करोड़ों बोलते हैं, फिर भी ‘भाषा’ नहीं भोजपुरी

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नई दिल्ली: अपना देश बहुभाषी है, जहां संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। लेकिन एक ऐसी भाषा है जिसे दुनिया के 16 देशों में करोड़ों लोग बोलते हैं, जिसकी सांस्कृतिक गहराई प्राचीन मगधी प्राकृत से जुड़ी है, जो स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुकी है, और जिसका सिनेमा-गीत-लोककथा का अपना विशाल संसार हैफिर भी भारत में उसे पूर्ण संवैधानिक दर्जा नहीं मिल पाया। यह भाषा है भोजपुरी।
लगभग 5-6 करोड़ से अधिक लोग भारत में भोजपुरी को अपनी मातृभाषा बताते हैं (2011 जनगणना के अनुसार), जबकि अनुमानों के मुताबिक दुनिया भर में इसके बोलने वालों की संख्या 25 करोड़ तक पहुंचती है। नेपाल, फिजी और मॉरीशस में इसे संवैधानिक मान्यता मिली हुई है, झारखंड में यह द्वितीय राजकीय भाषा है, लेकिन भारत के केंद्र में और मुख्य रूप से बिहार-उत्तर प्रदेश में यह अभी भी ‘हिंदी की बोली’ का दर्जा पाकर रह गई है। यह विरोधाभास भोजपुरी की राजनीति का मूल है।

भाषा बनाम बोली भी राजनीतिक संघर्ष
भाषाविज्ञान में ‘भाषा’ और ‘बोली’ के बीच की रेखा अक्सर राजनीतिक होती है, न कि शुद्ध वैज्ञानिक। भोजपुरी एक स्वतंत्र इंडो-आर्यन भाषा है, जिसकी व्याकरण, शब्दावली और उच्चारण मैथिली, मगही और बंगाली जैसी बहन भाषाओं से अलग है। यह कैथी लिपि में लिखी जाती रही है और इसमें समृद्ध लोक साहित्य, काव्य तथा नाट्य परंपरा मौजूद है। भिखारी ठाकुर जैसे लोक कलाकारों ने इसे ‘भोजपुरी शेक्सपियर’ का दर्जा दिलाया।

फिर समस्या कहां है?
मुख्य रूप से हिंदी राष्ट्रवाद की विरासत में। स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मुहिम में पूर्वी भारत की कई भाषाओं को ‘हिंदी की उपभाषा’ के रूप में समाहित कर लिया गया। मैथिली को 2003 में आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया, लेकिन भोजपुरी, मगही, अंगिका और बज्जिका जैसी भाषाओं की मांग बार-बार टलती रही। कुछ लोग इसे ‘राजनीतिक कारणों’ से जोड़ते हैं क्योंकि भोजपुरी क्षेत्र (पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश) वोट बैंक के रूप में महत्वपूर्ण है, लेकिन भाषाई अस्मिता को अलग मान्यता देने से क्षेत्रीय राजनीति में नया ध्रुवीकरण हो सकता है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भोजपुरी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया और विधानसभा में इसे मान्यता प्रदान की, जो एक सकारात्मक कदम है। लेकिन केंद्र स्तर पर आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग अभी लंबित है। महागठबंधन ने बिहार चुनावों में इसे मुद्दा बनाया, जबकि कुछ सांसदों ने संसद में प्रस्ताव भी रखे। फिर भी, सरकारें अक्सर इसे ‘हिंदी को कमजोर करने’ वाला कदम मानकर टालती रही हैं।

सांस्कृतिक शक्ति और राजनीतिक उपयोग
भोजपुरी की सबसे बड़ी ताकत उसका जनसंपर्क है। करोड़ों प्रवासी मजदूर (गिरमिटिया) इसे दुनिया भर में ले गए। भोजपुरी सिनेमा ने 2000 के दशक में जबरदस्त उछाल लिया और यह मुख्यधारा के बॉलीवुड से अलग, ग्रामीण-श्रमिक वर्ग की आकांक्षाओं, संघर्ष और रोमांस को प्रतिबिंबित करता है। हालांकि कुछ फिल्मों पर ‘अश्लीलता’ का आरोप लगा, लेकिन कुल मिलाकर यह भाषा की लोकप्रियता का माध्यम बना।

राजनीति में भोजपुरी का इस्तेमाल चुनावी रणनीति बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, रवि किशन, केतकी सिंह और कई अन्य नेता चुनावी सभाओं या सदन में ठेठ भोजपुरी में बोलकर जनता से सीधा जुड़ाव बनाते हैं। यह भाषा भावनात्मक अपील पैदा करती है ‘हमारी भाषा’ का नारा वोटर को गौरवान्वित करता है। बिहार के शाहाबाद क्षेत्र में भोजपुरी को राजकीय भाषा बनाने और भिखारी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांगें चुनावी मुद्दे बन चुकी हैं।
लेकिन यहीं विडंबना है। नेता भाषा का इस्तेमाल तो करते हैं, पर भाषाई अधिकार देने में हिचकिचाते हैं। अगर भोजपुरी को पूर्ण मान्यता मिल जाए, तो शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और साहित्य में इसके विकास के नए द्वार खुलेंगे। स्कूलों में भोजपुरी माध्यम की पढ़ाई, सरकारी दस्तावेजों में उपयोग, और सांस्कृतिक संस्थानों को बढ़ावा मिलेगा। वर्तमान में लोग अक्सर अपनी भाषा को ‘हिंदी’ बताकर जनगणना में दर्ज कराते हैं, जिससे आंकड़े कम हो जाते हैं।

अस्मिता या एकीकरण?
भोजपुरी की राजनीति दो धाराओं में बंटी हुई है। एक तरफ वे हैं जो इसे हिंदी के छत्र तले रखकर राष्ट्रीय एकता बनाए रखना चाहते हैं। दूसरी तरफ वे जो मानते हैं कि भाषाई विविधता भारत की ताकत है हिंदी को मजबूत करने के नाम पर क्षेत्रीय भाषाओं को दबाना उचित नहीं। भोजपुरी आंदोलनकार जंतर-मंतर पर धरना देते हैं, राष्ट्रीय अकादमी की मांग करते हैं और कहते हैं कि यह भाषा प्राचीन परंपरा, देशभक्ति (मंगल पांडे से चित्तू पांडे तक) और सांस्कृतिक निरंतरता का वाहक है। यूनेस्को ने भी भोजपुरी गीत-गवई को सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है।

अंततः सवाल यह है: क्या करोड़ों लोगों की मातृभाषा को सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित रखा जाएगा, या उसे शिक्षा, प्रशासन और साहित्य की पूर्ण गरिमा दी जाएगी? भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, पहचान का प्रतीक है। भोजपुरी को ‘भाषा’ का दर्जा मिलना न सिर्फ न्याय होगा, बल्कि भारत की सच्ची बहुलता को स्वीकार करने का प्रतीक भी। जब तक राजनीति भाषा को सिर्फ वोट का औजार मानती रहेगी, तब तक करोड़ों बोलने वाले अपनी भाषा को ‘भाषा’ कहने का हक मांगते रहेंगे। समय आ गया है कि इस विरोधाभास को सुलझाया जाए न हिंदी को कमजोर करके, न भोजपुरी को दबाकर, बल्कि दोनों को अपनी-अपनी जगह सम्मान देकर।

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