Bhojpuri24.com के भोजपुरी धुरंधर सीरीज में आज आपसे रूबरू होंगे डॉ. संतोष पटेल। कवि, शोधकर्ता, अनुवादक, संपादक और भाषा-संरक्षक के रूप में बहुआयामी योगदान देने वाले डॉ. संतोष पटेल आज भोजपुरी साहित्य के उन चुनिंदा हस्ताक्षरों में हैं, जिनका काम भारत की सीमाओं से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंच चुका है।
बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया में 4 मार्च 1974 को जन्मे डॉ. संतोष कुमार, जिन्हें साहित्य जगत ‘संतोष पटेल’ के नाम से जाना जाता है, आज भोजपुरी साहित्य के सबसे सक्रिय और बहुआयामी रचनाकारों में गिने जाते हैं। साहित्यिक वातावरण में पले-बढ़े संतोष पटेल को लेखन की प्रेरणा अपने पिता डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना से मिली। यही कारण है कि उन्होंने साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का औजार बनाया।

उनकी शैक्षणिक यात्रा भी असाधारण रही है। अंग्रेजी, हिंदी, भोजपुरी, ट्रांसलेशन स्टडीज और बुद्धिज्म जैसे विभिन्न विषयों में कई स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त करने के साथ उन्होंने इग्नू, नई दिल्ली से ‘भोजपुरी साहित्य में दलित चेतना के स्वर’ विषय पर पीएचडी की। यह शोध केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भोजपुरी साहित्य में सामाजिक विमर्श को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है।
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भोजपुरी साहित्य को नई वैचारिक दिशा देने वाले रचनाकार
डॉ. संतोष पटेल की पहचान केवल कवि या लेखक के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे साहित्यकार के रूप में है जिन्होंने भोजपुरी साहित्य को समकालीन सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का प्रयास किया। उनकी कविताओं और कहानियों में गांव, किसान, श्रमिक, दलित समाज, सांस्कृतिक अस्मिता और बदलते सामाजिक परिवेश की गहरी संवेदना दिखाई देती है।
उनकी चर्चित भोजपुरी कृतियों में ‘भोर भिनुसार’, ‘अदहन’, ‘अछरंग’, ‘अपने देसवा निक बा’, ‘अनबोलता’ और ‘भोजपुरी साहित्य के विविध आयाम’ जैसी पुस्तकें शामिल हैं। इन रचनाओं में लोकजीवन की सहजता के साथ सामाजिक असमानताओं और बदलते समय की चुनौतियों का गंभीर विश्लेषण मिलता है।

सिर्फ भोजपुरी ही नहीं, उन्होंने हिंदी साहित्य में भी कविता, आलोचना और वैचारिक लेखन के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी लेखनी यह सिद्ध करती है कि भाषा चाहे कोई भी हो, साहित्य का उद्देश्य समाज को बेहतर बनाना होना चाहिए।
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अनुवाद, शोध और संपादन के जरिए भाषा को दिया नया विस्तार
डॉ. संतोष पटेल का योगदान केवल मौलिक लेखन तक सीमित नहीं है। उन्होंने अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। अंग्रेजी, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण रचनाओं को भोजपुरी में लाकर उन्होंने इस भाषा के साहित्यिक संसार को समृद्ध बनाया।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रकाशित कई महत्वपूर्ण पुस्तिकाओं का भोजपुरी अनुवाद, ‘हिंद स्वराज’ और ‘धम्मपद’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का अनुवाद तथा विश्व साहित्य की कविताओं को भोजपुरी में प्रस्तुत करना उनके इसी प्रयास का हिस्सा है।
वे ‘भोजपुरी जिंदगी’ के संपादक, ‘पूर्वांकुर’ के सह-संपादक तथा कई साहित्यिक और सामाजिक पत्रिकाओं के संपादकीय दायित्व निभा चुके हैं। इसके अलावा वे इग्नू की भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स निर्माण समिति के सदस्य भी रहे हैं। इन जिम्मेदारियों के माध्यम से उन्होंने भोजपुरी भाषा के अकादमिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भोजपुरी की मजबूत आवाज
भोजपुरी भाषा को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए डॉ. संतोष पटेल लगातार सक्रिय रहे हैं। उनका साहित्य और शोध भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि कई देशों में उसकी चर्चा होती रही है। उज्बेकिस्तान के विद्वानों के साथ संयुक्त रूप से लिखी गई शोध पुस्तकों ‘Lazgi – Dance of Soul and Love’ तथा ‘A Comparative Study of Lazgi and Bharatanatyam’ ने भारतीय और मध्य एशियाई सांस्कृतिक संबंधों को नई दृष्टि से प्रस्तुत किया।
वे लंदन की साहित्यिक संस्था ‘बिहान’ की रणनीतिक कोर समिति के सदस्य हैं, जबकि दक्षिण अफ्रीका की Bhojpuri Association of South Africa में ‘ओवरसीज़ लैंग्वेज एडवाइज़र’ की भूमिका निभा चुके हैं। उज्बेकिस्तान की State Academy of Choreography ने भी भाषा और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया है। यह उपलब्धियां बताती हैं कि डॉ. संतोष पटेल केवल भोजपुरी के लेखक नहीं, बल्कि उसके वैश्विक सांस्कृतिक दूत भी हैं।
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सम्मानों से सजी उपलब्धियों की लंबी श्रृंखला
लगभग दो दशक से अधिक लंबे साहित्यिक सफर में डॉ. संतोष पटेल को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं। वर्ष 2025 में उन्हें International Literary Award, Dr. APJ Abdul Kalam Excellence Award, कबीर सम्मान और सम्यक संस्कृति साहित्य सम्मान जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
इसके अलावा बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर राष्ट्रीय साहित्य सम्मान, भोजपुरी कीर्ति सम्मान, भोजपुरी भाष्कर सम्मान, श्री प्रभुनाथ सिंह सम्मान, फातिमा शेख अवार्ड, साहित्य चेतना मंच सम्मान और भारतरत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम स्मृति इंडिया ग्रेस इंडिया लिटरेचर अवार्ड सहित अनेक सम्मान उनके खाते में दर्ज हैं।
इन पुरस्कारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल साहित्यिक लेखन के लिए नहीं, बल्कि भाषा संरक्षण, सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक नेतृत्व के लिए भी दिए गए हैं।

भोजपुरी के भविष्य को नई दिशा देने वाला व्यक्तित्व
वर्तमान में डॉ. संतोष पटेल दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव के रूप में कार्यरत हैं, लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उनका साहित्यिक और सांस्कृतिक अभियान लगातार जारी है। वे विश्व भोजपुरी सम्मेलन, अखिल भोजपुरी लेखक संघ, भोजपुरी जन जागरण अभियान और पुरवइया जैसी संस्थाओं से जुड़कर भाषा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
उनका मानना है कि भोजपुरी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान है। इसलिए इसे केवल मनोरंजन की भाषा के रूप में नहीं, बल्कि शोध, शिक्षा, तकनीक और वैश्विक विमर्श की भाषा के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।
आज जब भारतीय भाषाओं को डिजिटल युग में नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, तब डॉ. संतोष पटेल जैसे विद्वान भोजपुरी को अकादमिक, साहित्यिक और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान दिलाने का सतत प्रयास कर रहे हैं। उनकी पूरी साहित्यिक यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यदि दृष्टि व्यापक हो, तो क्षेत्रीय भाषा भी विश्व स्तर पर अपनी सशक्त पहचान बना सकती है। भोजपुरी साहित्य के इतिहास में डॉ. संतोष कुमार ‘संतोष पटेल’ का नाम उन रचनाकारों में दर्ज रहेगा जिन्होंने अपनी लेखनी, शोध, अनुवाद और सांस्कृतिक नेतृत्व के माध्यम से भोजपुरी को नई ऊर्जा, नई पहचान और नया वैश्विक आयाम प्रदान किया।

