड़ देती है।
तुम भोजपुरी की रोटी खाती हो, उसे तो…
नहीं, मैं मालिक का खाती हूँ….
मालिक बहुत मानते हैं।

