लौंडा नाच 11वीं सदी में शुरू हुआ था, भिखारी ठाकुर ने पहुँचाया था जन जन तक

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पटना/गोरखपुर: सावन की रात, गांव के खुले मैदान में ढोलक की थाप, मंजीरा की छनकार और रंग-बिरंगे लहंगे में सजे युवक… ‘बिदेसिया बाबा, हमार देश छोड़ के कहां चले…?’ गीत गूंजता है। दर्शक तालियां बजाते हैं। यह कोई साधारण नाच नहीं, बल्कि लौंडा नाच है, भोजपुरी लोकनाट्य की वह अनोखी परंपरा जिसमें पुरुष कलाकार स्त्री वेश धारण कर नृत्य, गीत, व्यंग्य और सामाजिक संदेश एक साथ पेश करते हैं। पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) और पश्चिमी बिहार के गांवों में सदियों से चली आ रही यह कला आज भी शादियों, त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में जीवित है, लेकिन वाणिज्यिकरण, अश्लीलता के आरोप और आधुनिक मनोरंजन के दबाव में इसकी शुद्धता खतरे में है।

प्राचीन एग्रेरियन थिएटर
लौंडा नाच शब्द ही अपने आप में कई अर्थ छिपाए है। ‘लौंडा’ भोजपुरी में युवक या किशोर लड़के को कहते हैं। इस नाच में पुरुष कलाकार (लौंडे) स्त्री भूमिका निभाते हैं, लहंगा-चोली, मेकअप, घूंघट और नृत्य मुद्राओं के साथ। यह सिर्फ नृत्य नहीं, बल्कि संगीत, हास्य, व्यंग्य, संवाद और नाट्य का मिश्रण है। विद्वान इसे लोक थिएटर या एग्रेरियन थिएटर कहते हैं।

11वीं सदी से 19वीं सदी तक की यात्रा भोजपुरी की ‘खोई हुई’ लिखावट थी कैथी और फिर धीरे धीरे मर गई
लौंडा नाच की जड़ें प्राचीन काल में हैं। विकिपीडिया और लोक साहित्य शोधकर्ताओं के अनुसार इसकी सबसे पुरानी उल्लेख 11वीं शताब्दी में मिलता है। उस समय भोजपुरी क्षेत्र (बिहार-उत्तर प्रदेश) में महिलाओं के मंच पर आने पर सामाजिक पाबंदी थी। इसलिए पुरुष कलाकार ही स्त्री पात्र निभाते थे। यह परंपरा नौटंकी, स्वांग और रामलीला जैसी लोक कलाओं से जुड़ी थी।
19वीं सदी में ब्रिटिश काल में बिहार-पूर्वांचल से लाखों मजदूर कलकत्ता, आसाम और विदेश (गिरमिटिया) गए। परिवार टूटे, स्त्रियां अकेली रह गईं। इसी यथार्थ ने लौंडा नाच को नया रूप दिया। 1851 के आसपास यह कला लोकप्रिय हुई, लेकिन इसे पूर्ण रूप और जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय भिखारी ठाकुर (1887-1971) को जाता है। उन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा जाता है।

भिखारी ठाकुर ने इसमें जान फूंक दी थी भोजपुरी लोकनाट्य की अमर विरासत हैं भिखारी ठाकुर की रचनाएं
भिखारी ठाकुर ने 1917 के आसपास बिदेसिया नाटक के जरिए लौंडा नाच को नई शैली दी। उन्होंने पुरुषों द्वारा स्त्री पात्रों का अभिनय करवाया और इसे ‘बिदेसिया नाच’ या ‘लौंडा नाच’ नाम दिया। उनके नाटकों बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी बेचवा, विधवा विलाप आदि में माइग्रेशन, दहेज, बाल विवाह, स्त्री शोषण और जातिवाद जैसे मुद्दे उठाए गए। भिखारी ठाकुर ने खुद कहा था कि “यह नाच समाज को आईना दिखाने का माध्यम है।
शोधकर्ता राकेश डबरिया लिखते हैं कि भिखारी ठाकुर से पहले लौंडा नाच प्रचलित था, लेकिन उन्होंने पहली बार इसे सामाजिक जागरण का हथियार बनाया।’ (रंग शैली-बिदेसिया के संदर्भ में)।

कैसे होता है लौंडा नाच? शैली और विशेषताएं क्यों आज भी जीवंत है भिखारी ठाकुर की बिदेसिया शैली
लौंडा नाच आमतौर पर खुले मैदान या तीन तरफ खुले मंच पर प्रस्तुत किया जाता है और इसका प्रदर्शन अक्सर पूरी रात चलता है। इस लोकनाट्य की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें युवक स्त्री वेश धारण कर, लहंगा-चोली, आभूषण और मेकअप के साथ नृत्य करते हैं, जिन्हें ‘लौंडा’ कहा जाता है। प्रस्तुति में कजरी, बिरहा, सोहर और बारहमासा जैसे लोकछंदों पर आधारित गीत गाए जाते हैं, जिनमें ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का उपयोग होता है। नृत्य और अभिनय में उछल-कूद, जीवंत भाव-भंगिमाएं और भरपूर हास्य शामिल होता है, जिसके कारण इसे ‘चैकीतोड़ नाच’ भी कहा जाता है। साथ ही, यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यंग्य के माध्यम से दहेज प्रथा, पलायन और अन्य सामाजिक कुरीतियों पर भी तीखा प्रहार करता है।
रामचंद्र मांझी (पद्मश्री 2021) भिखारी ठाकुर के शिष्य ने 10 साल की उम्र से यह कला शुरू की। उन्होंने बताया, ‘हम 12-15 साल की उम्र में लौंडा बनकर मंच पर आते थे। समाज सुधार के लिए यह नाच था।’ (टीवी9 हिन्दी, 2021)।

आज की स्थिति, लोकप्रियता, चुनौतियां और पुनरुत्थान करोड़ों बोलते हैं, फिर भी ‘भाषा’ नहीं भोजपुरी
2025 तक लौंडा नाच गांवों में अभी भी जीवित है। शादियों, जन्मोत्सव, श्राद्ध और चुनावी रैलियों में इसका प्रदर्शन होता है। बिहार और यूपी के छपरा, सारण, बलिया, आजमगढ़ जैसे जिलों में दर्जनों दल सक्रिय हैं।

आंकड़े और तथ्य: NEWS भोजपुरी भाषा का गौरवशाली इतिहास शुरू होता है मगध प्राकृत से
2017 के एक सर्वे (स्कूप हूूप) के अनुसार बिहार में सैकड़ों लौंडा कलाकार सक्रिय थे, लेकिन आधुनिकता के कारण संख्या घट रही है। गिरमिटिया देशों (मॉरीशस, फिजी, ट्रिनिडाड, सूरिनाम) में यह नाचनिया या लौंडा के नाच के नाम से जीवित है। 2021 में रामचंद्र मांझी को पद्मश्री मिलने से कला को नई पहचान मिली।

अश्लीलता का आरोप

कुछ दल वाणिज्यिकता में फंसकर अश्लीलता की ओर मुड़ गए। 2023 में ओपइंडिया ने लिखा कि बिहार के थिएटरों की अश्लीलता ने लौंडा नाच को निगल लिया। कलाकारों (खासकर नाट समुदाय) को हीन समझा जाता है। युवा पीढ़ी आधुनिक मनोरंजन की ओर जा रही है। पारंपरिक प्रदर्शन कम हो रहे हैं। कई कलाकार आजीविका के लिए चुनावी रैलियों में प्रदर्शन करते हैं। हालांकि इसको बचाने का प्रयास भी जारी है. बिहार और यूपी सरकारें लोक कला बोर्ड के जरिए महोत्सव आयोजित करती हैं। यूट्यूब और सोशल मीडिया पर पुराने वीडियो करोड़ों व्यूज पा रहे हैं। सांस्कृतिक संगठन भिखारी ठाकुर की जयंती पर शुद्ध रूप प्रस्तुत करते हैं।
लौंडा नाच भोजपुरी संस्कृति का गौरव है। 11वीं सदी से शुरू हुई यह परंपरा भिखारी ठाकुर के हाथों 20वीं सदी में सामाजिक जागरण का हथियार बनी। आज माइग्रेशन, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण की बहस में यह कला फिर प्रासंगिक है। यदि सरकार, कलाकार और समाज मिलकर शुद्ध रूप को बढ़ावा दें, तो लौंडा नाच सिर्फ नाच नहीं, बल्कि मिट्टी की पुकार बनी रहेगी। भिखारी ठाकुर की आत्मा यही चाहेगी कि बिदेसिया की पीड़ा को गीत बनाकर समाज को जागृत रखो।

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